Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 2: आधार ग्रंथ

सामवेद (Samaveda)

सामवेद का परिचय एवं महत्व

वेदकालीन सभ्यता में सामवेद का गान किए जाने के लिखित साक्ष्य मिलते हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं के गेय स्वरूप के संकलन से ही सामवेद की रचना हुई है।

“वेदानां सामवेडोऽस्मि”


भावार्थ / विश्लेषण: श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने स्वयं को वेदों में सामवेद कहा है, जो इसके सर्वोपरि महत्व को दर्शाता है। ऋग्वेद की ऋचाओं का जब स्वरों सहित विधिपूर्वक गान किया जाता था, तो वह ईश्वर आराधना के लिए अधिक प्रभावशाली हो जाती थीं।

  • साम संहिता: सामवेद की ऋचाओं का संकलन।
  • प्रधान भाग: सामवेद के दो मुख्य भाग हैं — आर्चिक (ऋग्वेद की ऋचाओं का संग्रह) तथा गान (साम का स्वरमय स्वरूप)।
  • यज्ञीय महत्व: यज्ञ आदि अनुष्ठानों में साम गान का महत्व सर्वोपरि रहा है।

साम गान के विभाग व गायक

साधारणतः साम गान को पाँच भागों (पंचविध) में गाया जाता था, यद्यपि कुछ संदर्भों में इसे सात भागों (सप्तविध) में गाने का भी उल्लेख मिलता है।

क्र. सं.भाग का नामगायक (ऋत्विज)विशेषता / विवरण
1प्रस्तावप्रस्तोतासाम का प्रारंभिक भाग; यह 'हुम्' स्वर से प्रारंभ होता था जिसे सभी ऋत्विज एक साथ गाते थे।
2उद्गीथउद्गातासाम का प्रधान भाग; इसके प्रारंभ में 'ओम्' का उच्चारण किया जाता था।
3प्रतिहारप्रतिहर्ताप्रतिहार भाग का गायन करने वाला ऋत्विज।
4उपद्रवमुख्य सामगायकमुख्य गायक द्वारा गाया जाने वाला विशेष भाग।
5निधनप्रस्तोता, उद्गाता व प्रतिहर्तासाम गान का अंतिम भाग; तीनों ऋत्विज मिलकर इसका सामूहिक गायन करते थे।
  • उपगायक: मुख्य गायक के सहायक जो निरंतर एक ही स्वर पर 'हो' का उच्चारण करते थे ताकि मुख्य स्वर कायम रहे (जैसे आधुनिक युग में तानपुरा कार्य करता है)।
रामायण (Ramayana)

रामायण में संगीत का स्वरूप

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण भारत का प्राचीन सांस्कृतिक महाकाव्य है, जिसका निर्माण गेय रूप में हुआ है। इसके सभी श्लोक छंदबद्ध एवं गाने योग्य हैं।

  • लव-कुश: महर्षि वाल्मीकि ने स्वयं लव-कुश को संगीत की शिक्षा दी, जिन्होंने मार्गी शैली में गांधर्व गान किया।
  • सामाजिक व्याप्ति: अयोध्या, किष्किंधा तथा लंका आदि नगरों में संगीत सदैव व्याप्त रहता था।
  • धार्मिक व लौकिक अवसर: श्रीराम के जन्म, विवाह, और वनवास से लौटने पर वाद्यों के वादन, अप्सराओं के गान और नृत्य का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
  • रावण का संगीत प्रेम: रावण साम गान के माध्यम से शिव की आराधना करता था और स्वयं एक कुशल वीणा-वादक था। उसकी वीणा को रावणहत्था कहा जाता है।

रामायण कालीन वाद्य एवं संगीतकार

  • तूर्य: रामायण काल में वाद्यों के लिए सामूहिक रूप से 'तूर्य' शब्द का प्रयोग किया जाता था।
  • प्रमुख वाद्य: वेणु, शंख, दुन्दुभि, भेरी, मृदंग, और पटह।
  • संगीतकार जातियाँ: बंदी, सूत, मागध और वारांगना।
  • गांधर्व संज्ञा: संगीत शास्त्र के लिए 'गांधर्व' संज्ञा थी, जिसमें गीत और वाद्य दोनों का समावेश था।
  • मार्गी व देशी संगीत: कठोर नियमों से आबद्ध संगीत 'मार्गी' तथा जनरुचि के अनुकूल नियमों वाला संगीत 'देशी' कहलाया।
  • वीणा के प्रकार: तत्कालीन लोकप्रिय वीणाओं में विपंची तथा वल्लकी प्रमुख थीं। वीणा बजाने वाले दण्ड को कोण कहा जाता था।
महाभारत (Mahabharata)

