Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 6: पारिभाषिक शब्द

ध्वनि एवं नाद (Sound and Resonance)

संगीत का भौतिक और कलात्मक आधार ध्वनि है। ध्वनि के वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों का वर्गीकरण निम्नलिखित है:

ध्वनि (Sound)

  • परिभाषा: घर्षण अथवा आघात से उत्पन्न होने वाला कंपन या आंदोलन जो किसी ठोस, द्रव या वायु रूपी माध्यम से संचरित होकर कानों तक पहुँचता है।
  • श्रवण सीमा: मनुष्य के कान लगभग 20 हर्ट्स से 20 किलोहर्ट्स (20,000 हर्ट्स) आवृत्ति की तरंगों को सुन सकते हैं।
  • उत्पत्ति के स्रोत: तंत्री वाद्यों के तार, तबले की चमड़ी पर आघात, बाँसुरी में हवा का कंपन, झाँझ में धातु का कंपन तथा मनुष्य के कंठ में स्वर-तंत्रियों का कंपन।
  • ध्वनि के प्रकार:
    • मधुर ध्वनि: संगीतोपयोगी, नियमित और स्थिर आंदोलन वाली ध्वनि।
    • कटु ध्वनि (कोलाहल): अनियमित और अस्थिर आंदोलन वाली कर्णकटु ध्वनि।

नाद (Naad)

नियमित और स्थिर आंदोलन संख्या वाली संगीतोपयोगी ध्वनि को नाद कहते हैं। नाद से श्रुति, श्रुति से स्वर और स्वर से राग की उत्पत्ति होती है।

नाद के भेद:

  1. आहत नाद: दो वस्तुओं के आघात अथवा घर्षण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि। संगीत में इसी नाद का प्रयोग किया जाता है।
  2. अनाहत नाद: बिना किसी आघात के स्वतः उत्पन्न होने वाला नाद। इसे केवल एकाग्रता से अनुभव किया जा सकता है (जैसे कान बंद करने पर सुनाई देने वाली सूक्ष्म ध्वनि)।

नाद की विशेषताएँ (लक्षण):

  • नाद की तारता (Pitch): नाद का छोटा-बड़ा या नीचा-ऊँचा होना। जैसे-जैसे हम सप्तक में ऊपर चढ़ते हैं (सा से रे, रे से ग), तारता बढ़ती जाती है।
  • नाद का छोटा-बड़ापन या तीव्रता (Intensity/Volume): धीरे से उत्पन्न ध्वनि को छोटा नाद (कम दूरी तक सुनाई देने वाला) और ज़ोर से उत्पन्न ध्वनि को बड़ा नाद कहते हैं।
  • नाद की जाति अथवा गुण (Timbre/Klangfarbe): वह विशेषता जिसके कारण बिना देखे विभिन्न वाद्यों (जैसे सितार, तबला) या व्यक्तियों की आवाज़ पहचानी जा सके।
श्रुति, स्वर एवं सप्तक (Shruti, Swara and Saptak)

श्रुति (Shruti)

संगीत में उपयोगी वह स्पष्ट ध्वनि जो कानों को साफ़ सुनाई दे और जिसे अन्य ध्वनियों से अलग पहचाना जा सके।

"श्रूयते इति श्रुति"


भावार्थ: जिसे स्पष्ट रूप से सुना और समझा जा सके, वह श्रुति कहलाती है।

स्वर (Swara)

नाद के पाँच उत्पत्ति स्थान माने गए हैं: नाभि, हृदय, कंठ, मूर्धा और मुख।

  • शुद्ध स्वर: मुख्य सात स्वर - षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध), निषाद (नि)।
  • विकृत स्वर: अपने स्थान से हटने वाले स्वर। ये दो प्रकार के होते हैं:
    • कोमल विकृत: अपने नियत स्थान से नीचे उतरने वाले स्वर (रे, ग, ध, नि)।
    • तीव्र विकृत: अपने नियत स्थान से ऊपर चढ़ने वाला स्वर (म)।
  • अचल स्वर: जो अपने स्थान से कभी विचलित नहीं होते (सा और प)।
  • कुल स्वर संख्या: 7 शुद्ध + 5 विकृत = 12 स्वर।
  • आरोह: स्वरों का नीचे से ऊपर की ओर चढ़ता क्रम (सा रे ग म प ध नि)।
  • अवरोह: स्वरों का ऊपर से नीचे की ओर उतरता क्रम (सा नि ध प म ग रे सा)।

