Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 4: तबला एवं पखावज वाद्यों की उत्पत्ति एवं विकास

तबला वाद्य की उत्पत्ति एवं विकास

नामकरण एवं अर्थ

तबला शब्द अरबी भाषा की तब्‍ल संज्ञा से आया है, जिसका सामान्य अर्थ सपाट सतह होता है। अरब में प्रचलित तबल सामी और अन्य अवनद्ध वाद्य लगभग नगाड़ों की तरह थे। 18वीं शताब्दी के लगभग जब यह जोड़ी वाद्य शास्त्रीय संगीत में लोकप्रिय हुआ, तो इसके दोनों हिस्सों को मिलाकर तबला वाद्य कहा गया। यह दो वाद्यों का सम्मिलित स्वरूप है: दाहिना भाग (तबला या दाहिना) और बायाँ भाग (डग्‍गा या बायाँ)।

आविष्कार संबंधी विभिन्न मत

  • पखावज को काटकर बनाने का मत: एक पुराना मत था कि पखावज को बीच से काटकर तबला बनाया गया। विद्वानों ने इसका खंडन किया क्योंकि पखावज को काटने पर उसका निचला भाग खुला रहेगा (विदेशी वाद्य बौंगो की तरह), जबकि तबले के दोनों भाग नीचे से बंद होते हैं।
  • साम्ब वाद्य का मत: पौराणिक काल में दो भिन्न ध्वनि वाले नगाड़ों का वादन होता था जिन्हें साम्ब कहते थे (एक नर और दूसरा मादा)। संभवतः यही तबले की जोड़ी का आधार बना।
  • अमीर खुसरो का मत (13वीं शताब्दी): अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि अमीर खुसरो (1253-1325 ई.) को आविष्कारक माना जाता है, परंतु उनकी किसी पुस्तक में इसका उल्लेख नहीं है। अतः इस मत को प्रामाणिक नहीं माना जाता।
  • खुसरो खाँ का मत (18वीं शताब्दी): मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले के दरबारी गायक सदारंग और अदारंग के भाई खुसरो खाँ ने खयाल गायन की संगति के लिए तबला सदृश वाद्य को शास्त्रीय संगीत में प्रचलित किया। खयाल शैली के लिए पखावज का गंभीर नाद अनुकूल नहीं था।
  • हुडुक्का का भेद: डॉ. लालमणि मिश्र के अनुसार तबला सदृश वाद्य समाज में पहले से हुडुक्का के एक भेद के रूप में प्रचलित था, जिसका वर्णन जयपुर के शासक सवाई प्रताप सिंह देव कृत राधा गोविन्द संगीत सार में मिलता है।
  • प्राचीन मूर्तिकला प्रमाण: डॉ. अबान मिस्त्री की पुस्तक 'पखावज और तबला के घराने एवं परंपराएँ' के अनुसार महाराष्ट्र की भाजा गुफा (दूसरी शताब्दी ई.पू.) में एक स्त्री की मूर्ति उकेरी गई है जो कमर से तबला-डग्गा सदृश जोड़ी वाद्य बाँधकर बजा रही है। इससे सिद्ध होता है कि यह वाद्य मुस्लिम शासकों के आगमन से बहुत पहले से भारत में विद्यमान था।
पखावज वाद्य की उत्पत्ति एवं विकास

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मृदंग या पखावज भारतीय संगीत का एक प्रमुख अवनद्ध वाद्य है। ऐतिहासिक दृष्टि से भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में सर्वप्रथम मृदंग का वर्णन त्रिपुष्कर वाद्य के रूप में मिलता है। वैदिक साहित्य में दुन्दुभी और भूमि-दुन्दुभी का उल्लेख है, परंतु मृदंग का नहीं। रामायण और महाभारत काल में वीणा और मृदंग का अत्यधिक प्रचार था।

त्रिपुष्कर से मृदंग का विकास

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार त्रिपुष्कर वाद्य के तीन भाग थे:

