Sangeet: Class 11 (Book 1) — Chapter 8: तबला एवं पखावज वाद्यों के घरानों का वर्णन

घराने की परिभाषा एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय शास्त्रीय संगीत में घरानों का इतिहास अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। जब किसी असाधारण प्रतिभाशाली कलाकार द्वारा किसी विशिष्ट शैली (गायन, वादन अथवा नृत्य) का निर्माण किया जाता है और उसका पालन उसी रूप में उसकी वंश परंपरा तथा शिष्य परंपरा में कई पीढ़ियों तक होता है, तब किसी घराने का निर्माण होता है।

ऐतिहासिक विकासक्रम

  • मुगल काल: उत्तर भारतीय संगीत में घरानों की शुरुआत मुगल काल के अंतिम दौर से मानी जाती है।
  • ब्रिटिश काल: राजाओं का युग समाप्त होने और अंग्रेजों के शासनकाल में संगीतज्ञों ने अलग-अलग रहकर अपने परिवारों और शिष्यों को प्रशिक्षित किया और कला को जीवित रखा।
  • बाज का वर्गीकरण: विभिन्न घरानों की वादन शैलियों को बाज कहा जाता है। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे दो मुख्य भागों में बाँटा गया है:
    • पश्चिम बाज: इसके अंतर्गत दिल्ली घराना और अजराड़ा घराना आते हैं।
    • पूरब बाज: इसके अंतर्गत लखनऊ घराना, फ़र्रुखाबाद घराना और बनारस घराना आते हैं।
    • पंजाब घराना: इसका विकास स्वतंत्र रूप से हुआ माना जाता है।
तबले के छह प्रमुख घराने

1. दिल्ली घराना (प्रथम घराना)

  • संस्थापक: उस्ताद सिद्धार खाँ डाढ़ी (मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले के शासनकाल में)।
  • वादन शैली की विशेषताएँ: इसे दो अँगलियों का बाज या किनार का बाज भी कहा जाता है। पखावज के खुले और जोरदार बोलों को तबले के अनुकूल बनाकर कोमल शैली विकसित की गई।
  • मुख्य बोल: तिट, धिट, तिरकिट, धाति, धगेनधा, धिन-गिन, तिन-किन आदि बोलों की प्रधानता।
  • प्रसिद्ध रचनाएँ: यह बाज मुख्य रूप से पेशकार, चतुस्र जाति के छोटे कायदे और रेला के लिए जाना जाता है।
  • प्रमुख कलाकार: नत्थू खाँ, महबूब खाँ मिरजकर, गामी खाँ, इनाम अली खाँ, लतीफ़ अहमद खाँ, शफात अहमद खाँ।

2. अजराड़ा घराना

  • उत्पत्ति स्थान: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का अजराड़ा गाँव।
  • संस्थापक: कल्लू खाँ और मीरू खाँ (इन्होंने दिल्ली जाकर उस्ताद सिताब खाँ से शिक्षा ली थी)।
  • वादन शैली की विशेषताएँ: बायाँ या डग्गे का अत्यंत कलात्मक प्रयोग। बायाँ के बोलों को प्रधानता देते हुए आड़ी लय के कायदों का प्रसार।
  • मुख्य बोल: घेतग, घेनग, घेघेनक, दिग-दिनागिन, धातग-घेतग आदि। इसमें तिस्र जाति के कायदों का अधिक प्रयोग होता है।
  • प्रमुख कलाकार: हबीबुद्दीन खाँ, सुधीर कुमार सक्सेना, मनमोहन सिंह, सुधीर पाण्डेय, हशमत खाँ, रमज़ान खाँ, अकरम खाँ।