जैन आचार्य पार्श्वदेव (संगीत समयसार) के अनुसार स्वर उत्पत्ति स्थान:

  • सिर, कंठ, उर, तालु, जिह्वा और दाँत से षड्ज।
  • नाभि, कंठ और सिर की वायु से ऋषभ।
  • नाभि, कंठ और सिर से संबद्ध गंधर्वों को सुख देने वाला गांधार।
  • नाभि और हृदय से उत्पन्न वायु के मध्य स्थान में आने से मध्यम।
  • होंठ, तालु, कंठ, सिर और हृदय से पंचम।
  • वायु के होंठ, कंठ, तालु, सिर और हृदय से गुजरने पर धैवत।
  • कंठ, तालु और सिर के समर्थन के बिना स्वर समाप्ति पर निषाद।

पशु-पक्षियों की आवाज़ से स्वर उत्पत्ति की मान्यता:

मयूर से षड्ज, चातक से ऋषभ, बकरे से गांधार, कौवे से मध्यम, कोयल से पंचम, मेंढक से धैवत और हाथी से निषाद स्वर की उत्पत्ति मानी गई है।

सप्तक (Saptak)

सात शुद्ध स्वरों के समूह को सप्तक कहते हैं। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं:

  1. मन्द्र सप्तक: मध्य सप्तक से आधी आंदोलन संख्या या पिच वाले नीचे के स्वर।
  2. मध्य सप्तक: सामान्य बोलचाल और गायन का मुख्य सप्तक।
  3. तार सप्तक: मध्य सप्तक से दुगुनी आंदोलन संख्या या पिच वाले ऊँचे स्वर।
राग एवं लय विधान (Raga and Laya)

राग (Raga)

विशिष्ट स्वरों से बनने वाले रंजक ध्वनि समुदाय को राग कहते हैं।

"योऽसौ ध्वनि विशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः। रंजको जनचित्तानां स रागः कथितौ बुधैः।।"

— बृहद्देशी, तृतीय अध्याय, श्लोक 264


भावार्थ: ध्वनि की वह विशिष्ट रचना जो स्वर और वर्ण से सुशोभित हो तथा सुनने वालों के चित्त को प्रसन्न करे, उसे विद्वानों ने राग कहा है।

लय एवं उसके प्रकार (Laya and its Types)

गायन, वादन और नर्तन में समय की समान गति को लय कहते हैं। दो मात्राओं के बीच का अंतराल हमेशा समान रहता है। लय के तीन प्रकार हैं:

  1. विलंबित लय: अत्यंत धीमी गति। इसका उपयोग विलंबित खयाल, मसीतखानी गत आदि में होता है। इसके लिए झूमरा, तिलवाड़ा, एकताल, आड़ा चौताल आदि तालें उपयुक्त हैं।
  2. मध्य लय: साधारण गति (लगभग एक सेकंड प्रति मात्रा)। इसका उपयोग छोटा खयाल, रजाखानी गत, रेला आदि में होता है। इसके लिए त्रिताल, झपताल, रूपक आदि उपयोगी हैं।
  3. द्रुत लय: मध्य लय से दुगुनी तेज़ गति (लगभग आधा सेकंड प्रति मात्रा)। इसका उपयोग द्रुत खयाल, तराना, झाला, टुकड़ा, परन आदि में होता है।
ताल एवं उसके अंग (Taal and its Components)

ताल शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'तल्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ आधार या भित्ति है। यह संगीत को समय सीमा में बाँधने का साधन है।

मात्रा (Matra)

लय को मापने की सबसे छोटी इकाई को मात्रा कहते हैं।

एकताल (12 मात्रा, 6 विभाग, 4 ताली, 2 खाली):

मात्रा123456789101112
बोलधिंधिंधागेतिरकिटतूनाकत्ताधागेतिरकिटधीना
चिह्न×02034

तीव्रा ताल (7 मात्रा, 3 विभाग, 3 ताली, खाली नहीं):

मात्रा1234567
बोलधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×23

विभाग (Vibhag)

ताल की मात्राओं को निश्चित खंडों में बाँटना विभाग कहलाता है। यह ताली और खाली का सूचक होता है।

