वेदकालीन सभ्यता में सामवेद का गान किए जाने के लिखित साक्ष्य मिलते हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं के गेय स्वरूप के संकलन से ही सामवेद की रचना हुई है।
“वेदानां सामवेडोऽस्मि”
भावार्थ / विश्लेषण: श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने स्वयं को वेदों में सामवेद कहा है, जो इसके सर्वोपरि महत्व को दर्शाता है। ऋग्वेद की ऋचाओं का जब स्वरों सहित विधिपूर्वक गान किया जाता था, तो वह ईश्वर आराधना के लिए अधिक प्रभावशाली हो जाती थीं।
साधारणतः साम गान को पाँच भागों (पंचविध) में गाया जाता था, यद्यपि कुछ संदर्भों में इसे सात भागों (सप्तविध) में गाने का भी उल्लेख मिलता है।
| क्र. सं. | भाग का नाम | गायक (ऋत्विज) | विशेषता / विवरण |
|---|---|---|---|
| 1 | प्रस्ताव | प्रस्तोता | साम का प्रारंभिक भाग; यह 'हुम्' स्वर से प्रारंभ होता था जिसे सभी ऋत्विज एक साथ गाते थे। |
| 2 | उद्गीथ | उद्गाता | साम का प्रधान भाग; इसके प्रारंभ में 'ओम्' का उच्चारण किया जाता था। |
| 3 | प्रतिहार | प्रतिहर्ता | प्रतिहार भाग का गायन करने वाला ऋत्विज। |
| 4 | उपद्रव | मुख्य सामगायक | मुख्य गायक द्वारा गाया जाने वाला विशेष भाग। |
| 5 | निधन | प्रस्तोता, उद्गाता व प्रतिहर्ता | साम गान का अंतिम भाग; तीनों ऋत्विज मिलकर इसका सामूहिक गायन करते थे। |
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण भारत का प्राचीन सांस्कृतिक महाकाव्य है, जिसका निर्माण गेय रूप में हुआ है। इसके सभी श्लोक छंदबद्ध एवं गाने योग्य हैं।
कृष्णाद्वैपायन व्यास द्वारा रचित महाभारत में साम तथा गांधर्व दोनों गान प्रकारों के प्रचलन की स्पष्ट जानकारी मिलती है।
महर्षि भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र को संगीत और नाट्य कला का सबसे प्रामाणिक और प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। इसका रचना काल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसा पश्चात् तक माना जाता है।
बृहद्देशी के रचयिता मतंग मुनि हैं और इसका रचना काल लगभग सातवीं-आठवीं शताब्दी माना जाता है। यह ग्रंथ मुख्यतः नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित है।
पंडित शार्ङ्गदेव द्वारा 13वीं शताब्दी में रचित 'संगीत रत्नाकर' हिंदुस्तानी और कर्नाटक दोनों संगीत पद्धतियों का आधार स्तंभ है।
“वन्दे नादतनुमुद्धुरद्वयीतं मुदे शङ्करम्”
भावार्थ / विश्लेषण: शार्ङ्गदेव शिव भक्त थे और उन्होंने अपने ग्रंथ के प्रथम श्लोक में नाद रूपी शिव की वंदना की है। उनके अनुसार नाद संपूर्ण जगत में व्याप्त है और मानव शरीर में नाभि स्थित प्राणवायु तथा अग्नि के संयोग से इसकी उत्पत्ति होती है।
| अध्याय संख्या | अध्याय का नाम | मुख्य वर्णित विषय |
|---|---|---|
| 1 | स्वरगताध्याय | पिंडोत्पत्ति (मानव शरीर व चक्र), नाद, श्रुति, स्वर, ग्राम, मूर्च्छना, तान, वर्ण, अलंकार, जाति और गीति। |
| 2 | रागविवेकाध्याय | मार्ग व देशी रागों का वर्गीकरण, दशविध राग वर्गीकरण, 264 रागों का विवरण। |
| 3 | प्रकीर्णकाध्याय | आलप्ति (रागालप्ति, रूपकालप्ति), वाग्गेयकार (उत्कृष्ट रचनाकार) के लक्षण, गायक के गुण-दोष, और काकु के 6 प्रकार। |
| 4 | प्रबन्धाध्याय | गान के दो रूप — निबद्ध (धातु और अंगों से युक्त) और अनिबद्ध (आलाप रूप), प्रबन्ध के 4 धातु व 6 अंग। |
| 5 | तालाध्याय | मार्ग व देशी ताल (5 मार्ग ताल, 20 देशी ताल) और ताल की व्यवस्थित प्रक्रिया के दस प्राण (तालदशप्राण)। |
| 6 | वाद्याध्याय | वाद्यों का चतुर्विध वर्गीकरण (तत, अवनद्ध, घन, सुषिर), उनकी बनावट और वादन तकनीक। |
| 7 | नर्तनाध्याय | नृत्य विधाएँ, शैलियाँ, आंगिक अभिनय, रस सिद्धांत और हस्त मुद्राएँ। |