Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 3: हिन्दुस्तानी संगीत के पारिभाषिक शब्द

ध्वनि (Sound)

ध्वनि संगीत का मूल माध्यम है। प्रकृति में विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ समाहित हैं, जैसे बादलों का गर्जन, हवा की सरसराहट, पक्षियों का कलरव और मानवीय आवाजें।

ध्वनि की उत्पत्ति एवं संचरण

  • उत्पत्ति: घर्षण अथवा आघात से उत्पन्न कंपन या आंदोलन ही ध्वनि है।
  • संचरण: ध्वनि तरंगों के संचरण के लिए ठोस, द्रव या वायु जैसे माध्यम की आवश्यकता होती है।
  • श्रवण सीमा: मानव कान लगभग $20\text{ Hz}$ से $20,000\text{ Hz}$ (20 किलोहर्ट्ज़) आवृत्ति की तरंगों को सुन सकते हैं।
  • ध्वनि के प्रकार: ध्वनि दो प्रकार की होती है— मधुर (संगीतोपयोगी) और अमधुर (कोलाहल)।
नाद (Musical Sound)

नियमित और स्थिर आंदोलन संख्या वाली मधुर ध्वनि को संगीत में नाद कहा जाता है। नाद ही संगीत का मुख्य आधार है।

न नादेन बिना गीतं न नादेन बिना स्वरः।
न नादेन बिना नृत्तं तस्मान्नादात्मकं जगत्।।


भावार्थ: नाद के बिना न गीत संभव है, न स्वर और न ही नृत्य। अतः यह संपूर्ण संसार नादात्मक है। (बृहद्देशी)

नाद के भेद

  1. आहत नाद: दो वस्तुओं के घर्षण या आघात से उत्पन्न होने वाला नाद। संगीत में इसी नाद का प्रयोग किया जाता है।
  2. अनाहत नाद: बिना किसी आघात के स्वतः उत्पन्न होने वाला नाद। इसे केवल ध्यान और एकाग्रता से महसूस किया जा सकता है।

नाद की विशेषताएँ (Attributes of Naad)

  • नाद का ऊँचा-नीचापन (तारता - Pitch): स्वरों का चढ़ाव और उतार। जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ते हैं (सा से रे, रे से ग), स्वर ऊँचा होता जाता है।
  • नाद का छोटा-बड़ापन (तीव्रता - Intensity): नाद को धीरे या ज़ोर से उत्पन्न करना। धीरे से उत्पन्न नाद कम दूरी तक और ज़ोर से उत्पन्न नाद अधिक दूरी तक सुनाई देता है।
  • नाद की जाति अथवा गुण (Timbre): इसके आधार पर बिना देखे ही विभिन्न वाद्यों (जैसे सितार, बांसुरी) या व्यक्तियों की आवाज़ को पहचाना जा सकता है।
श्रुति (Shruti)

संगीत में उपयोगी वह स्पष्ट ध्वनि जो कानों को साफ सुनाई दे और परस्पर अलग पहचानी जा सके, श्रुति कहलाती है। 'श्रूयते इति श्रुतिः' अर्थात् जिसे सुना जा सके।

चतुश्चतुश्चैव षड्ज मध्यम पंचमा।
द्वै द्वै निषाद गान्धारो त्रिस्त्री ऋषभ धैवतो।।


भावार्थ: स, म, प की चार-चार; ग, नि की दो-दो तथा रे, ध की तीन-तीन श्रुतियाँ होती हैं। (संगीत रत्नाकर)

22 श्रुतियों एवं स्वरों का विभाजन चक्र

क्र. सं.श्रुति का नामप्राचीन कालीन स्वरआधुनिक स्वरआंदोलन संख्या
1तीव्रा-षड्ज240
2कुमुद्वती---
3मंदा---
4छंदोवतीषड्ज--
5दयावती-रिषभ270
6रंजनी---
7रक्तिकारिषभ--
8रौद्री-गांधार-
9क्रोधागांधार--
10वज्रिका-मध्यम320
11प्रसारिणी---
12प्रीति---
13मार्जनीमध्यम--
14क्षिति-पंचम360
15रक्ता---
16संदीपनी---
17आलापिनीपंचम--
18मदंती-धैवत405
19रोहिणी---
20रम्याधैवत--
21उग्रा-निषाद-
22क्षोभिणीनिषाद--
स्वर (Swara)

