Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 5: ताल-लिपि पद्धति एवं विभिन्न ठेके

ताल-लिपि पद्धति का परिचय एवं इतिहास

मानव सभ्यता के विकास के साथ अपने अनुभवों और विचारों को सुरक्षित रखने के लिए लिपि का जन्म हुआ। संगीत को लिपिबद्ध करना उसे सुरक्षा कवच प्रदान करने जैसा है, जिससे बंदिशों और तालों के मूल स्वरूप की रक्षा होती है। आधुनिक काल (18वीं-19वीं शताब्दी) में विभिन्न विद्वानों जैसे मौलाबख्श, सौरेन्द्र मोहन टैगोर, क्षेत्र मोहन गोस्वामी, पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर तथा पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत को लिपिबद्ध करने के लिए अलग-अलग पद्धतियाँ अपनाईं।

मध्यकालीन समय का संक्षिप्त विवरण

प्राचीन काल में संगीत के शास्त्र पक्ष का लेखन भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से प्रारंभ हुआ। नाट्यशास्त्र में तालों की चर्चा करते समय लघु, गुरु और प्लुत का प्रयोग किया गया है।

वैदिक नामलघुगुरुप्लुत
मात्रा काल1 मात्रा2 मात्रा3 मात्रा
चिह्न1ऽऽ

इसके पश्चात बृहद्देशी के रचयिता मतंग तथा संगीत रत्नाकर के रचयिता शारंगदेव का योगदान भी उल्लेखनीय है।

आधुनिक काल की दो मुख्य लिपियाँ

  • भातखंडे स्वर या ताल लिपि पद्धति: पंडित विष्णु नारायण भातखंडे द्वारा निर्मित, जो अपनी सरलता और सहजता के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रचलित है।
  • पलुस्कर स्वर या ताल लिपि पद्धति: पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा प्रणीत पद्धति।
पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ताल-लिपि पद्धति की विशेषताएँ

पंडित भातखंडे द्वारा बनाई गई ताल-स्वर लिपि पद्धति की मुख्य विशेषताएँ और चिह्न निम्नलिखित हैं:

पंडित विष्णु नारायण भातखंडे - जीवनी एवं योगदान

पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म 10 अगस्त, 1860 को वालकेश्वर, मुंबई में हुआ था। उन्होंने संगीत में गायन, बाँसुरी और सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की। बी.ए. और एल.एल.बी. करने के बाद उन्होंने वकालत भी की, परंतु उनका मुख्य अनुराग संगीत में ही रहा।

प्रमुख तालों का परिचय एवं उनके ठेके

उत्तर भारतीय संगीत में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख तालों के ठेके, उनके विभाग, ताली-खाली और विभिन्न लयकारियों (दुगुन, तिगुन, चौगुन) का विवरण नीचे दिया गया है:

1. त्रिताल (तीनताल)

यह तबले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय ताल है। इसमें 16 मात्राएँ होती हैं जो 4/4/4/4 के चार विभागों में विभाजित होती हैं। इसमें पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर ताली तथा नौवीं मात्रा पर खाली होती है।

मात्रा12345678910111213141516
बोलधाधिंधिंधाधाधिंधिंधाधातिंतिंताताधिंधिंधा
चिह्न×203

2. एकताल

यह 12 मात्राओं का ताल है जिसमें 2/2/2/2/2/2 के छह विभाग होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11वीं मात्रा पर) और दो खाली (3 और 7वीं मात्रा पर) होती हैं।

मात्रा123456789101112
बोलधिंधिंधागेतिरकिटतूनाकत्ताधागेतिरकिटधिनना
चिह्न×02034

3. झपताल

यह खंड जाति का ताल है जिसमें 10 मात्राएँ और 2/3/2/3 के चार विभाग होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 3, 8वीं मात्रा पर) और एक खाली (6वीं मात्रा पर) होती है।

मात्रा12345678910
बोलधीनाधीधीनातीनाधीधीना
चिह्न×203

4. रूपक ताल

यह 7 मात्राओं का ताल है जिसमें 3/2/2 के तीन विभाग होते हैं। यह एकमात्र ऐसा ताल है जिसके सम (पहली मात्रा) पर खाली दर्शाया जाता है। इसकी चौथी और छठी मात्रा पर ताली होती है।

