मानव सभ्यता के विकास के साथ अपने अनुभवों और विचारों को सुरक्षित रखने के लिए लिपि का जन्म हुआ। संगीत को लिपिबद्ध करना उसे सुरक्षा कवच प्रदान करने जैसा है, जिससे बंदिशों और तालों के मूल स्वरूप की रक्षा होती है। आधुनिक काल (18वीं-19वीं शताब्दी) में विभिन्न विद्वानों जैसे मौलाबख्श, सौरेन्द्र मोहन टैगोर, क्षेत्र मोहन गोस्वामी, पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर तथा पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत को लिपिबद्ध करने के लिए अलग-अलग पद्धतियाँ अपनाईं।
प्राचीन काल में संगीत के शास्त्र पक्ष का लेखन भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से प्रारंभ हुआ। नाट्यशास्त्र में तालों की चर्चा करते समय लघु, गुरु और प्लुत का प्रयोग किया गया है।
| वैदिक नाम | लघु | गुरु | प्लुत |
|---|---|---|---|
| मात्रा काल | 1 मात्रा | 2 मात्रा | 3 मात्रा |
| चिह्न | 1 | ऽ | ऽ |
इसके पश्चात बृहद्देशी के रचयिता मतंग तथा संगीत रत्नाकर के रचयिता शारंगदेव का योगदान भी उल्लेखनीय है।
पंडित भातखंडे द्वारा बनाई गई ताल-स्वर लिपि पद्धति की मुख्य विशेषताएँ और चिह्न निम्नलिखित हैं:
पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म 10 अगस्त, 1860 को वालकेश्वर, मुंबई में हुआ था। उन्होंने संगीत में गायन, बाँसुरी और सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की। बी.ए. और एल.एल.बी. करने के बाद उन्होंने वकालत भी की, परंतु उनका मुख्य अनुराग संगीत में ही रहा।
उत्तर भारतीय संगीत में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख तालों के ठेके, उनके विभाग, ताली-खाली और विभिन्न लयकारियों (दुगुन, तिगुन, चौगुन) का विवरण नीचे दिया गया है:
यह तबले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय ताल है। इसमें 16 मात्राएँ होती हैं जो 4/4/4/4 के चार विभागों में विभाजित होती हैं। इसमें पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर ताली तथा नौवीं मात्रा पर खाली होती है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | ता | धिं | धिं | धा |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
यह 12 मात्राओं का ताल है जिसमें 2/2/2/2/2/2 के छह विभाग होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11वीं मात्रा पर) और दो खाली (3 और 7वीं मात्रा पर) होती हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | क | त्ता | धागे | तिरकिट | धिन | ना |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
यह खंड जाति का ताल है जिसमें 10 मात्राएँ और 2/3/2/3 के चार विभाग होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 3, 8वीं मात्रा पर) और एक खाली (6वीं मात्रा पर) होती है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धी | ना | धी | धी | ना | ती | ना | धी | धी | ना |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
यह 7 मात्राओं का ताल है जिसमें 3/2/2 के तीन विभाग होते हैं। यह एकमात्र ऐसा ताल है जिसके सम (पहली मात्रा) पर खाली दर्शाया जाता है। इसकी चौथी और छठी मात्रा पर ताली होती है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | तीं | तीं | ना | धी | ना | धी | ना |
| चिह्न | ⊗ | 1 | 2 |
यह 6 मात्राओं का अत्यंत लोकप्रिय ताल है जिसमें 3/3 के दो विभाग होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और चौथी मात्रा पर खाली होती है। इसकी जाति तिस्त्र है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 |
|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धी | ना | धा | ती | ना |
| चिह्न | × | 0 |
यह 8 मात्राओं का समपदी ताल है जिसमें 4/4 के दो विभाग होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और पाँचवीं मात्रा पर खाली होती है। यह सुगम और फिल्म संगीत में बहुत लोकप्रिय है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | गे | न | ति | न | क | धि | न |
| चिह्न | × | 0 |
यह पखावज का अत्यंत प्राचीन और लोकप्रिय ताल है। इसमें 12 मात्राएँ और 2/2/2/2/2/2 के छह विभाग होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11) और दो खाली (3, 7) होती हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
यह पखावज का ताल है जिसमें 10 मात्राएँ और पाँच विभाग (2/2/2/2/2) होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 5, 7) और दो खाली (3, 9) होती हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 3 | 4 |
यह पखावज का 7 मात्राओं का ताल है जिसमें 3/2/2 के तीन विभाग होते हैं। इसमें पहली, चौथी और छठी मात्रा पर ताली होती है; इसमें खाली नहीं होती।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 2 | 3 |
यह 14 मात्राओं का ताल है जिसका प्रयोग होरी गायन की संगति के लिए पखावज और तबले पर किया जाता है। इसमें 5/2/3/4 के चार विभाग होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 6, 11) और एक खाली (8) होती है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | क | धि | ट | धि | ट | धा | ऽ | ग | ति | ट | ति | ट | ता | ऽ |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
बनारस घराने के महान तबला वादक पंडित अनोखे लाल मिश्र का जन्म सन् 1914 में बनारस में हुआ था। उन्होंने तबला वादन की शिक्षा पंडित भैरव प्रसाद मिश्र से प्राप्त की। वे अपनी अद्भुत तैयारी और 'तिरकिट' के चमत्कारी वादन के लिए 'नाधिंधिना' के जादूगर नाम से विख्यात थे। उनका निधन 10 मार्च, 1958 को हुआ। उनके शिष्यों में पंडित राम मिश्र, पंडित ईश्वर लाल मिश्र और पंडित छोटे लाल मिश्र प्रमुख हैं।
पखावज सम्राट पर्वत सिंह का जन्म ग्वालियर में सन् 1879 के आसपास हुआ था। उनके पिता सुखदेव सिंह और प्रपितामह जोरावर सिंह ग्वालियर दरबार के विख्यात कलाकार थे। दरभंगा नरेश ने उन्हें 1926 में 'विद्याकला विशारद' की उपाधि से सम्मानित किया। उनका देहांत 18 जुलाई, 1951 को हुआ।
| स्तम्भ 'क' | स्तम्भ 'ख' |
|---|---|
| (क) क्रमिक पुस्तक मालिका | 4. विष्णु नारायण भातखंडे |
| (ख) गांधर्व महाविद्यालय | 2. 1901 |
| (ग) धागे तिरकिट बोल | 5. एकताल |
| (घ) चारताल में तिटकत गदिगन | 3. 9, 10, 11, 12 |
| (ङ) सूलताल की जाति | 6. चतस्त्र जाति |
| (च) छोटी गायन की ताल | 1. धमार |