महाभारत में संगीत का स्थान

कृष्णाद्वैपायन व्यास द्वारा रचित महाभारत में साम तथा गांधर्व दोनों गान प्रकारों के प्रचलन की स्पष्ट जानकारी मिलती है।

  • स्तोभाक्षर: ऋग्वेद की ऋचाओं को साम में परिवर्तित करने के लिए 'हाऊ', 'हाई', 'अथ', 'इह', 'ई' आदि स्तोभाक्षरों का प्रयोग किया जाता था।
  • गेय प्रबंध: साम, गाथा तथा मंगल गीतों का विशेष उल्लेख मिलता है।
  • दिव्य कलाकार: संगीत के दिव्य कलाकारों के रूप में गंधर्व तथा किन्नर प्रतिष्ठित थे। युधिष्ठिर की सभा में तुम्बुरु की प्रेरणा से गंधर्वों ने गायन प्रस्तुत किया था।
  • अर्जुन की संगीत निपुणता: अर्जुन ने बृहन्नला के रूप में राजा विराट की कन्या उत्तरा को संगीत व नृत्य की शिक्षा दी। अर्जुन को गांधर्वविशारद माना जाता था।

महाभारत कालीन वाद्य वर्गीकरण एवं स्वर

  • चतुर्विध वाद्य वर्गीकरण: वाद्यों को चार वर्गों में विभाजित किया गया था — तत, अवनद्ध, घन और सुषिर।
  • प्रमुख वाद्य: पटह, भेरी, शंख, मृदंग, दुन्दुभि और वीणा।
  • स्वर व ग्राम: सप्त स्वरों का प्रचलन था। षड्ज और मध्यम ग्राम के अतिरिक्त गांधार ग्राम का भी प्रचलन था। वीणा की सप्ततंत्रियों को सात शुद्ध स्वरों में मिलाया जाता था।
  • तालज्ञ: गायन-वादन की संगति में हाथ से ताल देने वाले नियुक्त व्यक्तियों को 'तालज्ञ' कहा जाता था।
नाट्यशास्त्र (Natyashastra)

नाट्यशास्त्र का परिचय एवं संरचना

महर्षि भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र को संगीत और नाट्य कला का सबसे प्रामाणिक और प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। इसका रचना काल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसा पश्चात् तक माना जाता है।

  • अन्य नाम: इसे नाट्यवेद या पंचमवेद भी कहा जाता है।
  • अध्याय संरचना: इसमें कुल 36 अध्याय हैं, जिनमें से 6 अध्यायों (अध्याय 28 से 33 तक) में संगीत संबंधी विषयों की विस्तृत चर्चा की गई है।
  • पूर्व आचार्य: भरत मुनि से पूर्व कोहल, दत्तिल, शांडिल्य आदि आचार्यों ने सूत्रों का संग्रह प्रारंभ किया था।

नाट्यशास्त्र में संगीत विषयक तत्व

  • संगीत के अंग: गांधर्व-गान, ग्राम, मूर्च्छना, स्वर, वर्ण, अलंकार, तान, स्थान, गीति, श्रुति-जाति, स्वर-साधारण और जाति-साधारण का विवेचन।
  • आतोद्य (वाद्य) वर्गीकरण: वाद्यों का तत, अवनद्ध, घन व सुषिर के रूप में वैज्ञानिक वर्गीकरण।
  • श्रुति निदर्शन: भरत मुनि ने 22 श्रुतियों का अंतर सिद्ध करने के लिए दो वीणाओं — ध्रुव वीणा और चल वीणा का प्रयोग कर सारणा चतुष्टयी का प्रदर्शन किया।
  • नृत्य व नाट्य: नृत्त (पद संचालन), नृत्य (अंग संचालन) तथा नाट्य (भावाभिनय) के साथ हस्त मुद्राओं का सूक्ष्म विवेचन।
बृहद्देशी (Brihaddeshi)