भाग का नामस्थिति एवं वादन विधिआधुनिक विकसित रूप
आंगिकलेटा हुआ भाग, गोद में रखकर बजाया जाने वालामृदंग / पखावज / मृदंगम्
ऊर्ध्वकखड़ा (ऊर्ध्वाधर) भागतबला (दाहिना)
आलिंग्यखड़ा (ऊर्ध्वाधर) भागडग्गा (बायाँ)

7वीं शताब्दी के बाद त्रिपुष्कर की आकृति में परिवर्तन हुआ। 12वीं-13वीं शताब्दी तक ऊर्ध्वक और आलिंग्य हिस्से हट गए और केवल आंगिक भाग बचा, जो आगे चलकर मृदंग कहलाया। वर्तमान उत्तर भारत का पखावज और दक्षिण भारत का मृदंगम् इसी त्रिपुष्कर के परिष्कृत रूप हैं।

'पखावज' शब्द की व्युत्पत्ति

कुछ विद्वानों के अनुसार पखावज शब्द पक्ष वाद्य से बना है। 'पक्ष' का तात्पर्य भुजाओं से है; दोनों भुजाओं के माध्यम से जिसके दोनों मुखों पर वादन किया जाए वह पक्ष वाद्य कहलाया। बोलचाल में 'पक्ष' का 'पख' और 'वाद्य' का 'बाज' होकर पखावज बना। गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल में इसे आज भी पखवाज कहा जाता है।

वाद्य निर्माण सामग्री एवं तकनीकी विकास

निर्माण सामग्री का विकास

भरतकाल में इन वाद्यों के खोल मिट्टी से बनाए जाते थे। कालांतर में इन्हें लकड़ी (काष्ठ) से निर्मित किया जाने लगा। वर्तमान में डग्गा (बायाँ) पीतल, ताँबा अथवा मिट्टी से भी बनाया जाता है। पंजाब प्रांत में तबले के बाएँ भाग को धामा कहते हैं, जिस पर आज भी गीला आटा लगाने की परंपरा है।

स्याही एवं लेपन तकनीक (मनुष्य का अभिनव चिंतन)

भरतकाल में मृदंग को इच्छित स्वरों में मिलाने के लिए मृत्तिका (मिट्टी) लेपन किया जाता था। मिट्टी अनुपलब्ध होने पर गुड़ और चावल का लेप लगाया जाता था। बाद में लौह चूर्ण (लोहे का बुरादा) उपलब्ध होने पर उसे पके हुए चावल या आटे की माढ़ में मिलाकर स्याही का निर्माण किया गया।

  • पखावज की विशेषता: पखावज एक ही लकड़ी के खोल से बना द्विमुखी वाद्य है, जिसके दोनों मुख एक ही रस्सी या बद्धी से कसे होते हैं। इसके दाहिने मुख पर स्थायी स्याही का लेप होता है। यदि बाएँ मुख पर भी स्याही लगाई जाए तो दोनों मुखों को संवादी स्वरों में मिलाना कठिन हो जाता है। इसलिए बाएँ मुख पर वादन से पूर्व गेहूँ का गीला आटा सानकर लगाया जाता है, जिससे गंभीर नाद उत्पन्न होता है। कार्यक्रम समाप्ति के बाद इसे हटा दिया जाता है।
महान संगीतज्ञ जीवनी: कुदऊ सिंह

जीवन परिचय एवं सम्मान

महान पखावज वादक कुदऊ सिंह का जन्म लगभग 1812 ई. और मृत्यु 1907 ई. में हुई। बचपन में माता-पिता के देहांत के बाद उन्होंने मथुरा के प्रसिद्ध गुरु भवानी दीन (भवानी सिंह/भवानी दास) से पखावज की शिक्षा प्राप्त की।

  • उपाधियाँ: अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ने उन्हें सदा कुंवर (कुंवर दास) की उपाधि दी। दतिया के राजा भवानी सिंह ने उन्हें सिंह की उपाधि प्रदान की। उन्हें मृदंग सम्राट भी कहा जाता है।
  • पुरस्कार: प्रसिद्ध पखावजी जोध सिंह को प्रतियोगिता में हराकर एक लाख रुपये का पुरस्कार जीता। रीवा के राजा ने एक कठिन परन पर प्रसन्न होकर सवा लाख रुपये पुरस्कार स्वरूप दिए।
  • राजकीय संरक्षण: रीवा, रामपुर, झाँसी, बाँदा, कवर्धा और दतिया के राजाओं का संरक्षण प्राप्त था।