मात्रा1234567
बोलतींतींनाधीनाधीना
चिह्न⊗12

5. दादरा ताल

यह 6 मात्राओं का अत्यंत लोकप्रिय ताल है जिसमें 3/3 के दो विभाग होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और चौथी मात्रा पर खाली होती है। इसकी जाति तिस्त्र है।

मात्रा123456
बोलधाधीनाधातीना
चिह्न×0

6. कहरवा ताल

यह 8 मात्राओं का समपदी ताल है जिसमें 4/4 के दो विभाग होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और पाँचवीं मात्रा पर खाली होती है। यह सुगम और फिल्म संगीत में बहुत लोकप्रिय है।

मात्रा12345678
बोलधागेनतिनकधिन
चिह्न×0

7. चारताल (चौताल)

यह पखावज का अत्यंत प्राचीन और लोकप्रिय ताल है। इसमें 12 मात्राएँ और 2/2/2/2/2/2 के छह विभाग होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11) और दो खाली (3, 7) होती हैं।

मात्रा123456789101112
बोलधाधादिंताकिटधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×02034

8. सूलताल

यह पखावज का ताल है जिसमें 10 मात्राएँ और पाँच विभाग (2/2/2/2/2) होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 5, 7) और दो खाली (3, 9) होती हैं।

मात्रा12345678910
बोलधाधादिंताकिटधातिटकतगदिगन
चिह्न×0234

9. तीव्रा (तेवरा) ताल

यह पखावज का 7 मात्राओं का ताल है जिसमें 3/2/2 के तीन विभाग होते हैं। इसमें पहली, चौथी और छठी मात्रा पर ताली होती है; इसमें खाली नहीं होती।

मात्रा1234567
बोलधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×23

10. धमार ताल

यह 14 मात्राओं का ताल है जिसका प्रयोग होरी गायन की संगति के लिए पखावज और तबले पर किया जाता है। इसमें 5/2/3/4 के चार विभाग होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 6, 11) और एक खाली (8) होती है।

मात्रा1234567891011121314
बोलकधिटधिटधाऽगतिटतिटताऽ
चिह्न×203
महान संगीतज्ञों का जीवन परिचय

पंडित अनोखे लाल मिश्र

बनारस घराने के महान तबला वादक पंडित अनोखे लाल मिश्र का जन्म सन् 1914 में बनारस में हुआ था। उन्होंने तबला वादन की शिक्षा पंडित भैरव प्रसाद मिश्र से प्राप्त की। वे अपनी अद्भुत तैयारी और 'तिरकिट' के चमत्कारी वादन के लिए 'नाधिंधिना' के जादूगर नाम से विख्यात थे। उनका निधन 10 मार्च, 1958 को हुआ। उनके शिष्यों में पंडित राम मिश्र, पंडित ईश्वर लाल मिश्र और पंडित छोटे लाल मिश्र प्रमुख हैं।

पर्वत सिंह

पखावज सम्राट पर्वत सिंह का जन्म ग्वालियर में सन् 1879 के आसपास हुआ था। उनके पिता सुखदेव सिंह और प्रपितामह जोरावर सिंह ग्वालियर दरबार के विख्यात कलाकार थे। दरभंगा नरेश ने उन्हें 1926 में 'विद्याकला विशारद' की उपाधि से सम्मानित किया। उनका देहांत 18 जुलाई, 1951 को हुआ।

अभ्यास प्रश्न एवं सुमेलन

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

  1. झपताल में पाँचवीं मात्रा पर कौन-सा बोल है? - (ख) ना
  2. एकताल में कितने विभाग होते हैं? - (ख) छह
  3. दादरा में कितनी मात्राएँ हैं? - (घ) छह
  4. कहरवा ताल में कितने ताल के चिह्न होते हैं? - (घ) दो
  5. रूपक ताल का सम कहाँ दिखाया जाता है? - (क) पहली मात्रा

सुमेलित कीजिए

स्तम्भ 'क'स्तम्भ 'ख'
(क) क्रमिक पुस्तक मालिका4. विष्णु नारायण भातखंडे
(ख) गांधर्व महाविद्यालय2. 1901
(ग) धागे तिरकिट बोल5. एकताल
(घ) चारताल में तिटकत गदिगन3. 9, 10, 11, 12
(ङ) सूलताल की जाति6. चतस्त्र जाति
(च) छोटी गायन की ताल1. धमार