तबला शब्द अरबी भाषा की तब्ल संज्ञा से आया है, जिसका सामान्य अर्थ सपाट सतह होता है। अरब में प्रचलित तबल सामी और अन्य अवनद्ध वाद्य लगभग नगाड़ों की तरह थे। 18वीं शताब्दी के लगभग जब यह जोड़ी वाद्य शास्त्रीय संगीत में लोकप्रिय हुआ, तो इसके दोनों हिस्सों को मिलाकर तबला वाद्य कहा गया। यह दो वाद्यों का सम्मिलित स्वरूप है: दाहिना भाग (तबला या दाहिना) और बायाँ भाग (डग्गा या बायाँ)।
मृदंग या पखावज भारतीय संगीत का एक प्रमुख अवनद्ध वाद्य है। ऐतिहासिक दृष्टि से भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में सर्वप्रथम मृदंग का वर्णन त्रिपुष्कर वाद्य के रूप में मिलता है। वैदिक साहित्य में दुन्दुभी और भूमि-दुन्दुभी का उल्लेख है, परंतु मृदंग का नहीं। रामायण और महाभारत काल में वीणा और मृदंग का अत्यधिक प्रचार था।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार त्रिपुष्कर वाद्य के तीन भाग थे:
| भाग का नाम | स्थिति एवं वादन विधि | आधुनिक विकसित रूप |
|---|---|---|
| आंगिक | लेटा हुआ भाग, गोद में रखकर बजाया जाने वाला | मृदंग / पखावज / मृदंगम् |
| ऊर्ध्वक | खड़ा (ऊर्ध्वाधर) भाग | तबला (दाहिना) |
| आलिंग्य | खड़ा (ऊर्ध्वाधर) भाग | डग्गा (बायाँ) |
7वीं शताब्दी के बाद त्रिपुष्कर की आकृति में परिवर्तन हुआ। 12वीं-13वीं शताब्दी तक ऊर्ध्वक और आलिंग्य हिस्से हट गए और केवल आंगिक भाग बचा, जो आगे चलकर मृदंग कहलाया। वर्तमान उत्तर भारत का पखावज और दक्षिण भारत का मृदंगम् इसी त्रिपुष्कर के परिष्कृत रूप हैं।
कुछ विद्वानों के अनुसार पखावज शब्द पक्ष वाद्य से बना है। 'पक्ष' का तात्पर्य भुजाओं से है; दोनों भुजाओं के माध्यम से जिसके दोनों मुखों पर वादन किया जाए वह पक्ष वाद्य कहलाया। बोलचाल में 'पक्ष' का 'पख' और 'वाद्य' का 'बाज' होकर पखावज बना। गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल में इसे आज भी पखवाज कहा जाता है।
भरतकाल में इन वाद्यों के खोल मिट्टी से बनाए जाते थे। कालांतर में इन्हें लकड़ी (काष्ठ) से निर्मित किया जाने लगा। वर्तमान में डग्गा (बायाँ) पीतल, ताँबा अथवा मिट्टी से भी बनाया जाता है। पंजाब प्रांत में तबले के बाएँ भाग को धामा कहते हैं, जिस पर आज भी गीला आटा लगाने की परंपरा है।
भरतकाल में मृदंग को इच्छित स्वरों में मिलाने के लिए मृत्तिका (मिट्टी) लेपन किया जाता था। मिट्टी अनुपलब्ध होने पर गुड़ और चावल का लेप लगाया जाता था। बाद में लौह चूर्ण (लोहे का बुरादा) उपलब्ध होने पर उसे पके हुए चावल या आटे की माढ़ में मिलाकर स्याही का निर्माण किया गया।
महान पखावज वादक कुदऊ सिंह का जन्म लगभग 1812 ई. और मृत्यु 1907 ई. में हुई। बचपन में माता-पिता के देहांत के बाद उन्होंने मथुरा के प्रसिद्ध गुरु भवानी दीन (भवानी सिंह/भवानी दास) से पखावज की शिक्षा प्राप्त की।
कुदऊ सिंह की वादन शैली ओजपूर्ण और गंभीर थी, जिसमें हथेली का प्रयोग अधिक होता था। उनकी परंपरा का बाज खुला बाज कहलाता है।
भरतमुनि रचित नाट्यशास्त्र (दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईस्वी) के 34वें अध्याय में अवनद्ध वाद्यों का विस्तृत वर्णन है। भरतमुनि ने अवनद्ध वाद्यों को पुष्कर वाद्य कहा है।
कथा के अनुसार, स्वाति नाम के ऋषि वर्षाकाल में जब पुष्कर (तालाब) में स्नान करने गए, तो कमल के पत्तों पर पड़ने वाली वर्षा की बूँदों से उत्पन्न ध्वनियों को सुनकर उन्हें अवनद्ध वाद्यों के निर्माण का विचार आया। उन्होंने विश्वकर्मा की सहायता से इन वाद्यों का निर्माण किया।
नाट्यशास्त्र में मृदंग, पणव और दर्दुर को सम्मिलित रूप से पुष्करत्रयी कहा गया है, जो तत्कालीन मार्ग संगीत के मुख्य वाद्य थे।
| वाद्य का नाम | श्रेणी | आधुनिक रूप / समानता | विशेषताएँ एवं वादन विधि |
|---|---|---|---|
| मृदंग | मुख्य वाद्य (त्रिपुष्कर) | पखावज / तबला जोड़ी | तीन भागों (आंगिक, ऊर्ध्वक, आलिंग्य) का सम्मिलित रूप। इच्छित स्वरों में मिलाया जा सकने वाला उन्नत वाद्य। |
| पणव | अंग वाद्य | हुडुक्का / डमरू सदृश | लम्बाई लगभग डेढ़ हाथ (2 से 2.5 फीट)। दोनों मुखों पर चमड़ा एक ही डोरी से कसा होता था। रस्सी को दबाकर या ढीला करके स्वर परिवर्तन किया जाता था। |
| पटह | प्रत्यंग वाद्य | ढोलक | अत्यंत लोकप्रिय वाद्य। स्याही (मिट्टी लेपन) न होने के कारण इसमें 'आस' कम होती थी। शास्त्रीय एवं लोक संगीत दोनों में प्रयुक्त। |
| दर्दुर | अंग वाद्य | घड़ा / घटम् | 'घट' (मटके) के आकार का वाद्य जिसके मुख पर बाँस का घेरा बनाकर चमड़ा मढ़ा जाता था। बाद में चमड़े का प्रयोग समाप्त होकर यह केवल घटम् के रूप में प्रचलित हुआ। |
| झल्लरी | प्रत्यंग वाद्य | डफ / खंजरी सदृश | चमड़े को एक हाथ की उँगलियों से दबाकर दूसरे हाथ से आघात कर नाद वैविध्य उत्पन्न किया जाता था। कर्नाटक संगीत में अधिक प्रयुक्त। |
इनके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र में झंझा, दुन्दुभी, डिंडिम और भेरी आदि अवनद्ध वाद्यों का भी उल्लेख मिलता है।