ध्वनि संगीत का मूल माध्यम है। प्रकृति में विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ समाहित हैं, जैसे बादलों का गर्जन, हवा की सरसराहट, पक्षियों का कलरव और मानवीय आवाजें।
नियमित और स्थिर आंदोलन संख्या वाली मधुर ध्वनि को संगीत में नाद कहा जाता है। नाद ही संगीत का मुख्य आधार है।
न नादेन बिना गीतं न नादेन बिना स्वरः।
न नादेन बिना नृत्तं तस्मान्नादात्मकं जगत्।।भावार्थ: नाद के बिना न गीत संभव है, न स्वर और न ही नृत्य। अतः यह संपूर्ण संसार नादात्मक है। (बृहद्देशी)
संगीत में उपयोगी वह स्पष्ट ध्वनि जो कानों को साफ सुनाई दे और परस्पर अलग पहचानी जा सके, श्रुति कहलाती है। 'श्रूयते इति श्रुतिः' अर्थात् जिसे सुना जा सके।
चतुश्चतुश्चैव षड्ज मध्यम पंचमा।
द्वै द्वै निषाद गान्धारो त्रिस्त्री ऋषभ धैवतो।।भावार्थ: स, म, प की चार-चार; ग, नि की दो-दो तथा रे, ध की तीन-तीन श्रुतियाँ होती हैं। (संगीत रत्नाकर)
| क्र. सं. | श्रुति का नाम | प्राचीन कालीन स्वर | आधुनिक स्वर | आंदोलन संख्या |
|---|---|---|---|---|
| 1 | तीव्रा | - | षड्ज | 240 |
| 2 | कुमुद्वती | - | - | - |
| 3 | मंदा | - | - | - |
| 4 | छंदोवती | षड्ज | - | - |
| 5 | दयावती | - | रिषभ | 270 |
| 6 | रंजनी | - | - | - |
| 7 | रक्तिका | रिषभ | - | - |
| 8 | रौद्री | - | गांधार | - |
| 9 | क्रोधा | गांधार | - | - |
| 10 | वज्रिका | - | मध्यम | 320 |
| 11 | प्रसारिणी | - | - | - |
| 12 | प्रीति | - | - | - |
| 13 | मार्जनी | मध्यम | - | - |
| 14 | क्षिति | - | पंचम | 360 |
| 15 | रक्ता | - | - | - |
| 16 | संदीपनी | - | - | - |
| 17 | आलापिनी | पंचम | - | - |
| 18 | मदंती | - | धैवत | 405 |
| 19 | रोहिणी | - | - | - |
| 20 | रम्या | धैवत | - | - |
| 21 | उग्रा | - | निषाद | - |
| 22 | क्षोभिणी | निषाद | - | - |
22 श्रुतियों में से जो मुख्य नाद संगीत के लिए चुने गए और जो स्वतः रंजक होते हैं, उन्हें स्वर कहते हैं। मुख्य रूप से सात शुद्ध स्वर होते हैं: षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध), और निषाद (नि)।
सात शुद्ध स्वरों के समूह को सप्तक कहते हैं। इसके तीन प्रकार हैं:
गानक्रियोच्यते वर्णः स चतुर्धा निरूपितः।
स्थाय्यारोह्यवरोही च संचारीत्यथ लक्षणम्।।भावार्थ: गान करने की क्रिया को वर्ण कहते हैं। यह चार प्रकार का होता है। (संगीत रत्नाकर)
मध्य सप्तक के 'सा' से लेकर तार सप्तक के 'सा' तक के आठ स्वरों के समूह को अष्टक कहा जाता है।
स्वरों के नियमित और निश्चित क्रमबद्ध चलन को अलंकार या पलटा कहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के गले व हाथ की तैयारी कराना तथा स्वर-ताल का ज्ञान सुदृढ़ करना है।
विशिष्ट स्वरों और वर्णों से सजी वह ध्वनि रचना जो सुनने वाले के चित्त को प्रसन्न करे, राग कहलाती है।
योऽसौ ध्वनि विशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः।
रंजको जनचित्तानां स रागः कथितो बुधैः।।भावार्थ: स्वर और वर्ण से सुशोभित ध्वनि जो जन-चित्त को रंजित करे, उसे विद्वानों ने राग कहा है। (बृहद्देशी)
रागों में प्रयुक्त स्वरों की संख्या के आधार पर मुख्य तीन जातियाँ होती हैं, जिनकी नौ उपजातियाँ बनती हैं:
नौ उपजातियाँ: सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, सम्पूर्ण-षाड्व, सम्पूर्ण-औडुव, षाड्व-सम्पूर्ण, षाड्व-षाड्व, षाड्व-औडुव, औडुव-सम्पूर्ण, औडुव-षाड्व, औडुव-औडुव।
सात स्वरों के क्रमानुसार आरोह और अवरोह करने को मूर्च्छना कहते हैं। 'मूर्च्छयते-येन रागः' अर्थात् जिससे राग चमकते या उत्पन्न होते हैं। मूर्च्छनाएँ ग्रामों पर आधारित होती हैं। प्रत्येक ग्राम की 7 मूर्च्छनाएँ होती हैं।
| मूर्च्छना क्रम | मूर्च्छना का नाम | आधुनिक थाट |
|---|---|---|
| प्रथम | उत्तरमंदा | काफी |
| द्वितीय | रंजनी | बिलावल |
| तृतीय | उत्तरायता | कोई समान थाट नहीं |
| चतुर्थ | शुद्ध षड्जा | आसावरी |
| पंचम | मत्सरीकृता | खमाज |
| छठी | अश्वक्रांता | कल्याण |
| सप्तम | अभिरुद्गता | भैरवी |
स्वरों के व्यवस्थित समूह को, जो मूर्च्छनाओं का आधार होता है, ग्राम कहते हैं। प्राचीन ग्रंथों में तीन ग्रामों का उल्लेख है:
संगीत के समय की समान गति को लय कहते हैं। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं:
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | क | ता | धागे | तिरकिट | धी | ना |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 2 | 3 |
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | ता | धिं | धिं | धा |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | ती | ती | ना | धी | ना | धी | ना |
| चिह्न | 0 | 2 | 3 |
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धी | ना | धी | धी | ना | ती | ना | धी | धी | ना |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |