Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 2: कैसे दिखते हैं तबला एवं पखावज वाद्य?

तबला वाद्य का परिचय एवं संरचना

तबला उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवनद्ध वाद्य है, जिसका मुख्य कार्य संगीत में गति और लय का मापन करना है।

ऐतिहासिक एवं व्यावहारिक महत्व

  • बहुमुखी उपयोग: शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय, सुगम संगीत, और कथक नृत्य की संगति में अनिवार्य रूप से प्रयुक्त।
  • नाद सौंदर्य: अपनी अनूठी नाद विविधता और मधुरता के कारण वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित।
  • एकल वादन: वर्तमान में संगति के अतिरिक्त स्वतंत्र एकल वादन (Solo) के रूप में भी अत्यधिक लोकप्रिय।

शारीरिक संरचना (दायाँ और बायाँ)

तबला एक ऊर्ध्वमुखी वाद्य है, जिसके दो मुख्य अंग होते हैं:

विशेषता दायाँ (तबला) बायाँ (डग्गा या बायाँ)
हस्त संयोजन दाहिने हाथ से बजाया जाता है। बायें हाथ से बजाया जाता है।
निर्माण सामग्री शीशम, नीम, या बीजासार की लकड़ी। पीतल, ताँबा, या मिट्टी (मिट्टी की ध्वनि सर्वोत्तम मानी जाती है)।
आंतरिक बनावट अंदर से तीन-चौथाई खोखला और नीचे का एक-चौथाई हिस्सा ठोस (स्थिरता हेतु)। पूर्णतः खोखला कटोरेनुमा ढांचा।
मुख का आकार बाएँ की तुलना में छोटा। दाएँ की तुलना में बड़ा।
स्वर मिलाना ऊँचे (तीव्र) स्वर में मिलाया जाता है। नीचे (मंद्र) स्वर में मिलाया जाता है।
तबला वाद्य के प्रमुख अंग

तबले की जटिल संरचना विभिन्न सूक्ष्म अंगों से मिलकर बनी है, जो इसके स्वर और वादन शैली को निर्धारित करते हैं:

अंगों का विस्तृत विवरण

  • पूड़ी: बकरे की खाल से बनी झिल्ली जो दोनों मुखों पर मढ़ी होती है। इसके तीन भाग होते हैं: चाँटी, लव, और स्याही।
  • चाँटी (किनार): पूड़ी के किनारे की चमड़े की पट्टी। इस पर मुख्य रूप से 'ता' या 'न' वर्ण बजाए जाते हैं।
  • लव (मैदान): चाँटी और स्याही के बीच का खाली स्थान। यहाँ 'ता', 'तिं' (दाएँ पर) तथा 'गे', 'घे' (बाएँ पर) वर्ण निकलते हैं।
  • स्याही: पूड़ी के केंद्र में स्थित काले रंग का गोलाकार लेप। यह लोहे के चूर्ण (राख) और लेई को मिलाकर बनाया जाता है। बाएँ (डग्गे) पर यह कलाई के संचालन हेतु थोड़ी किनारे खिसकाकर लगाई जाती है।
  • गजरा: पूड़ी को कसने वाली चमड़े की तीन लड़ियों वाली गूंथी हुई माला। इसमें 16 छिद्र (घर) होते हैं।
  • गट्टा: दाएँ तबले की बद्धियों के बीच फँसे लकड़ी के बेलनाकार टुकड़े (लगभग 3 इंच)। इन्हें हथौड़ी से नीचे ठोकने पर स्वर ऊँचा और ऊपर ठोकने पर नीचा होता है।
  • बद्धी: चमड़े की पट्टी जो गजरे के घरों से होकर गट्टों को दबाते हुए नीचे की इडरी तक जाती है और पूड़ी को कसती है।
  • खोल: तबले का मुख्य लकड़ी का ढांचा।
  • इंडरी (गुड़री/रिंग): कपड़े या नारियल की डोरी से बनी गोल गद्दी, जिस पर तबला टिकाया जाता है। यह स्थिरता प्रदान करती है और डग्गे की गूँज बढ़ाती है।

वर्ण निकास सारणी

वर्ण / बोल वादन स्थान हस्त क्रिया / निकास विधि वाद्य प्रकार
ता / न चाँटी (किनार) तर्जनी उंगली के आघात से दाहिना तबला
ता / तिं लव (मैदान) उंगलियों के हल्के आघात से दाहिना तबला
गे / घे लव (मैदान) कलाई को स्याही पर रखकर उंगलियों के फैलाव से बायाँ (डग्गा)
पखावज वाद्य का परिचय एवं संरचना

पखावज उत्तर भारतीय संगीत का एक अत्यंत प्राचीन और गंभीर ध्वनि वाला द्वि-मुखी अवनद्ध वाद्य है।