22 श्रुतियों में से जो मुख्य नाद संगीत के लिए चुने गए और जो स्वतः रंजक होते हैं, उन्हें स्वर कहते हैं। मुख्य रूप से सात शुद्ध स्वर होते हैं: षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध), और निषाद (नि)।

सप्तक, वर्ण और अष्टक

सप्तक (Saptak)

सात शुद्ध स्वरों के समूह को सप्तक कहते हैं। इसके तीन प्रकार हैं:

  1. मन्द्र सप्तक: साधारण आवाज़ से दुगुनी नीची ध्वनि वाला सप्तक (स्वरों के नीचे बिंदु लगाया जाता है, जैसे- ध़ि)।
  2. मध्य सप्तक: सामान्य बोलचाल और गायन का सप्तक।
  3. तार सप्तक: मध्य सप्तक से दुगुनी ऊँची ध्वनि वाला सप्तक (स्वरों के ऊपर बिंदु लगाया जाता है, जैसे- सं)।

वर्ण (Varna)

गानक्रियोच्यते वर्णः स चतुर्धा निरूपितः।
स्थाय्यारोह्यवरोही च संचारीत्यथ लक्षणम्।।


भावार्थ: गान करने की क्रिया को वर्ण कहते हैं। यह चार प्रकार का होता है। (संगीत रत्नाकर)

  • स्थायी वर्ण: जब एक ही स्वर का बार-बार उच्चारण किया जाए।
  • आरोही वर्ण: स्वरों को नीचे से ऊपर की ओर गाना-बजाना।
  • अवरोही वर्ण: स्वरों को ऊपर से नीचे की ओर गाना-बजाना।
  • संचारी वर्ण: स्थायी, आरोही और अवरोही तीनों वर्णों का मिश्रित रूप।

अष्टक (Octave)

मध्य सप्तक के 'सा' से लेकर तार सप्तक के 'सा' तक के आठ स्वरों के समूह को अष्टक कहा जाता है।

अलंकार (Alankar)

स्वरों के नियमित और निश्चित क्रमबद्ध चलन को अलंकार या पलटा कहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के गले व हाथ की तैयारी कराना तथा स्वर-ताल का ज्ञान सुदृढ़ करना है।

अलंकार के कुछ प्रमुख उदाहरण

  • उदाहरण 1:
    आरोह: सा रे ग म प ध नि सं
    अवरोह: सं नि ध प म ग रे सा
  • उदाहरण 2:
    आरोह: सा ग, रे म, ग प, म ध, प नि, ध सं
    अवरोह: सं ध, नि प, ध म, प ग, म रे, ग सा
  • उदाहरण 3:
    आरोह: सा रे ग, रे ग म, ग म प, म प ध, प ध नि, ध नि सं
    अवरोह: सं नि ध, नि ध प, ध प म, प म ग, म ग रे, ग रे सा
राग एवं उसकी जातियाँ

विशिष्ट स्वरों और वर्णों से सजी वह ध्वनि रचना जो सुनने वाले के चित्त को प्रसन्न करे, राग कहलाती है।

योऽसौ ध्वनि विशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः।
रंजको जनचित्तानां स रागः कथितो बुधैः।।


भावार्थ: स्वर और वर्ण से सुशोभित ध्वनि जो जन-चित्त को रंजित करे, उसे विद्वानों ने राग कहा है। (बृहद्देशी)

राग के प्रमुख नियम व लक्षण

  1. राग में रंजकता (मधुरता) का होना अनिवार्य है।
  2. राग में कम से कम 5 और अधिक से अधिक 7 स्वर होने चाहिए।
  3. षड्ज (सा) स्वर कभी वर्जित नहीं होता।
  4. मध्यम (म) और पंचम (प) में से कम से कम एक स्वर का रहना आवश्यक है।
  5. प्रत्येक राग का कोई न कोई थाट, आरोह-अवरोह, वादी-संवादी और गायन समय निश्चित होता है।

राग की जातियाँ (Jatis of Raga)

रागों में प्रयुक्त स्वरों की संख्या के आधार पर मुख्य तीन जातियाँ होती हैं, जिनकी नौ उपजातियाँ बनती हैं:

  • सम्पूर्ण: जिसमें सातों स्वरों का प्रयोग हो।
  • षाड्व: जिसमें छह स्वरों का प्रयोग हो।
  • औडुव: जिसमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग हो।

