Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 7: भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण

वाद्य यंत्रों का परिचय एवं संगीत में महत्व

भारतीय संगीत में प्राचीन काल से ही वाद्य यंत्रों की एक समृद्ध परंपरा रही है। वाद्य का सामान्य अर्थ उन यंत्रों से है जिनसे संगीतमय ध्वनि उत्पन्न की जाती है।

वाद्य शब्द की व्युत्पत्ति एवं परिभाषा

  • व्युत्पत्ति: 'वाद्य' शब्द संस्कृत की 'वद' धातु से बना है, जिसका सामान्य अर्थ होता है— 'बोलना'।
  • परिभाषा: संगीतिक ध्वनि तथा गति प्रकट करने वाले उपकरण को वाद्य कहा जाता है।
  • उद्देश्य: किसी विशिष्ट वस्तु एवं पद्धति से निर्मित यंत्र पर थाप देकर, फूंककर या तारों में कंपन उत्पन्न करके लयबद्ध तरीके से संगीतमय ध्वनि उत्पन्न करना।

संगीत में वाद्यों का महत्व एवं उपयोगिता

  • कलात्मक विस्तार: कंठ संगीत, नृत्य अथवा नाटक को आकर्षक बनाने और श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए वाद्यों की सहायता अनिवार्य है।
  • भाव अभिव्यक्ति: वाद्यों का मुख्य कार्य गायन के माध्यम से अभिव्यक्त किए जा रहे भावों और रसों को अधिक सुंदर और आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करना है।
  • गात्र वीणा: प्राचीन ग्रंथों में मानव शरीर को भी एक प्राकृतिक वाद्य माना गया है, जिसे 'गात्र वीणा' कहा गया है।
  • ऐतिहासिक उपयोग: विभिन्न युगों में वाद्यों का प्रयोग संदेश देने, जंगली जानवरों को भगाने, शिकार करने, युद्ध भूमि में सैनिकों का उत्साह बढ़ाने (दुन्दुभी, शंख, ढोल, ताशा) तथा मांगलिक कार्यों (शहनाई, ढोलक, मंजीरा) में होता रहा है।
संगीत वाद्यों का वर्गीकरण (चतुर्विध वर्गीकरण)

भारतीय संगीत में वाद्यों के वर्गीकरण का मुख्य आधार 'ध्वनि उत्पत्ति की विधि' रहा है। सर्वप्रथम भरतमुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में वाद्यों का चतुर्विध (चार प्रकार का) वर्गीकरण किया है।

नाट्यशास्त्र के शास्त्रीय श्लोक

"तत चैवावनद्धं च घन सुषिरमेव च।
चतुर्विध तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम्।।"

भावार्थ: संगीत के वाद्य (आतोद्य) लक्षणों के अनुसार चार प्रकार के जानने चाहिए— तत, अवनद्ध, घन और सुषिर।

"तत तन्त्रीगतम्ज्ञेयमवनद्धं तु पौष्करम्।
घन तालस्तु विज्ञेय: सुषिरो वंश उच्यते।।"


भावार्थ: तंत्री (तार) वाले वाद्यों को 'तत', चमड़े से मढ़े वाद्यों (जैसे पुष्कर) को 'अवनद्ध', कांस्य आदि ताल वाद्यों को 'घन' और बांसुरी आदि फूंककर बजाए जाने वाले वाद्यों को 'सुषिर' जानना चाहिए।

चार प्रमुख वाद्य वर्ग

क्र. सं.वाद्य वर्गपरिभाषा व विशेषताप्रमुख उदाहरण
1तत् (तंत्री) वाद्यजिन वाद्यों में तार या तंत्री के कंपन से स्वर उत्पन्न किए जाते हैं। इन्हें उंगलियों, मिज़राब, जवा या गज (धनुष) से बजाया जाता है।तानपुरा, वीणा, सितार, सरोद, वायलिन, सारंगी, इसराज
2अवनद्ध वाद्यचमड़े से मढ़े हुए खोखले वाद्य, जिन पर हाथ या डंडी से आघात करके ध्वनि निकाली जाती है। इन्हें प्राचीन काल में मिट्टी से बनने के कारण 'मृदंग' भी कहा जाता था।तबला, पखावज, मृदंगम्, तविल, ढोलक, खोल, नगाड़ा, डफ
3सुषिर वाद्यजिन वाद्यों में हवा भरकर या फूंक मारकर वायु के कंपन द्वारा स्वर उत्पन्न किए जाते हैं। वायु के दबाव को नियंत्रित कर स्वर ऊँचा-नीचा किया जाता है।बांसुरी, शहनाई, शंख, नागस्वरम्, हारमोनियम, क्लैरोनेट, सैक्सोफ़ोन
4घन वाद्यये वाद्य मूलतः लकड़ी, कांसा, पीतल आदि धातुओं से बनते हैं। इन्हें आपस में टकराकर या डंडियों के प्रहार से बजाया जाता है। इनका मुख्य कार्य लय बनाए रखना है।घंटा, घंटी, झांझ, खरताल, मंजीरा, घुँघरू, मुरचंग
प्रमुख अवनद्ध वाद्यों का विस्तृत अध्ययन

अवनद्ध वाद्य ताल और लय को धारण करते हैं। वर्तमान समय में शास्त्रीय संगीत से लेकर लोक संगीत और सामाजिक उत्सवों तक इनका अत्यधिक महत्व है।

1. मृदंगम् (Mridangam)

  • क्षेत्र: दक्षिण भारतीय (कर्नाटक) संगीत का मुख्य अवनद्ध वाद्य।
  • बनावट: यह दो मुखी वाद्य है जिसे लिटाकर बजाया जाता है। इसका निर्माण मुख्यतः कटहल की लकड़ी से होता है।
  • आकार: लंबाई लगभग 22 से 24 इंच और मध्य घेरे का व्यास लगभग 12 इंच होता है।
  • दायाँ मुख: बाएं मुख की तुलना में छोटा होता है। इसके किनारे पर चमड़ा स्याही के स्थान को छोड़कर पूरी पूड़ी को घेरे रहता है, जिससे केवल 'चाँट' और 'स्याही' का भाग दिखता है। दक्षिण भारत में इस स्याही को 'सोरू' कहते हैं, जो लौह चूर्ण और पके चावल के मिश्रण से बनती है।
  • बायाँ मुख: इस पर वादन के समय सूजी की 'पूलिका' (लेप) लगाई जाती है ताकि गंभीर ध्वनि उत्पन्न हो सके।
  • कसावट: दोनों मुखों की पूड़ियों को चमड़े की बद्धी से कसा जाता है, जिसे 'चटाई' या 'पिन्नल' कहते हैं।

2. तविल (Tavil)

  • क्षेत्र: दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य का प्रमुख वाद्य।
  • प्रयोग: लोक संगीत, कर्नाटक संगीत तथा विशेष रूप से नागस्वरम् के साथ संगति में।
  • बनावट: ढांचा कटहल (पनस) की लकड़ी का होता है। लंबाई लगभग 18 इंच होती है। मध्य भाग थोड़ा उभरा होता है।
  • मुख व्यास: दाहिने मुख का व्यास (लगभग 10 इंच) बाएं मुख (लगभग 8 इंच) से अधिक होता है। कहीं-कहीं दोनों मुख 8-8 इंच के भी होते हैं।
  • चमड़ा: दाहिने मुख पर गाय या भैंस का मोटा चमड़ा (अधिक कसा हुआ) और बाएं मुख पर बकरे का चमड़ा (ढीला और भीतर लेप युक्त) प्रयोग होता है।
  • विशेषता: इसे किसी विशेष स्वर में मिलाने की सुविधा नहीं होती। इसकी आवाज अत्यंत तीव्र और कड़क होती है।

3. ढोलक (Dholak)

  • क्षेत्र: उत्तर भारतीय संगीत का अत्यंत लोकप्रिय लोक वाद्य।
  • आकार: लंबाई लगभग 45 सेंटीमीटर और मध्य का व्यास लगभग 27 सेंटीमीटर होता है।
  • बनावट: दायाँ मुख बाएं मुख की तुलना में थोड़ा छोटा होता है। दोनों मुखों पर चमड़े की पूड़ी लगी होती है।
  • कसावट: पूड़ियाँ सूत की डोरी से एक-दूसरे से कसी होती हैं। इन डोरियों के बीच लोहे के छल्ले (कड़ियाँ) लगे होते हैं जिन्हें खिसकाकर ढोलक को कसा या ढीला किया जाता है।
  • ध्वनि: बाएं मुख की भीतरी सतह पर एक विशेष लेप (मसाला) लगाया जाता है ताकि गंभीर ध्वनि प्राप्त हो सके। इसे उंगलियों की थाप से बजाया जाता है।

4. खोल (Khol)

  • क्षेत्र: बंगाल, ओडिशा, असम और मणिपुर राज्यों में प्रचलित।
  • प्रयोग: मुख्य रूप से कीर्तन परंपरा और भक्ति संगीत में।
  • बनावट: इसका ढांचा पकी हुई मिट्टी से बना होता है जो भीतर से खोखला होता है। मिट्टी की सुरक्षा के लिए इसे ऊपर से कपड़े की चौड़ी पट्टी से लपेटा जाता है।
  • आकार: लंबाई 24 से 25 इंच। दाहिने मुख का व्यास बहुत छोटा (लगभग 3½ इंच) और बाएं मुख का व्यास बड़ा (लगभग 7½ इंच) होता है। मध्य भाग का व्यास लगभग 10 इंच होता है।
  • वादन शैली: इसे गले में लटकाकर, खड़े होकर या बैठकर बजाया जाता है।

5. बौंगो और कौंगो (Bongo and Conga)

  • मूल: ये दोनों मूलतः अफ्रीकी वाद्य हैं जिनका प्रयोग भारतीय फिल्म संगीत में बहुतायत से होता है।
  • बौंगो: यह एक छोटा अवनद्ध वाद्य है जिसमें दो जुड़े हुए ड्रम होते हैं (एक बड़ा बायाँ और एक छोटा दायाँ)। इसे बैठकर घुटनों के बीच फंसाकर उंगलियों से बजाया जाता है।
  • कौंगो: यह बौंगो से आकार में काफी बड़ा होता है। इसके तीन भाग (बड़ा, मध्यम, छोटा) होते हैं जिनकी ऊंचाई समान होती है। इसे स्टैंड पर रखकर खड़े होकर बजाया जाता है।
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वाद्य एवं ऐप्स

तकनीकी विकास के साथ संगीत क्षेत्र में कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और मोबाइल एप्लीकेशन (ऐप्स) का समावेश हुआ है, जो रियाज और प्रदर्शन को सुगम बनाते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक उपकरण

  • इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा: यह पारंपरिक तानपुरे की ध्वनि और निरंतर 'ड्रोन' (स्थायी स्वर) को दोहराता है। इसका आविष्कार जी. राज नारायण ने सन् 1979 में किया था।
  • श्रुति बॉक्स (सुरपेटी): अभ्यास के दौरान निरंतर एक स्वर प्रदान करने वाला उपकरण। इसे तमिल और तेलुगु में 'श्रुति पेटी' कहा जाता है।
  • इलेक्ट्रॉनिक तालमाला: इसमें उत्तरी (हिंदुस्तानी) और दक्षिणी (कर्नाटक) दोनों पद्धतियों के विभिन्न तालों के ठेके और विभिन्न लय (विलंबित, मध्य, द्रुत) व्यवस्थित रूप से उपलब्ध होते हैं।

संगीत ऐप्स (Apps)

स्मार्टफोन और लैपटॉप के लिए बने सॉफ्टवेयर जो रियाज के लिए तानपुरा, नगमा, और संगति के लिए ठेके सुरीलेपन के साथ प्रदान करते हैं। जैसे— गाना सुनने, रिकॉर्ड करने और सुर-ताल साधना के ऐप्स।

संगीतज्ञ जीवनी: पंडित बिक्कू महाराज

बनारस घराने के महान तबला वादक पंडित बिक्कू महाराज का भारतीय तबला वादन के इतिहास में अत्यंत प्रतिष्ठित स्थान है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं प्रारंभिक जीवन

  • वास्तविक नाम: पंडित विक्रमादित्य मिश्र।
  • जन्म: सन् 1863, बनारस के एक प्रतिष्ठित संगीतज्ञ परिवार में।
  • वंश परंपरा: पिता संगीत नायक पंडित दरगाही मिश्र और पितामह तबला सम्राट पंडित राम शरण मिश्र थे।
  • शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा पिता और पितामह से प्राप्त की। इसके बाद बनारस घराने के वरिष्ठ तबला वादक पंडित बलदेव सहाय से गंडा-बंधन कर शिक्षा ग्रहण की।
  • कठिन साधना: वे प्रतिदिन 15 से 16 घंटे का कड़ा रियाज करते थे।

कलात्मक उपलब्धियाँ एवं उपाधि

  • खलीफ़ा की उपाधि: मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में उन्हें 'खलीफ़ा' की प्रतिष्ठित उपाधि से सम्मानित किया गया। इस सम्मान को पाने वाले वे एकमात्र हिंदू कलाकार थे।
  • बहुमुखी प्रतिभा: तबला वादन के साथ-साथ उन्होंने अपने पिता से गायन और सितार वादन की भी शिक्षा प्राप्त की थी। वे एक कुशल रचनाकार भी थे।
  • वादन शैली: उनका तबला वादन सर्वांगीण था। वादन में शुद्धता, कर्णप्रियता, सरसता और मोहकता उनकी मुख्य विशेषता थी। उनके रेले की गति और प्रवाह की तुलना बहती नदी की कल-कल धारा से की जाती थी।

शिक्षण एवं शिष्य परंपरा

  • अध्यापन: उन्होंने उत्तर प्रदेश के प्रथम संगीत विद्यालय 'काशी संगीत समाज' (वाराणसी) में कई वर्षों तक अध्यापन कार्य किया और लगभग 300 शिष्यों को तबला वादन सिखाया।
  • प्रमुख शिष्य: जमीरा के राजा लल्लन बाबू, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के बेटे मकबूल हुसैन खाँ, पंडित भोलानाथ पाठक, मृदंगाचार्य मन्नू जी, और पंडित सामता प्रसाद (गुदई महाराज) (जिन्हें पिता के निधन के बाद बिक्कू महाराज ने पुत्रवत स्नेह देकर सिखाया)।
  • पारिवारिक उत्तराधिकारी: उनके सुपुत्र तबला शिरोमणि पंडित गामा महाराज और पौत्र रंगनाथ मिश्र भी श्रेष्ठ कलाकार हुए।
  • निधन: मार्च 1945 में इस महान विभूति का निधन हो गया।