Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 1: भारतीय संगीत का सामान्य परिचय

संगीत की परिभाषा एवं कलाओं का वर्गीकरण

मानव जीवन में कलाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। कलाओं को मूलभूत रूप से दो मुख्य भागों में वर्गीकृत किया गया है:

संगीत की शास्त्रीय परिभाषा

संगीत रत्नाकर ग्रंथ के अनुसार संगीत की परिभाषा इस प्रकार दी गई है:

“गीतं, वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते।”


भावार्थ: गायन, वादन तथा नृत्य इन तीनों कलाओं के समावेश को संगीत कहते हैं। संगीत का मूल आधार स्वर और लय है। स्वर और लय के साथ भाषा, कविता या पद का समन्वय संगीत को अनूठा आकर्षण प्रदान करता है।

मार्गी व देशी संगीत

प्राचीन काल से ही गान (गीत) के दो मुख्य रूप माने गए हैं— मार्गी संगीत और देशी संगीत।

1. मार्गी संगीत (Margi Sangeet)

वह संगीत जिसमें शास्त्रों में वर्णित नियमों का कठोरता या दृढ़ता से पालन किया जाना अनिवार्य हो, उसे मार्गी संगीत कहा जाता है।

  • उत्पत्ति व प्रयोग: इसका प्रयोग ब्रह्मा के बाद भरत मुनि आदि गुणीजनों ने किया।
  • प्रकृति: यह निश्चित, नियमबद्ध और कठोर था। इसका प्रयोग धार्मिक समारोहों में निश्चित विधि-विधान से किया जाता था। वैदिक संगीत या साम-संगीत इसी धारा के अंतर्गत आते हैं।
  • उद्देश्य: प्राचीन ऋषि-मुनि इसे मोक्ष प्राप्ति का साधन मानते थे। कठोर नियमों के कारण यह वर्तमान में प्रचलन में नहीं रह पाया।

मार्गोदेशीति तद् द्वेधा तत्र मार्ग स उच्छ्यते।
यो मार्गितो विरिञ्चाद्यै प्रयुक्तो भरतादिभि:।।


स्रोत: संगीत रत्नाकर, श्लोक 22, स्वरगताध्याय

2. देशी संगीत (Deshi Sangeet)

विभिन्न स्थानों की जनरुचि के अनुरूप हृदय को रंजन (आनंदित) करने वाले गायन, वादन व नृत्य को देशी संगीत कहा जाता है।

  • विशेषताएँ: यह जनरुचि पर आधारित और परिवर्तनशील होता है। इसमें शास्त्रीय नियमों की सीमा में रहते हुए भी लचीलापन होता है।
  • प्रचलित विधाएँ: इसके अंतर्गत परंपरागत रूप से चली आ रही अनेक गेय विधाएँ जैसे— प्रबंध, ध्रुपद, धमार, ठुमरी, टप्पा, चतुरंग, त्रिवट, स्वरमालिका, लक्षणगीत और अनेक बंदिशें आती हैं।
  • भाषाई विविधता: इसमें विभिन्न प्रदेशों की भाषाओं जैसे— ब्रज, अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी आदि का प्रयोग प्रचुरता से होता है।

देशे देशे जनानां यद्रुच्याह्रदयरञ्जकम्।
गीतं वादनं च नृत्तं तद्देशीत्यभिधीयते।।


स्रोत: संगीत रत्नाकर, श्लोक 23, स्वरगताध्याय

शास्त्रीय संगीत (Shastriya Sangeet)

शास्त्रों में वर्णित नियमों के आधार पर निर्मित और अनुशासित संगीत को शास्त्रीय संगीत कहा जाता है।

उपशास्त्रीय संगीत (Upashastriya Sangeet)

जिन गेय विधाओं में शास्त्रीय नियमों के कठोर पालन की अपेक्षा रस, भाव और रंजकता (मनोरंजन) को प्रधानता दी जाती है, उन्हें उपशास्त्रीय संगीत कहा जाता है। इसमें एक राग से दूसरे राग में जाने की स्वतंत्रता होती है।

