Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 3: तबला एवं पखावज वाद्यों पर बजने वाले वर्ण एवं बोल

तबला वाद्य के वर्ण एवं बोल

तबला वाद्य पर बजने वाले मूलतः 10 वर्ण माने जाते हैं। इनमें से छह वर्ण दाहिने तबले पर, दो वर्ण बायें तबले (डग्गे) पर स्वतंत्र रूप से बजाए जाते हैं, और दो वर्णों को संयुक्त वर्ण माना जाता है। इसके अतिरिक्त भी कई वर्णों का निकास प्रयोग में लाया जाता है।

तबला वर्णों का वर्गीकरण तालिका

वर्ण का प्रकार संख्या वर्ण / बोल वादन का स्थान
बायें तबले (डग्गे) के वर्ण 2 कत/के/कि, घे या गे बायें तबले का मैदान, किनारा और स्याही के बीच का स्थान
दाहिने तबले के वर्ण 6 ता/ना, तिं, ति/ते, ट/र, तूं/तू, दीं/थुं/न/ता चाँटी, लव, स्याही का मध्य, स्याही का किनारा, स्याही का शीर्ष
संयुक्त वर्ण 2 धा, धिं दाहिने और बायें तबले पर एक साथ आघात

दाहिने तबले पर निकलने वाले वर्णों की निकास विधि

  • ता/ना: दाहिने तबले पर अनामिका उंगली को रखते हुए तर्जनी से तबले की चाँटी पर आघात करके तुरंत उठा लेने से यह ध्वनि उत्पन्न होती है। आघात करते समय मध्यमा उंगली ऊपर उठी होनी चाहिए।
  • तिं: दाहिने तबले पर अनामिका को रखते हुए तर्जनी से लव पर आघात करने से 'तिं' की ध्वनि उत्पन्न होती है।
  • ति/ते: मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका उंगलियों को आपस में जोड़कर दाहिने तबले की स्याही के मध्य में आघात करके दबा देने से 'ते' या 'ति' की ध्वनि निकलती है।
  • ट/र: तर्जनी से स्याही के मध्य भाग में आघात करके दबा देने से 'ट' या 'र' बजता है। बजाते समय शेष उंगलियाँ ऊपर की ओर उठी होनी चाहिए।
  • तूं/तू: दाहिने तबले में स्याही के किनारे पर तर्जनी से आघात करने पर 'तूं' या 'तू' उत्पन्न होता है। इस समय उंगलियों का कोई भी अन्य हिस्सा तबले से नहीं छूना चाहिए।
  • न/ता/दीं/थुं: हाथ की चारों उंगलियों को आपस में जोड़कर दाहिने तबले की स्याही के शीर्ष भाग पर आघात करके उठा लेने से 'थुं' या 'दीं' की ध्वनि उत्पन्न होती है।

डग्गे (बायें तबले) पर निकलने वाले वर्णों की निकास विधि

  • कत/के/कि: बायें हाथ की कलाई को मैदान में रखते हुए चारों उंगलियों को आपस में मिलाने और बायें तबले के किनारे पर आघात कर उसे दबा देने से 'कत', 'के' या 'कि' की ध्वनि निकलती है।
  • घे/गे: डग्गे पर बायें हाथ की कलाई को मैदान में रखते हुए मध्यमा और अनामिका उंगलियों को आपस में जोड़कर स्याही और किनारे के बीच के स्थान पर आघात करने से 'घे' या 'गे' उत्पन्न होती है।

तबला और डग्गे पर बजने वाले संयुक्त बोल तथा निकास

  • तिर/तिट: 'तिट' दाहिने तबले पर बजने वाला बोल है। मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका को जोड़कर स्याही के मध्य में आघात से 'ति' और तर्जनी से स्याही के मध्य में आघात से 'ट' वर्ण बजता है।
  • तिरकिट: यह दाहिने और बायें हाथ को मिलाकर बजता है। डग्गे पर बायें हाथ की कलाई 'तिर' के समान 'तिट' को मैदान में रखते हुए, चारों उंगलियों को मिलाकर किनारे पर मध्यमा व अनामिका से आघात करने पर 'कि' निकलता है। इसे मिलाकर 'तिरकिट' संयुक्त बोल बनता है।
  • गदिगन: डग्गे और दाहिने तबले का संयुक्त बोल। दाहिने तबले पर चारों उंगलियों को जोड़कर 'दी' बजाते हुए, 'ग' के लिए डग्गे पर आघात, फिर दाहिने तबले की स्याही के निचले भाग में 'न' बजाते हुए पुनः डग्गे पर 'ग' बजाने से 'गदिगन' बनता है।
  • घिड़नग: डग्गे पर 'घे' या 'घि' बजाते हुए, दाहिने तबले पर मध्यमा और अनामिका से स्याही के मध्य में आघात करके चाँट पर 'न' और 'ग' बोल बजाते हुए तर्जनी से डग्गे पर बजाने से 'घिड़नग' बोल बनता है।
  • धागे तिट: दाहिने और बायें तबले पर संयुक्त रूप से 'गे' बजाते हुए तर्जनी से डग्गे पर 'धा' बजाते हैं और दाहिने तबले पर 'तिट' बोल बजाते हैं।
  • दींदीं: दाहिने तबले पर स्याही के शीर्ष पर चारों उंगलियों को मिलाकर दो बार आघात कर हाथ उठाने से 'दींदीं' बोल बजता है।
पखावज के बोल एवं वर्ण

भारतीय संगीत में पखावज के वर्णों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। आरंभिक चरण में इसमें सिर्फ चार वर्ण माने जाते थे— ता, दीं, थुं और ना। आधुनिक युग के अधिकांश विद्वान पखावज के कुल वर्णों की संख्या सात मानते हैं, जिनमें 'ता', 'दीं', 'थुं', 'ना' के अलावा ते, टे और क शामिल हैं।

पखावज के प्रमुख वर्णों की निकास विधि

  • ता: दाहिने हाथ के निचले हिस्से अर्थात् हथेली से दाहिनी पूड़ी पर पूरा और खुला आघात करने से उत्पन्न होने वाली ध्वनि को 'ता' कहा जाता है। इसे थाप या थपिया भी कहते हैं।
  • दीं: दाहिने हाथ की पाँचों उंगलियों को एक साथ मिलाकर जब अंजलि (कप) की तरह बनाकर पखावज की दाहिनी पूड़ी की स्याही पर खुला प्रहार करते हैं, तो 'दीं' ध्वनि निकलती है।
  • थुं: बायें हाथ की पाँचों उंगलियों को एक साथ अंजलि जैसा मोड़कर जब पखावज के बायें मुख पर लगे आटे पर खुला प्रहार करते हैं, तो उसे 'थुं' कहा जाता है।
  • ना: दायें हाथ की तर्जनी उंगली से पखावज के दाहिने मुख की चाँटी पर हल्का प्रहार करने से 'ना' ध्वनि उत्पन्न होती है।
  • ते: कनिष्ठिका, अनामिका और मध्यमा उंगलियों को एक साथ मिलाकर पखावज के दायें मुख पर बंद वादन करने से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, उसे 'ते', 'ति' और 'ट' कहा जाता है।
  • टे: तर्जनी उंगली को अँगूठे के साथ संयुक्त करके पखावज के दायें मुख पर बजाने से निकलने वाली ध्वनि को 'टे', 'ट', 'र' आदि की संज्ञा दी जाती है।
  • क, की और कत्: बायें हाथ की पाँचों उंगलियों को एक साथ जोड़कर पखावज के बायें मुख पर बंद आघात करने से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, वह 'क', 'की' और 'कत्' के अंतर्गत आती है।
  • धा: यह एक संयुक्त वर्ण है, जो दाहिने हाथ से 'ता' और बायें हाथ से 'ग' को एक साथ बजाने से ध्वनित होता है।
  • धुमकिट: यह पखावज का प्रमुख बोल है। इसमें 'धु' बायें मुख पर 'दीं' की तरह, 'म' दाहिने मुख पर, 'कि' बायें पर और 'ट' दाहिने तबले पर बजता है।

पढ़ंत और बजंत का विशेष नियम

पखावज के विद्यार्थियों को ध्यान रखना होता है कि इसके बोलने (पढ़ंत) और बजाने (बजंत) में कई बार अंतर हो जाता है:

  • जैसे तक्का थुंगा में 'त' बायें पर 'क' की तरह बजेगा और 'क' दाहिने पर 'ता' की तरह। अर्थात् बोलेंगे 'तक्का' और बजाएँगे 'का'।
  • इसी तरह 'थुं' बायें पर बजेगा और 'गा' दाहिने मुख पर 'ता' की तरह।
  • पखावज पर तकिट तका बोल को कतिटकता की तरह बजाया जाता है।
महान कलाकार जीवनी: नाना पानसे

पखावज और तबला वादन के क्षेत्र में नाना पानसे का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने पखावज वादन शैली में क्रांतिकारी सुधार किए।

जीवन परिचय एवं शिक्षा

  • जन्म स्थान: सतारा जनपद के वाई नामक स्थान के पास, बनधन (महाराष्ट्र)।
  • समय: उन्नीसवीं शताब्दी।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: इनका परिवार कीर्तनकारों का धार्मिक परिवार था, जहाँ पखावज की संगति नियमित रूप से होती थी।
  • प्रथम गुरु: पखावज पर हाथ रखना सर्वप्रथम इनके पिता ने ही इन्हें सिखाया।
  • अन्य गुरु: पुणे के मान्याबा कोड़ीतकर, चौन्डे बुवा, मार्तंड बुवा, बाबू जोध सिंह और योगीराज माधव स्वामी से इन्होंने पखावज की उच्च शिक्षा ग्रहण की।
  • वास्तविक नाम: इनका वास्तविक नाम नारायण थोरपे था। घर का नाम 'नाना' था और लगभग पाँच सौ शिष्यों को तबला व पखावज सिखाने के कारण इनके नाम के साथ 'पानसे' शब्द जुड़ गया।

कलात्मक योगदान एवं विशेषताएँ

  • राजकीय संरक्षण: नाना जीवन भर इंदौर के राज दरबार से जुड़े रहे। कई अन्य राजाओं के निमंत्रण और प्रलोभनों के बावजूद वे इंदौर में ही रहे। इंदौर के कृष्णपुरा मोहल्ले की जिस गली में वे रहते थे, उसे आज भी 'पानसे गली' कहा जाता है।
  • स्वभाव: वे अत्यंत शांत, सौम्य और निराभिमानी स्वभाव के थे। उन्होंने कभी किसी से प्रतियोगिता नहीं की और न ही किसी को पराजित करने का प्रयास किया।
  • शैलीगत सुधार: प्राचीन शास्त्रीय ग्रंथों के आधार पर इन्होंने कई तालों के ठेकों का नवीनीकरण किया।
  • उंगलियों पर मात्रा गिनने की परंपरा: माना जाता है कि संगीत में उंगलियों पर मात्रा गिनने की परंपरा नाना पानसे ने ही आरंभ की थी।
  • नवीन ताल की रचना: इन्होंने सुदर्शन नामक एक नवीन ताल की रचना की थी।
  • प्रमुख बोल रचनाएँ: उनकी रचनाओं में पखावज और तबले की निकटता दिखती है। उनके द्वारा रचित बोल मधुर, कर्णप्रिय और कम परिश्रम से द्रुत गति में बजने योग्य हैं। उनकी रचनाओं में तकतक, धुमकिट, कीटितक, घिड़नग, तिरकिट, तगिन्न और गदिगन आदि बोलों की प्रधानता है।
  • शिष्य परंपरा: उन्होंने पखावज, तबला और कथक नृत्य—तीनों विधाओं में शिष्यों को तैयार किया। आज मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बजने वाले पखावज का बहुत बड़ा श्रेय नाना पानसे और उनके सैकड़ों शिष्यों को जाता है।
अभ्यास एवं मूल्यांकन

सही और गलत कथन

  1. तबला वाद्य पर बजने वाले मूलतः 16 वर्ण माने जाते हैं। (गलत - मूलतः 10 वर्ण हैं)
  2. 'दीं' एक संयुक्त वर्ण है। (गलत)
  3. 'तीं' वर्ण तबले की लव पर बजाया जाता है। (सही)
  4. 'तिट' बोल डग्गे की स्याही पर बजने वाला बोल है। (गलत - यह दाहिने तबले पर बजता है)
  5. 'तिरकिट' एक ऐसा बोल है जो तबला और डग्गे पर बजता है। (सही)
  6. 'तूना' बोल सिर्फ तबले पर बजाया जाता है। (सही)
  7. 'क' वर्ण तबले की स्याही पर बजने वाला वर्ण है। (गलत - यह डग्गे पर बजता है)
  8. बोल का अर्थ ही वर्ण होता है। (गलत)