तबला उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवनद्ध वाद्य है, जिसका मुख्य कार्य संगीत में गति और लय का मापन करना है।
तबला एक ऊर्ध्वमुखी वाद्य है, जिसके दो मुख्य अंग होते हैं:
| विशेषता | दायाँ (तबला) | बायाँ (डग्गा या बायाँ) |
|---|---|---|
| हस्त संयोजन | दाहिने हाथ से बजाया जाता है। | बायें हाथ से बजाया जाता है। |
| निर्माण सामग्री | शीशम, नीम, या बीजासार की लकड़ी। | पीतल, ताँबा, या मिट्टी (मिट्टी की ध्वनि सर्वोत्तम मानी जाती है)। |
| आंतरिक बनावट | अंदर से तीन-चौथाई खोखला और नीचे का एक-चौथाई हिस्सा ठोस (स्थिरता हेतु)। | पूर्णतः खोखला कटोरेनुमा ढांचा। |
| मुख का आकार | बाएँ की तुलना में छोटा। | दाएँ की तुलना में बड़ा। |
| स्वर मिलाना | ऊँचे (तीव्र) स्वर में मिलाया जाता है। | नीचे (मंद्र) स्वर में मिलाया जाता है। |
तबले की जटिल संरचना विभिन्न सूक्ष्म अंगों से मिलकर बनी है, जो इसके स्वर और वादन शैली को निर्धारित करते हैं:
| वर्ण / बोल | वादन स्थान | हस्त क्रिया / निकास विधि | वाद्य प्रकार |
|---|---|---|---|
| ता / न | चाँटी (किनार) | तर्जनी उंगली के आघात से | दाहिना तबला |
| ता / तिं | लव (मैदान) | उंगलियों के हल्के आघात से | दाहिना तबला |
| गे / घे | लव (मैदान) | कलाई को स्याही पर रखकर उंगलियों के फैलाव से | बायाँ (डग्गा) |
पखावज उत्तर भारतीय संगीत का एक अत्यंत प्राचीन और गंभीर ध्वनि वाला द्वि-मुखी अवनद्ध वाद्य है।
पखावज का प्रयोग मुख्य रूप से ध्रुपद और धमार गायकी की संगति में होता है। इसमें प्रयुक्त होने वाली प्रमुख तालें निम्नलिखित हैं:
उस्ताद अहमद जान थिरकवा 20वीं सदी के सबसे महान और प्रभावशाली तबला वादकों में से एक माने जाते हैं।
उस्ताद अहमद जान थिरकवा अपने वादन का आरंभ प्रायः इस प्रसिद्ध पेशकार से करते थे:
"धींक्ड धींधा ऽ धा धींधा धाति धाति ऽ धा धीधा"
भावार्थ / विश्लेषण: यह पेशकार थिरकवा साहब की वादन शैली की पहचान है, जिसमें लय की सूक्ष्मता और उंगलियों की स्पष्टता का अद्भुत समन्वय दिखता है।