नौ उपजातियाँ: सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, सम्पूर्ण-षाड्व, सम्पूर्ण-औडुव, षाड्व-सम्पूर्ण, षाड्व-षाड्व, षाड्व-औडुव, औडुव-सम्पूर्ण, औडुव-षाड्व, औडुव-औडुव।

मूर्च्छना एवं ग्राम

मूर्च्छना (Moorchhana)

सात स्वरों के क्रमानुसार आरोह और अवरोह करने को मूर्च्छना कहते हैं। 'मूर्च्छयते-येन रागः' अर्थात् जिससे राग चमकते या उत्पन्न होते हैं। मूर्च्छनाएँ ग्रामों पर आधारित होती हैं। प्रत्येक ग्राम की 7 मूर्च्छनाएँ होती हैं।

मूर्च्छना क्रममूर्च्छना का नामआधुनिक थाट
प्रथमउत्तरमंदाकाफी
द्वितीयरंजनीबिलावल
तृतीयउत्तरायताकोई समान थाट नहीं
चतुर्थशुद्ध षड्जाआसावरी
पंचममत्सरीकृताखमाज
छठीअश्वक्रांताकल्याण
सप्तमअभिरुद्गताभैरवी

ग्राम (Gram)

स्वरों के व्यवस्थित समूह को, जो मूर्च्छनाओं का आधार होता है, ग्राम कहते हैं। प्राचीन ग्रंथों में तीन ग्रामों का उल्लेख है:

  1. षड्ज ग्राम: इसका मुख्य स्वर षड्ज है। इसमें षड्ज-पंचम संवाद (13 श्रुति अंतराल) अनिवार्य है।
  2. मध्यम ग्राम: इसमें पंचम स्वर को एक श्रुति नीचे (16वीं श्रुति पर) उतारा जाता है। इसमें षड्ज-मध्यम संवाद (9 श्रुति अंतराल) होता है।
  3. गांधार ग्राम: यह स्वर्ग लोक में गंधर्वों द्वारा प्रयुक्त माना जाता है, पृथ्वी पर इसका प्रचलन लुप्तप्राय है।
लय एवं ताल विधान

लय के प्रकार (Types of Laya)

संगीत के समय की समान गति को लय कहते हैं। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं:

  • विलंबित लय: बहुत धीमी गति, जो ख्याल गायन और मसीतखानी गत के लिए उपयुक्त है।
  • मध्य लय: साधारण गति, जो लगभग घड़ी के सेकंड की गति के समान होती है।
  • द्रुत लय: मध्य लय से दुगुनी तेज़ गति, जो तराना और रजाखानी गत के लिए प्रयुक्त होती है।

ताल के अंग (Elements of Taal)

  • मात्रा: लय को मापने की सबसे छोटी इकाई।
  • विभाग: ताल की मात्राओं को निश्चित खंडों में बाँटना।
  • सम: ताल की पहली मात्रा, जहाँ सबसे अधिक बल दिया जाता है (चिह्न: ×)।
  • ताली: विभाग की वह मात्रा जहाँ हाथ से ताली बजाई जाती है।
  • खाली: शून्य भाव दर्शाने के लिए हाथ को हवा में हिलाना (चिह्न: 0)।
  • ठेका: किसी ताल के वे निश्चित बोल जिससे उस ताल की पहचान होती है।
  • आवर्तन: ताल की पहली मात्रा से अंतिम मात्रा तक का एक पूरा चक्र।
प्रमुख तालों की स्वरलिपि (Taal Notation Grids)

एकताल (12 मात्रा)

मात्रा123456789101112
बोलधिंधिंधागेतिरकिटतूनाकताधागेतिरकिटधीना
चिह्न×02034

तीव्रा ताल (7 मात्रा)

मात्रा1234567
बोलधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×23

चारताल / चौताल (12 मात्रा)

मात्रा123456789101112
बोलधाधादिंताकिटधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×02034

तीनताल (16 मात्रा)

मात्रा12345678910111213141516
बोलधाधिंधिंधाधाधिंधिंधाधातिंतिंताताधिंधिंधा
चिह्न×203

रूपक ताल (7 मात्रा)

मात्रा1234567
बोलतीतीनाधीनाधीना
चिह्न023

झपताल (10 मात्रा)

मात्रा12345678910
बोलधीनाधीधीनातीनाधीधीना
चिह्न×203