Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 1: भारतीय संगीत का सामान्य परिचय

कला और संगीत की परिभाषा (Definition of Art and Music)

कलाओं को मूलभूत रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया गया है— ललित कलाएँ एवं उपयोगी कलाएँ।

ललित कलाओं के प्रकार

  • ललित कलाओं के पाँच प्रकार माने गए हैं— संगीत, काव्य, चित्रकला, मूर्तिकला एवं स्थापत्य कला।
  • सभी ललित कलाओं में संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह वह कला है जिसमें स्वर और लय द्वारा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं।

संगीत की शास्त्रीय परिभाषा

“गीत, वाद्य तथा नृत्य त्रय संगीतमुच्यते।”


स्रोत: संगीत रत्नाकर (श्लोक 21, स्वरगताध्याय:)

भावार्थ: गायन, वादन तथा नृत्य—इन तीनों कलाओं के समावेश को संगीत कहते हैं। संगीत में गीत, वाद्य व नृत्य तीनों समन्वित हैं।

संगीत के मूल आधार

  • संगीत का मूल आधार स्वर और लय है।
  • स्वर और लय के साथ भाषा, कविता या पद का समन्वय संगीत को अनूठा आकर्षण प्रदान करता है।
  • संगीत हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह केवल मनुष्यों ही नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों पर भी प्रभाव डालता है।
  • मनोवैज्ञानिक रूप से संगीत एक ऐसी औषधि है जो चित्त को एकाग्र कर उसे संतुलित बनाने की क्षमता रखती है।
शास्त्रीय संगीत (Classical Music)

शास्त्रों में वर्णित नियमों के आधार पर निर्मित संगीत को शास्त्रीय संगीत कहा जाता है।

शास्त्रीय संगीत की विशेषताएँ

  • यह ध्वनि प्रधान होता है, जिसमें शब्दों की अपेक्षा ध्वनि के प्रयोग के रूप में स्वरों के उतार-चढ़ाव को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
  • शास्त्रों या ग्रंथों में संकलित नियमों का सहारा लेकर, परंपराओं के अनुसार प्रवाहित होने वाली संगीत प्रणाली को ही शास्त्रीय संगीत कहा जाता है।
  • यह मर्यादित रूप में विकसित होता है और इसमें नित-नूतन आकर्षण बना रहता है।

ऐतिहासिक विकास

  • वैदिक काल में ऋग्वेद के मंत्रों में से कुछ मंत्रों को गेय बनाकर सामवेद के रूप में संकलित किया गया।
  • वैदिक कालीन पुराणों और ग्रंथों में संगीत शास्त्र के सिद्धांतों के अंतर्गत तीन सप्तक, सप्तस्वर, तीन ग्राम और उनकी मूर्च्छनाओं का विकास हुआ।
  • मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक शास्त्रीय संगीत में अनेक परिवर्तन आए। गेय विधाओं के अंतर्गत ध्रुपद, धमार, सादरा, खयाल, तराना आदि शैलियाँ प्रचलित हुईं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की पद्धतियाँ

  • हिंदुस्तानी संगीत पद्धति: उत्तर भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत को हिंदुस्तानी संगीत पद्धति कहा जाता है। इसके अंतर्गत खयाल, ध्रुपद, धमार, तराना इत्यादि गाए-बजाए जाते हैं।
  • कर्नाटक संगीत पद्धति: दक्षिण भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत को कर्नाटक संगीत पद्धति कहा जाता है। इसके अंतर्गत रागम-तानम-पल्लवी, वर्णम, जावलि तथा तिल्लाना आदि विधाएँ समन्वित हैं।
  • दोनों पद्धतियों का आधार श्रुति ही है, लेकिन दोनों में स्वरों की श्रुतियाँ, विधाएँ एवं भाषा भिन्न हैं।
उपशास्त्रीय संगीत (Semi-Classical Music)

जिन गेय विधाओं में संगीत के नियमों के कठोर पालन की अपेक्षा रस, भाव और रंजकता की प्रधानता रहती है, वे उपशास्त्रीय संगीत की श्रेणी में आती हैं।

विशेषताएँ

  • शब्दों के भावों को स्वरों के विविध अलंकृत प्रयोगों द्वारा व्यक्त किया जाता है।
  • इसमें कण, मींड, मुर्की, बोल-बनाव आदि अलंकरणों का विशेष प्रयोग होता है।
  • इसमें एक राग से दूसरे राग में जाने की भी स्वतंत्रता होती है।

प्रमुख उपशास्त्रीय शैलियाँ

  1. ठुमरी: इसमें लोक और शास्त्रीय दोनों संगीत के तत्व विद्यमान हैं। यह शृंगार रस प्रधान शैली है। अवध के नवाब वाजिद अली शाह को इसका विशेष प्रचारक माना जाता है। इसमें भैरवी, काफ़ी, खमाज, पीलू जैसे सरल रागों और दीपचंदी, जत, चाचर, कहरवा तालों का प्रयोग होता है। इसके दो प्रमुख रूप हैं:
    • (i) बोल-बनाव की ठुमरी
    • (ii) बोल-बाँट की ठुमरी
  2. दादरा: यह बहुत ही सुंदर व चपल-चलन युक्त विधा है। इसमें शब्दों की प्रधानता अधिक होती है। यह दादरा ताल के अतिरिक्त अन्य तालों में भी गाई जाती है।
  3. टप्पा: 18वीं शताब्दी में लखनऊ के नवाब आसिफुद्दौला के दरबार में पंजाबी गायक गुलाम नबी शोरी (शोरी मियाँ) ने इसे प्रचलित किया। इसकी रचनाओं में अधिकांशतः पंजाबी, सिंधी व मुल्तानी शब्दों का प्रयोग होता है। यह द्रुत गति की तानों पर आधारित होती है।
  4. होरी: उत्तर भारत की लोक भाषाओं में गाई जाने वाली शैली, जिसमें राधा-कृष्ण की होली खेलने व छेड़छाड़ का वर्णन होता है। उपशास्त्रीय होरी में बोल-बनाव होता है, जबकि लोक होरी में बोल-बनाव नहीं होता।
  5. चैती: चैत्र मास में गाए जाने के कारण इसे चैती कहा जाता है। इसमें 'हो रामा' शब्द इस गीत की विशेष टेक होती है। यह शृंगार रस से परिपूर्ण होती है।
  6. कजरी: यह मुख्य रूप से सावन के महीने में गाई जाती है। बनारस व मिर्जापुर क्षेत्र कजरी गायन के लिए प्रसिद्ध हैं।
सुगम संगीत (Light Music)

'सुगम' शब्द का अर्थ है 'सरल' या 'सहज'। अतः सुगम संगीत का अर्थ है—सरलता या सहजता से गाए-बजाए जाने वाला संगीत।

लोक संगीत (Folk Music)

लोक संगीत का तात्पर्य सामान्य जनमानस के संगीत से है। यह किसी विशिष्ट व्यक्ति की रचना नहीं होती, बल्कि लोक की चेतना की अभिव्यक्ति होती है।

विभिन्न राज्यों की लोक गायन एवं नृत्य शैलियाँ

प्रदेश गायन एवं नृत्य शैलियाँ
असम बिहू, छऊ आदि।
उत्तर प्रदेश होरी, बारहमासा, कजरी, चैती, रसिया, लांगुरिया, बिरहा, रासलीला, नौटंकी के गीत आदि।
गुजरात गरबा, रास, डांडिया आदि।
पंजाब हीर, टप्पा, गिद्धा, भांगड़ा आदि।
महाराष्ट्र लावणी, मंगलागौर आदि।
राजस्थान गोरबंद, मांड, घूमर, झूमर, कालबेलिया आदि।
जम्मू कश्मीर भाण्ड, पाथिर, रउफ़, जबरो, चकरी आदि।
अरुणाचल प्रदेश टापू, पोनंग, नीशीदोऊ, लोकूबवांग आदि।
केरल तिरुवादिरकली, पाना, थुल्लल, थेय्यम आदि।
आंध्र प्रदेश धिमसा, बुर्रा कत्था, तोलू बोम्मालता, रोत्तेला पंडुगा आदि।
पश्चिम बंगाल बाऊल, रबिन्द्र संगीत, भटियाली, गोडीय, छऊ आदि।