बृहद्देशी का परिचय एवं विशेषताएँ

बृहद्देशी के रचयिता मतंग मुनि हैं और इसका रचना काल लगभग सातवीं-आठवीं शताब्दी माना जाता है। यह ग्रंथ मुख्यतः नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित है।

  • राग शब्द का प्रथम प्रयोग: इस ग्रंथ में पहली बार रागों का सैद्धांतिक विवेचन और वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया। जाति गान से राग गायन की ओर संक्रमण का यह संधि काल था।
  • नाद के पाँच भेद: मतंग मुनि ने नाद के पाँच भेद बताए हैं — सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म, व्यक्त, अव्यक्त और कृत्रिम।
  • अलंकार: बृहद्देशी में अलंकारों की संख्या 23 मानी गई है।
  • रागों के भेद: रागों के तीन मुख्य भेद बताए गए हैं — शुद्ध, छायालग और संकीर्ण।

वीणा का विकास

  • किन्नरी वीणा: मतंग मुनि को 'किन्नरी' वीणा का आविष्कारक माना जाता है।
  • सारिका (Fret): वीणा पर परदे (सारिका) बाँधने का श्रेय मतंग मुनि को ही जाता है, जिसके बाद सारिका युक्त अनेक वाद्यों का विकास हुआ।
संगीत रत्नाकर (Sangeet Ratnakar)

संगीत रत्नाकर का परिचय एवं लेखक

पंडित शार्ङ्गदेव द्वारा 13वीं शताब्दी में रचित 'संगीत रत्नाकर' हिंदुस्तानी और कर्नाटक दोनों संगीत पद्धतियों का आधार स्तंभ है।

“वन्दे नादतनुमुद्धुरद्वयीतं मुदे शङ्करम्”


भावार्थ / विश्लेषण: शार्ङ्गदेव शिव भक्त थे और उन्होंने अपने ग्रंथ के प्रथम श्लोक में नाद रूपी शिव की वंदना की है। उनके अनुसार नाद संपूर्ण जगत में व्याप्त है और मानव शरीर में नाभि स्थित प्राणवायु तथा अग्नि के संयोग से इसकी उत्पत्ति होती है।

  • लेखक परिचय: शार्ङ्गदेव के पूर्वज कश्मीर से देवगिरी (दौलताबाद) आए थे। वे संस्कृत, तमिल और आयुर्वेद के प्रकांड विद्वान थे।
  • तौर्यत्रिक: गीत, वाद्य और नृत्य के सम्मिलित रूप को 'तौर्यत्रिक' कहा गया है।
  • सप्ताध्यायी: सात अध्यायों में विभक्त होने के कारण इस ग्रंथ को 'सप्ताध्यायी' भी कहा जाता है।

सप्ताध्यायी के सात अध्यायों का विवरण

अध्याय संख्याअध्याय का नाममुख्य वर्णित विषय
1स्वरगताध्यायपिंडोत्पत्ति (मानव शरीर व चक्र), नाद, श्रुति, स्वर, ग्राम, मूर्च्छना, तान, वर्ण, अलंकार, जाति और गीति।
2रागविवेकाध्यायमार्ग व देशी रागों का वर्गीकरण, दशविध राग वर्गीकरण, 264 रागों का विवरण।
3प्रकीर्णकाध्यायआलप्ति (रागालप्ति, रूपकालप्ति), वाग्गेयकार (उत्कृष्ट रचनाकार) के लक्षण, गायक के गुण-दोष, और काकु के 6 प्रकार।
4प्रबन्धाध्यायगान के दो रूप — निबद्ध (धातु और अंगों से युक्त) और अनिबद्ध (आलाप रूप), प्रबन्ध के 4 धातु व 6 अंग।
5तालाध्यायमार्ग व देशी ताल (5 मार्ग ताल, 20 देशी ताल) और ताल की व्यवस्थित प्रक्रिया के दस प्राण (तालदशप्राण)।
6वाद्याध्यायवाद्यों का चतुर्विध वर्गीकरण (तत, अवनद्ध, घन, सुषिर), उनकी बनावट और वादन तकनीक।
7नर्तनाध्यायनृत्य विधाएँ, शैलियाँ, आंगिक अभिनय, रस सिद्धांत और हस्त मुद्राएँ।