संरचनात्मक विशेषताएँ

  • वादन शैली: इसे क्षैतिज रूप से लिटाकर बजाया जाता है।
  • निर्माण काष्ठ: शीशम, बीजा, या आम की लकड़ी से निर्मित।
  • आयाम: कुल लंबाई लगभग 75 से 80 सेंटीमीटर।
  • मुखों का व्यास: दायाँ मुख छोटा (व्यास 16-18 सेमी) और बायाँ मुख बड़ा (व्यास 24-25 सेमी) होता है।
  • आटा लेपन विधि: पखावज के बाएँ मुख पर वादन से पूर्व गीला आटा लगाया जाता है, जिससे इसकी ध्वनि अत्यंत गंभीर, भारी और मंद्र स्वर युक्त हो जाती है।
  • दायाँ मुख: इस पर स्थायी रूप से स्याही का लेप होता है, जिसे आवश्यकतानुसार तीव्र स्वर में मिलाया जाता है।
  • बद्धी और गट्टे: इसमें चमड़े की बद्धियाँ (भैंस या ऊँट के चमड़े की) और 8 लकड़ी के गट्टे होते हैं। इसके गजरे पर भी 16 घर होते हैं।

प्रयुक्त तालें

पखावज का प्रयोग मुख्य रूप से ध्रुपद और धमार गायकी की संगति में होता है। इसमें प्रयुक्त होने वाली प्रमुख तालें निम्नलिखित हैं:

  • चौताल, धमार, सूलताल, आदिताल, तीव्रा, बसंत, और लक्ष्मी ताल।
मृदंगम् या पखावज वाद्य के ऐतिहासिक तथ्य

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • आंकिक वाद्य: प्राचीन काल में इसे 'आंकिक वाद्य' कहा जाता था और इसका प्रयोग मुख्य रूप से भक्ति संगीत में होता था।
  • महाकाव्य काल: रामायण और महाभारत काल में मृदंग का प्रचुर उल्लेख मिलता है।
  • वैदिक संबंध: माना जाता है कि वैदिक काल के तुरंत बाद और रामायण काल से बहुत पहले ही मृदंग का विकास हो चुका था।
  • मंदिर परंपरा: पारंपरिक हिंदू मंदिरों में आज भी आरती और संकीर्तन के समय इस वाद्य का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है।
  • भौगोलिक अंतर: दक्षिण भारत का मृदंगम् और उत्तर भारत का पखावज आकार में भिन्न होते हैं; पखावज आकार में मृदंगम् से बड़ा होता है।
महान कलाकार: उस्ताद अहमद जान थिरकवा

उस्ताद अहमद जान थिरकवा 20वीं सदी के सबसे महान और प्रभावशाली तबला वादकों में से एक माने जाते हैं।

जीवन परिचय एवं संगीत यात्रा

  • जन्म: सन् 1891 में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर के एक प्रतिष्ठित संगीतकार परिवार में।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: पिता हुसैन बख्श, चाचा शेर खाँ, नाना कलंदर बख्श, और मामा फैयाज खाँ सभी उच्च कोटि के संगीतज्ञ थे।
  • गुरु परंपरा: मुख्य शिक्षा उस्ताद मुनीर खाँ (मुंबई) से प्राप्त की। बाद में दिल्ली घराने के खलीफा उस्ताद नत्थू खाँ का मार्गदर्शन भी मिला।
  • 'थिरकवा' उपाधि: रामपुर के नवाब ने उनकी थिरकती हुई उंगलियों के जादू से प्रभावित होकर उन्हें 'थिरकवा' की उपाधि दी थी।
  • प्रारंभिक सफलता: नट सम्राट बाल गंधर्व की प्रसिद्ध 'महाराष्ट्र नाटक कंपनी' में तबला वादक के रूप में कार्य किया।
  • शैक्षणिक योगदान: स्वतंत्रता के बाद लखनऊ स्थित भातखंडे संगीत महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक रहे। सेवानिवृत्ति के बाद मुंबई के NCPA में अध्यापन किया।
  • निधन: 13 जनवरी, 1976 को लखनऊ में।

वादन शैली एवं विशिष्टताएँ

  • चार पट के तबलिये: वे चारों पट (विभिन्न घरानों की शैलियों) के उत्कृष्ट ज्ञाता थे।
  • संगति और एकल वादन: स्वतंत्र वादन के साथ-साथ गायन, वादन और कथक नृत्य (विशेषकर पंडित अच्छन महाराज और पंडित बिरजू महाराज) के साथ बेजोड़ संगति की।
  • ध्वनि सौंदर्य: उनके बड़े मुँह के तबले से निकलने वाली गंभीर और सुरीली गूँज श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थी।

प्रसिद्ध पेशकार

उस्ताद अहमद जान थिरकवा अपने वादन का आरंभ प्रायः इस प्रसिद्ध पेशकार से करते थे:

"धींक्ड धींधा ऽ धा धींधा धाति धाति ऽ धा धीधा"


भावार्थ / विश्लेषण: यह पेशकार थिरकवा साहब की वादन शैली की पहचान है, जिसमें लय की सूक्ष्मता और उंगलियों की स्पष्टता का अद्भुत समन्वय दिखता है।

सम्मान एवं शिष्य परंपरा

  • पद्म भूषण: वे भारत के प्रथम तबला वादक थे जिन्हें प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया।
  • अन्य सम्मान: राष्ट्रपति द्वारा स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। भारत सरकार द्वारा उनके जीवन पर एक वृत्तचित्र (Documentary) भी बनाया गया।
  • प्रमुख शिष्य: पंडित निखिल घोष, लालजी गोखले, प्रेम वल्लभ, सूर्यकांत गोखले, सुधीर संसारे, राजकुमार शर्मा, एम. वी. भिडे, नारायण जोशी, मोहन लाल जोशी, सुधीर कुमार वर्मा, सरवत हुसैन आदि।