लोक वाद्यों का वर्गीकरण

  • तंत्री वाद्य: एकतारा, तुन्दिना, पुल्लुवन्नकुडम, नन्दुनी, सारंगी आदि।
  • सुषिर वाद्य: शंख, वेणु, कोम्बू, शहनाई, नादस्वरम, कुरुम कुज़ल, नेडुम कुज़ल, तिरुचिन्नम, एककलम, मगुडी आदि।
  • अवनद्ध वाद्य: ढोल, ढोलक, टप्पाताई, तम्बाट्टम, तमक्कू, तन्तीपानइ, तविल, उडुक्कु, उरुमी, कुण्डलम, खंजीरा, गुम्माटी आदि।
  • धातु वाद्य: जलरा, कुज़ीतालम, सेमक्कलम, कइचिलम्बु आदि।
संस्कार गीत (Ritual Songs)

मानव जीवन के विभिन्न संस्कारों, रीति-रिवाजों और धार्मिक अनुष्ठानों के समय गाए जाने वाले गीतों को संस्कार गीत कहा जाता है।

दक्षिण भारतीय संस्कार गीत परंपरा

  1. सोपान संगीतम (केरल): यह केरल के मंदिरों की सीढ़ियों (सोपान) पर 'मरार' संप्रदाय द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला गायन है। इसके साथ इडैक्का वाद्य बजाया जाता है। इसमें 'गीत गोविंदम' (अष्टपदी) का गायन प्रमुख है।
  2. तेवारम और तिरुवाचकम (तमिलनाडु): तमिलनाडु के शैव समुदाय के लोग इन स्तोत्रों को गाते हैं। इन्हें 'ओदुवार' समुदाय द्वारा गाया जाता है।
  3. तिरुप्पावइ एवं दिव्य प्रबंधम: दक्षिण भारत में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए गाई जाने वाली संगीतमय रचनाएँ।
संगीतज्ञ जीवनी: पंडित सामता प्रसाद मिश्र उर्फ 'गुदई महाराज'

बनारस घराने के प्रसिद्ध तबला वादक पंडित सामता प्रसाद मिश्र उर्फ गुदई महाराज का भारतीय संगीत में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

जीवन परिचय एवं शिक्षा

  • जन्म: 20 जुलाई, 1921 को बनारस में हुआ।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: इनके पिता पंडित बाचा मिश्र भी अच्छे तबला वादक थे। पिता के निधन के बाद इनकी शिक्षा का दायित्व इनके मौसेरे भाई पंडित विक्रमादित्य मिश्र उर्फ खलीफ़ा पंडित बिक्कू महाराज ने लिया।
  • कठिन साधना: पंडित बिक्कू महाराज की देख-रेख में इन्होंने प्रतिदिन 15-16 घंटे का कठिन अभ्यास किया।

वादन शैली एवं विशेषताएँ

  • इनका 'तिरकिट', 'तकतक', 'धिनगिन' और 'धिरधिर' जैसे बोलों पर विशेष प्रभुत्व था।
  • बायें तबले की स्याही का भाग अपनी ओर रखकर उसमें गूँज पैदा करने की इनकी शैली असाधारण थी।
  • इन्होंने 'शोले', 'मदर इंडिया' (मेरी सूरत तेरी आँखें), 'बसंत बहार' जैसी कई प्रसिद्ध फिल्मों में भी तबला वादन किया।

सम्मान एवं उपाधियाँ

इन्हें तबला का जादूगर, ताल मार्तण्ड, ताल शिरोमणि, तबला विजार्ड, तबला सम्राट, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, हाफ़िज़ अली खाँ सम्मान, पद्मश्री तथा पद्मभूषण से अलंकृत किया गया था।

निधन: 21 मई, 1994 को पुणे में एक कार्यशाला के दौरान हृदय गति रुक जाने से इनका देहांत हो गया।