प्रमुख उपशास्त्रीय गायन शैलियाँ

  • ठुमरी (Thumri): यह श्रृंगार रस प्रधान शैली है। इसमें स्वर और शब्द एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अवध के नवाब वाजिद अली शाह को इसका विशेष प्रचारक माना जाता है। इसके दो मुख्य रूप हैं:
    • बोल-बनाव की ठुमरी: इसमें ठहराव और चैनदारी होती है। कम शब्दों का प्रयोग कर हाव-भाव और स्वर विस्तार द्वारा भाव प्रदर्शित किए जाते हैं।
    • बोल-बाँट की ठुमरी: इसमें शब्द अधिक होते हैं और लयकारी का काम अधिक दिखाया जाता है। इसकी रचना ख्याल शैली के समान प्रतीत होती है।
  • दादरा (Dadra): यह अत्यंत सुंदर और चपल-चलन युक्त विधा है। इसमें शब्दों की प्रधानता होती है और यह मुख्य रूप से दादरा ताल में गाई जाती है। इसके विषय वसंत, वर्षा और राधा-कृष्ण के श्रृंगार से संबंधित होते हैं।
  • टप्पा (Tappa): 'टप' शब्द से उत्पन्न, जिसका अर्थ है कूदना या छलांग लगाना। इसकी शुरुआत लखनऊ के नवाब आसिफुद्दौला के दरबार के प्रसिद्ध गायक गुलाम नबी शोरी (शोरी मियाँ) ने की थी। इसमें पंजाबी, सिंधी व मुल्तानी शब्दों का प्रयोग होता है और यह अत्यंत द्रुत गति की छोटी-छोटी तानों पर आधारित होती है।
  • होरी (Hori): उत्तर भारत में होली के त्योहार और राधा-कृष्ण की लीलाओं पर आधारित गीत। यह मुख्य रूप से दीपचंदी, कहरवा और जत ताल में गाई जाती है।
  • चैती (Chaiti): चैत्र मास में गाई जाने वाली मधुर और कोमल विधा। इसमें 'हो रामा' शब्द की विशेष टेक होती है और यह श्रृंगार रस से परिपूर्ण होती है।
  • कजरी (Kajari): वर्षा ऋतु (सावन) में गाई जाने वाली श्रृंगार रस प्रधान विधा। यह मुख्य रूप से बनारस और मिर्जापुर क्षेत्र में गाई जाती है।
सुगम संगीत (Sugam Sangeet)

सुगम का अर्थ है 'सरल' या 'सहज'। नियमों के बंधन से मुक्त, सहजता से गाया-बजाया जाने वाला संगीत सुगम संगीत कहलाता है।

लोक संगीत (Lok Sangeet)

सामान्य जनमानस के स्वाभाविक उद्गारों, रीति-रिवाजों और सामाजिक परिवेश को अभिव्यक्त करने वाला संगीत लोक संगीत कहलाता है। इसके लिए किसी व्याकरण या शास्त्रीय प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती।

भारत की प्रमुख प्रादेशिक लोक गायन एवं नृत्य शैलियाँ

प्रदेशप्रचलित लोक गायन एवं नृत्य शैलियाँ
असमबिहू, छाऊ आदि।
उत्तर प्रदेशहोरी, बारहमासा, कजरी, चैती, रसिया, लांगुरिया, बिरहा, रासलीला, नौटंकी आदि।
गुजरातगरबा, रास, डांडिया आदि।
पंजाबहीर, टप्पा, गिद्धा, भाँगड़ा आदि।
महाराष्ट्रलावणी, मंगलागौर आदि।
राजस्थानगोरबंद, मांड, घूमर, झूमर, कालबेलिया आदि।
जम्मू-कश्मीरभाण्ड, पाथिर, राउफ, जबरो, चकरी आदि।
अरुणाचल प्रदेशटापू, पोनुंग, नीशीदोऊ, लोकूबवांग आदि।
केरलतिरूवादिरकली, पाना, तुल्लल, थेय्यम आदि।
आंध्र प्रदेशधिमसा, बुर्रा कत्था, तोलू बोम्मालता, रोत्तेला पंडुगा आदि।
पश्चिम बंगालबाऊल, रबिन्द्र संगीत, भटियाली, गोडीय, छाऊ आदि।

लोक संगीत के मुख्य प्रकार

  1. नैतिक गान: जो समाज में नैतिकता और मूल्यों का पाठ पढ़ाते हैं।
  2. काम-काज गीत: दैनिक कार्यों जैसे खेती-बाड़ी, मछली पकड़ना, दूध बेचना, नौका चलाना आदि के समय गाए जाने वाले गीत।
  3. वर्षा एवं खेती आधारित गीत: फसल की बुआई, कटाई और वर्षा ऋतु के अवसर पर गाए जाने वाले गीत।
  4. लोरी: बच्चों को सुलाने के लिए गाए जाने वाले वात्सल्य प्रधान गीत।

दक्षिण भारतीय विशिष्ट लोक संगीत शैलियाँ

भारतीय संगीत में प्रथम

भारतीय संगीत के इतिहास में महिलाओं के योगदान और ऐतिहासिक उपलब्धियों का विशेष स्थान है।