3. लखनऊ घराना

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 18वीं शताब्दी के मध्य में दिल्ली की राजनैतिक अस्थिरता के कारण कलाकारों का पलायन हुआ। नवाब आसिफुद्दौला के शासनकाल में अवध की राजधानी लखनऊ में इसका विकास हुआ।
  • संस्थापक: सिद्धार खाँ के पौत्र मोंदू खाँ और बख्शू खाँ।
  • वादन शैली की विशेषताएँ: कथक नृत्य और ठुमरी गायन शैली के साथ संगति के लिए विकसित। इसे नचकरन बाज भी कहा जाता है। इसमें मुक्त प्रहार से बजने वाले खुले बोलों की प्रधानता होती है, जिससे रचनाएँ जोरदार और गूँजयुक्त होती हैं।
  • मुख्य बोल: धिरधिर, घड़ाऽन, तक-घड़ाऽन, क्ड़ाऽन, किटतक दिगड़, धिटधिट, गदिगन, धिनगिन, तूना कत्ता आदि।
  • प्रसिद्ध रचनाएँ: कायदे, रेले, गत, परन, टुकड़े, चक्करदार आदि।
  • प्रमुख कलाकार: आबिद हुसैन, वाजिद हुसैन, अफ़ाक हुसैन, छुट्टन खाँ, हीरू गांगुली, अनिल भट्टाचार्या, स्वपन चौधरी।

4. फ़र्रुखाबाद घराना

  • उत्पत्ति: लखनऊ घराने से ही इसका विकास माना जाता है।
  • संस्थापक: हाजी विलायत अली खाँ (इन्होंने लखनऊ के उस्ताद बख्शू खाँ से शिक्षा प्राप्त की और उनके दामाद बने)।
  • वादन शैली की विशेषताएँ: लखनऊ के खुले बाज और दिल्ली के बंद बाज का सुंदर सम्मिश्रण। इस घराने की सबसे बड़ी विशेषता गतों का वादन है। इसमें रेले का वादन एक नवीन रूप में होता है जिसे 'रौ' कहते हैं।
  • मुख्य बोल: धिरधिरकिटतक, तकिट धा, दिग, दिगदीनाघिड़नग, धात्रक-धिकिट, धिनगिन आदि।
  • प्रमुख कलाकार: अमीर हुसैन, अहमदजान थिरकवा, नन्हे खाँ, मसीत खाँ, ज्ञान प्रकाश घोष, करामत उल्ला, साबिर खाँ।

5. बनारस घराना

  • संस्थापक: बनारस निवासी पंडित राम सहाय (इन्होंने लखनऊ घराने के उस्ताद मोंदू खाँ से शिक्षा प्राप्त की थी)।
  • वादन शैली की विशेषताएँ: बनारस बाज में पखावज के मुक्त प्रहार वाले बोलों का आधिक्य होता है। पखावज के प्रभाव के कारण यहाँ वादन की शुरुआत पेशकार और कायदे के स्थान पर उठान से की जाती है।
  • मुख्य बोल: नाड़ा, धाड़ा, धाड़ागिन, ताड़ागिन आदि।
  • प्रसिद्ध रचनाएँ: छंद, गत, परन, गत-परन, फ़र्द, चक्करदार रचनाओं के साथ-साथ देवी-देवताओं की स्तुति परनों का वादन इस घराने की प्रमुख विशेषता है।
  • प्रमुख कलाकार: राम शरण मिश्र, प्रताप महाराज, भैरव सहाय, बिक्कू महाराज, कंठे महाराज, अनोखे लाल मिश्र, सामता प्रसाद, किशन महाराज।

6. पंजाब घराना

  • संस्थापक: लाला भवानी दास (उर्फ़ भवानीदीन उर्फ़ भवानी सिंह), जो दिल्ली घराने के संस्थापक सिद्धार खाँ के समकालीन थे।
  • वादन शैली की विशेषताएँ: इस बाज पर पखावज की वादन शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। यह बाज जोरदार और खुला है। इसमें चारों उँगलियों के साथ तबले पर थाप का प्रहार किया जाता है।
  • प्रसिद्ध रचनाएँ: बड़ी-बड़ी गतें, परनें, चक्करदार गतें, चक्करदार परनें तथा लयकारियों से युक्त तिहाइयाँ।
  • प्रमुख कलाकार: हुसैन बख्श, फकीर बख्श, करम इलाही, अल्ला रक्खा, ज़ाकिर हुसैन, योगेश शम्शी।
पखावज की प्रमुख परंपराएँ

