संगीत का भौतिक और कलात्मक आधार ध्वनि है। ध्वनि के वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों का वर्गीकरण निम्नलिखित है:
नियमित और स्थिर आंदोलन संख्या वाली संगीतोपयोगी ध्वनि को नाद कहते हैं। नाद से श्रुति, श्रुति से स्वर और स्वर से राग की उत्पत्ति होती है।
संगीत में उपयोगी वह स्पष्ट ध्वनि जो कानों को साफ़ सुनाई दे और जिसे अन्य ध्वनियों से अलग पहचाना जा सके।
"श्रूयते इति श्रुति"
भावार्थ: जिसे स्पष्ट रूप से सुना और समझा जा सके, वह श्रुति कहलाती है।
नाद के पाँच उत्पत्ति स्थान माने गए हैं: नाभि, हृदय, कंठ, मूर्धा और मुख।
जैन आचार्य पार्श्वदेव (संगीत समयसार) के अनुसार स्वर उत्पत्ति स्थान:
- सिर, कंठ, उर, तालु, जिह्वा और दाँत से षड्ज।
- नाभि, कंठ और सिर की वायु से ऋषभ।
- नाभि, कंठ और सिर से संबद्ध गंधर्वों को सुख देने वाला गांधार।
- नाभि और हृदय से उत्पन्न वायु के मध्य स्थान में आने से मध्यम।
- होंठ, तालु, कंठ, सिर और हृदय से पंचम।
- वायु के होंठ, कंठ, तालु, सिर और हृदय से गुजरने पर धैवत।
- कंठ, तालु और सिर के समर्थन के बिना स्वर समाप्ति पर निषाद।
पशु-पक्षियों की आवाज़ से स्वर उत्पत्ति की मान्यता:
मयूर से षड्ज, चातक से ऋषभ, बकरे से गांधार, कौवे से मध्यम, कोयल से पंचम, मेंढक से धैवत और हाथी से निषाद स्वर की उत्पत्ति मानी गई है।
सात शुद्ध स्वरों के समूह को सप्तक कहते हैं। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं:
विशिष्ट स्वरों से बनने वाले रंजक ध्वनि समुदाय को राग कहते हैं।
"योऽसौ ध्वनि विशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः। रंजको जनचित्तानां स रागः कथितौ बुधैः।।"
— बृहद्देशी, तृतीय अध्याय, श्लोक 264
भावार्थ: ध्वनि की वह विशिष्ट रचना जो स्वर और वर्ण से सुशोभित हो तथा सुनने वालों के चित्त को प्रसन्न करे, उसे विद्वानों ने राग कहा है।
गायन, वादन और नर्तन में समय की समान गति को लय कहते हैं। दो मात्राओं के बीच का अंतराल हमेशा समान रहता है। लय के तीन प्रकार हैं:
ताल शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'तल्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ आधार या भित्ति है। यह संगीत को समय सीमा में बाँधने का साधन है।
लय को मापने की सबसे छोटी इकाई को मात्रा कहते हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | क | त्ता | धागे | तिरकिट | धी | ना |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 2 | 3 |
ताल की मात्राओं को निश्चित खंडों में बाँटना विभाग कहलाता है। यह ताली और खाली का सूचक होता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
| बोल | धा धिं धिं धा | धा धिं धिं धा | धा तिं तिं ता | ता धिं धिं धा | ||||||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भातखंडे पद्धति चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | ||||||||||||
ताल की पहली मात्रा को सम कहते हैं। इसे भातखंडे पद्धति में '×' चिह्न से दर्शाया जाता है। यह संगीत रचना का मुख्य केंद्र बिंदु है जहाँ कलाकार अपनी तान या तिहाई समाप्त कर वापस मिलता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | तीं | तीं | ना | धी | ना | धी | ना |
| चिह्न | ⊗ | 1 | 2 |
किसी ताल को पहचानने के लिए निश्चित किए गए उसके मूल बोलों को ठेका कहते हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धी | ना | धी | धी | ना | ती | ना | धी | धी | ना |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
ताल की पहली मात्रा से अंतिम मात्रा तक के एक पूरे चक्र को आवर्तन कहते हैं।
किसी छोटे बोल-समूह को तीन बार समान रूप से बजाकर सम पर समाप्त करने की क्रिया। इसके दो प्रकार हैं:
अरबी शब्द जिसका अर्थ 'नियम' या 'बंधन' है। यह तबले की मुख्य विस्तारशील बंदिश है जिसके दो भाग होते हैं - भरी (खुला) और खाली (बंद)। इसका विस्तार पलटों और तिहाई के साथ किया जाता है।
धाति टधा तिट धाधा | तिट धागे तिन किन | ताति टता तिट ताता | तिट धागे धिन गिन |
कायदे के मूल वर्णों को उलट-पलट कर नए-नए वर्ण संयोजनों द्वारा विस्तार करने की क्रिया को पलटा कहते हैं। विस्तार के दौरान कायदे के बाहर के बोलों का प्रयोग वर्जित होता है।
अत्यंत द्रुत लय में बजाया जाने वाला प्रवाहपूर्ण बोल-समूह। इसमें तिरकिट, धिनगिन, धिड़नग, धिरधिर किटतक जैसे वर्णों की प्रधानता होती है।
खुले और ज़ोरदार वर्णों से निर्मित वह रचना जो कम से कम एक आवर्तन की हो, जिसके अंत में तिहाई हो और जिसे केवल एक बार द्रुत लय में बजाया जाता है।