चारताल / चौताल (12 मात्रा, 6 विभाग, 4 ताली, 2 खाली):

मात्रा123456789101112
बोलधाधादिंताकिटधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×02034

ताली एवं खाली (Tali and Khali)

  • ताली (सशब्द क्रिया): हाथ से आघात करके विभाग की शुरुआत दर्शाना।
  • खाली (निशब्द क्रिया): हाथ हिलाकर शून्य या रिक्तता का भाव दर्शाना। इसे '0' चिह्न से दर्शाते हैं।

तीनताल (16 मात्रा, 4 विभाग, 3 ताली, 1 खाली):

बोलधा धिं धिं धाधा धिं धिं धाधा तिं तिं ताता धिं धिं धा
भातखंडे पद्धति चिह्न×203

सम (Sam)

ताल की पहली मात्रा को सम कहते हैं। इसे भातखंडे पद्धति में '×' चिह्न से दर्शाया जाता है। यह संगीत रचना का मुख्य केंद्र बिंदु है जहाँ कलाकार अपनी तान या तिहाई समाप्त कर वापस मिलता है।

रूपक ताल (7 मात्रा, 3 विभाग - सम पर खाली/ताली का अपवाद):

मात्रा1234567
बोलतींतींनाधीनाधीना
चिह्न⊗12

ठेका (Theka)

किसी ताल को पहचानने के लिए निश्चित किए गए उसके मूल बोलों को ठेका कहते हैं।

झपताल का ठेका (10 मात्रा, विभाग: 2/3/2/3):

मात्रा12345678910
बोलधीनाधीधीनातीनाधीधीना
चिह्न×203

आवर्तन या आवृत्ति (Avartan)

ताल की पहली मात्रा से अंतिम मात्रा तक के एक पूरे चक्र को आवर्तन कहते हैं।

तबला वादन की रचनाएँ (Tabla Compositions)

तिहाई (Tihai)

किसी छोटे बोल-समूह को तीन बार समान रूप से बजाकर सम पर समाप्त करने की क्रिया। इसके दो प्रकार हैं:

  • दमदार तिहाई: प्रत्येक भाग के बाद थोड़ा विराम (दम) लिया जाता है।
  • बेदम तिहाई: तीनों भागों के बीच कोई अंतराल या विराम नहीं होता।

कायदा (Kayda)

अरबी शब्द जिसका अर्थ 'नियम' या 'बंधन' है। यह तबले की मुख्य विस्तारशील बंदिश है जिसके दो भाग होते हैं - भरी (खुला) और खाली (बंद)। इसका विस्तार पलटों और तिहाई के साथ किया जाता है।

दिल्ली घराने का पारंपरिक कायदा (त्रिताल):

धाति टधा तिट धाधा | तिट धागे तिन किन | ताति टता तिट ताता | तिट धागे धिन गिन |

पलटा (Palta)

कायदे के मूल वर्णों को उलट-पलट कर नए-नए वर्ण संयोजनों द्वारा विस्तार करने की क्रिया को पलटा कहते हैं। विस्तार के दौरान कायदे के बाहर के बोलों का प्रयोग वर्जित होता है।

रेला (Rela)

अत्यंत द्रुत लय में बजाया जाने वाला प्रवाहपूर्ण बोल-समूह। इसमें तिरकिट, धिनगिन, धिड़नग, धिरधिर किटतक जैसे वर्णों की प्रधानता होती है।

मुखड़ा और मोहरा (Mukhda and Mohra)

  • मुखड़ा: सम को स्पष्ट करने के लिए बजाई जाने वाली छोटी, आकर्षक रचना जो आकार में छोटी होती है और सम से पहले किसी भी मात्रा से शुरू हो सकती है।
  • मोहरा: मुखड़े से बड़ा आकार और इसके अंत में एक तिहाई जुड़ी होती है। यह सामान्यतः आठ मात्राओं का होता है।

टुकड़ा (Tukda)

खुले और ज़ोरदार वर्णों से निर्मित वह रचना जो कम से कम एक आवर्तन की हो, जिसके अंत में तिहाई हो और जिसे केवल एक बार द्रुत लय में बजाया जाता है।

महान संगीतज्ञ: उस्ताद नत्थू खाँ (Ustad Nathu Khan)