1. कुदऊ सिंह परंपरा

  • प्रमुख कलाकार: कुदऊ सिंह (जन्म 1812, बाँदा, उत्तर प्रदेश; निधन 1907)। इन्होंने मथुरा के प्रसिद्ध पखावजी भवानी दीन से शिक्षा प्राप्त की। ये झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से जुड़े थे। इन्हें 'सिंह' की उपाधि प्राप्त थी।
  • वादन शैली: ओजपूर्ण और गंभीर वादन, हथेलियों का प्रयोग, जोरदार और क्लिष्ट वर्णों का संयोजन।
  • मुख्य वर्ण: धड़गण, धड़न्न, तड़न्न, धिलांग, धमुकित, धेत्रा, क्रिधेत, तक्का थुंगा।
  • वंश परंपरा: राम सिंह (भाई), जानकी प्रसाद (पुत्र), गया प्रसाद (पौत्र), पंडित अयोध्या प्रसाद (प्रपौत्र), पंडित रामजी लाल शर्मा (वर्तमान प्रतिनिधि)।

2. नाना पानसे परंपरा

  • संस्थापक: नाना पानसे। इन्होंने बाबू जोध सिंह, मान्याबा कोड़ीतकर, चौण्डे बुवा, मारतण्ड बुवा और योगीराज माधव स्वामी से शिक्षा प्राप्त की।
  • वादन शैली: कर्णप्रिय और मधुर शैली। द्रुतलय में बजने वाले वर्णों, तबले और कथक नृत्य के वर्णों का सुंदर समन्वय।
  • योगदान: 'सुदर्शन' नामक नवीन ताल की रचना की। प्राचीन ग्रंथों के आधार पर कई तालों के ठेकों का नवीनीकरण किया। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत में यह परंपरा अत्यंत लोकप्रिय है।

3. नाथद्वारा परंपरा

  • उत्पत्ति: राजस्थान के नाथद्वारा में 17वीं शताब्दी में तुलसीदास, नरसिंह दास और हालू नामक तीन भाइयों द्वारा शुरुआत।
  • विकासक्रम: रूपराम के पुत्र वल्लभ दास 1802 में श्रीनाथद्वारा जाकर बस गए। उनके वंशज पंडित घनश्याम दास के पुत्र पुरुषोत्तम दास ने इस परंपरा का देश-विदेश में प्रचार-प्रसार किया (निधन 21 जनवरी, 1991)।
  • प्रमुख ग्रंथ: मृदंग सागर और मृदंग वादन।
  • वादन शैली: मिठास, माधुर्य और भक्ति प्रधान रचनाएँ। इसमें 'ता' बायें पर और 'क' दायें पर बजता है।
  • मुख्य वर्ण: किट, किटी, ता, दीं, थुं, धिड़नक आदि। इस परंपरा की पंचदेव स्तुति परन अत्यंत विख्यात है।
महान कलाकार जीवनी: उस्ताद हबीबुद्दीन खाँ
अभ्यास एवं मूल्यांकन

लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. पंजाब घराने के कुछ कलाकारों के नाम बताइए।
  2. सामता प्रसाद, राम जी मिश्र और गोपाल मिश्र किस घराने के तबला वादक हैं?
  3. घराना शब्द से आप क्या समझते हैं?
  4. गुदई महाराज का दूसरा नाम क्या था?
  5. बायाँ या डग्गे का व्यवहार किस घराने में कलात्मक रूप से किया गया है?

सही और गलत बताइए

  1. अनोखे लाल मिश्र एवं किशन महाराज पंजाब घराने के तबला वादक हैं। (गलत - बनारस घराना)
  2. दिल्ली घराने के मूल पुरुष उस्ताद सिद्धार खाँ डाढ़ी थे। (सही)
  3. घराना शब्द राजमहलों से आया है। (गलत - घराना शब्द 'घर' से बना है)
  4. लतीफ़ अहमद खाँ बनारस घराने के तबला वादक हैं। (गलत - दिल्ली घराना)
  5. दिल्ली घराने का जन्म अकबर के काल में हुआ। (गलत - मोहम्मद शाह रंगीले के काल में)