वादन शैली एवं शिष्य परंपरा

कुदऊ सिंह की वादन शैली ओजपूर्ण और गंभीर थी, जिसमें हथेली का प्रयोग अधिक होता था। उनकी परंपरा का बाज खुला बाज कहलाता है।

  • प्रमुख बोल: धड़गण, धड़न्न, तड़न्न, धिलांग, धमुकिटतक, क्रिधित, तक्काथंग आदि कठिन बोलों का प्रयोग।
  • शिष्य परंपरा: उनके प्रमुख शिष्यों में उनके छोटे भाई राम सिंह, भतीजे जानकी प्रसाद और दामाद काशी प्रसाद शामिल थे। जानकी प्रसाद के पुत्र गया प्रसाद और पौत्र पद्मश्री पंडित अयोध्या प्रसाद श्रेष्ठ पखावजी हुए। वर्तमान में अयोध्या प्रसाद के सबसे छोटे पुत्र पंडित रामजी लाल शर्मा इस परंपरा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
नाट्यशास्त्र में अवनद्ध वाद्य

पुष्कर वाद्य की उत्पत्ति कथा

भरतमुनि रचित नाट्यशास्त्र (दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईस्वी) के 34वें अध्याय में अवनद्ध वाद्यों का विस्तृत वर्णन है। भरतमुनि ने अवनद्ध वाद्यों को पुष्कर वाद्य कहा है।

कथा के अनुसार, स्वाति नाम के ऋषि वर्षाकाल में जब पुष्कर (तालाब) में स्नान करने गए, तो कमल के पत्तों पर पड़ने वाली वर्षा की बूँदों से उत्पन्न ध्वनियों को सुनकर उन्हें अवनद्ध वाद्यों के निर्माण का विचार आया। उन्होंने विश्वकर्मा की सहायता से इन वाद्यों का निर्माण किया।

प्रमुख अवनद्ध वाद्यों का वर्गीकरण

नाट्यशास्त्र में मृदंग, पणव और दर्दुर को सम्मिलित रूप से पुष्करत्रयी कहा गया है, जो तत्कालीन मार्ग संगीत के मुख्य वाद्य थे।

वाद्य का नामश्रेणीआधुनिक रूप / समानताविशेषताएँ एवं वादन विधि
मृदंगमुख्य वाद्य (त्रिपुष्कर)पखावज / तबला जोड़ीतीन भागों (आंगिक, ऊर्ध्वक, आलिंग्य) का सम्मिलित रूप। इच्छित स्वरों में मिलाया जा सकने वाला उन्नत वाद्य।
पणवअंग वाद्यहुडुक्का / डमरू सदृशलम्बाई लगभग डेढ़ हाथ (2 से 2.5 फीट)। दोनों मुखों पर चमड़ा एक ही डोरी से कसा होता था। रस्सी को दबाकर या ढीला करके स्वर परिवर्तन किया जाता था।
पटहप्रत्यंग वाद्यढोलकअत्यंत लोकप्रिय वाद्य। स्याही (मिट्टी लेपन) न होने के कारण इसमें 'आस' कम होती थी। शास्त्रीय एवं लोक संगीत दोनों में प्रयुक्त।
दर्दुरअंग वाद्यघड़ा / घटम्'घट' (मटके) के आकार का वाद्य जिसके मुख पर बाँस का घेरा बनाकर चमड़ा मढ़ा जाता था। बाद में चमड़े का प्रयोग समाप्त होकर यह केवल घटम् के रूप में प्रचलित हुआ।
झल्लरीप्रत्यंग वाद्यडफ / खंजरी सदृशचमड़े को एक हाथ की उँगलियों से दबाकर दूसरे हाथ से आघात कर नाद वैविध्य उत्पन्न किया जाता था। कर्नाटक संगीत में अधिक प्रयुक्त।

इनके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र में झंझा, दुन्दुभी, डिंडिम और भेरी आदि अवनद्ध वाद्यों का भी उल्लेख मिलता है।