तबला वाद्य पर बजने वाले मूलतः 10 वर्ण माने जाते हैं। इनमें से छह वर्ण दाहिने तबले पर, दो वर्ण बायें तबले (डग्गे) पर स्वतंत्र रूप से बजाए जाते हैं, और दो वर्णों को संयुक्त वर्ण माना जाता है। इसके अतिरिक्त भी कई वर्णों का निकास प्रयोग में लाया जाता है।
| वर्ण का प्रकार | संख्या | वर्ण / बोल | वादन का स्थान |
|---|---|---|---|
| बायें तबले (डग्गे) के वर्ण | 2 | कत/के/कि, घे या गे | बायें तबले का मैदान, किनारा और स्याही के बीच का स्थान |
| दाहिने तबले के वर्ण | 6 | ता/ना, तिं, ति/ते, ट/र, तूं/तू, दीं/थुं/न/ता | चाँटी, लव, स्याही का मध्य, स्याही का किनारा, स्याही का शीर्ष |
| संयुक्त वर्ण | 2 | धा, धिं | दाहिने और बायें तबले पर एक साथ आघात |
भारतीय संगीत में पखावज के वर्णों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। आरंभिक चरण में इसमें सिर्फ चार वर्ण माने जाते थे— ता, दीं, थुं और ना। आधुनिक युग के अधिकांश विद्वान पखावज के कुल वर्णों की संख्या सात मानते हैं, जिनमें 'ता', 'दीं', 'थुं', 'ना' के अलावा ते, टे और क शामिल हैं।
पखावज के विद्यार्थियों को ध्यान रखना होता है कि इसके बोलने (पढ़ंत) और बजाने (बजंत) में कई बार अंतर हो जाता है:
पखावज और तबला वादन के क्षेत्र में नाना पानसे का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने पखावज वादन शैली में क्रांतिकारी सुधार किए।