Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 4: हिन्दुस्तानी संगीत की गायन एवं वादन विधाएँ

प्रस्तावना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स्वर, लय और तालबद्ध शब्दों से निर्मित रचना को गीत कहा जाता है। गीत का मुख्य उद्देश्य भावयुक्त अभिव्यक्ति, सौंदर्य और मनोरंजन उत्पन्न करना है। उत्तर भारत में हिन्दुस्तानी संगीत और दक्षिण भारत में कर्नाटक संगीत की विभिन्न विधाएँ इसके स्वरूप को स्पष्ट करती हैं।

प्राचीन काल से विकासक्रम

  • ऋषि-मुनि काल: प्राचीन काल में ऋषि-मुनि संस्कृत मंत्रों का गान कर ईश्वर की आराधना करते थे। धीरे-धीरे लय, ताल और छंद के नियमों के आधार पर श्लोक, स्तोत्र, जातिगान और प्रबंध आदि विधाओं का विकास हुआ।
  • प्रबंध गायन: प्राचीन प्रबंध गेय विधा को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था। इसके चार भागों को धातु और छह अंगों को अंग कहा जाता था।
  • प्रबंध के चार धातु: उद्ग्राह, मेलापक, ध्रुव और आभोग।
  • प्रबंध के छह अंग: स्वर, विरूद, तेनक, पद, पाट और ताल।
  • ध्रुपद का उदय: दसवीं से तेरहवीं शताब्दी तक प्रबंध विधा प्रचलित रही। मुगल साम्राज्य की स्थापना के बाद हिन्दू और मुस्लिम सभ्यताओं के मिश्रण से हिंदी, उर्दू और फ़ारसी के समन्वय ने प्रबंध के शास्त्रीय स्वरूप को प्रभावित किया, जिससे नवीन गेय विधा ध्रुपद या ध्रुवपद का जन्म हुआ।
ध्रुपद गायन शैली

ध्रुपद शब्द दो शब्दों के योग से बना है: ध्रुव (अटल/ईश्वर उपासना) + पद (पद्य रचना)। संगीत सम्राट तानसेन के अनुसार, चार तुकों से युक्त, शुद्ध अक्षरों वाली और नवरसों से परिपूर्ण रचना ध्रुपद कहलाती है।

ध्रुपद की मुख्य विशेषताएँ

  • भाषा: ध्रुपद की बंदिशें प्रायः हिंदी, उर्दू और ब्रजभाषा में मिलती हैं।
  • गायक संज्ञा: प्राचीन काल में ध्रुपद गायकों को कलावन्त कहा जाता था।
  • प्रकृति: यह गंभीर प्रकृति की दमदार आवाज़ की गायकी है। इसमें गमक और मींड का विशेष प्रयोग होता है, जबकि मुर्की और तानें पूर्णतः वर्जित हैं।
  • संगत वाद्य: ध्रुपद की संगत मुख्य रूप से पखावज जैसे गंभीर वाद्य से होती है, यद्यपि वर्तमान में तबले का प्रयोग भी किया जाता है।
  • प्रयुक्त तालें: चौताल, सूलताल, तीव्रा, ब्रह्मताल आदि।
  • रस अभिव्यक्ति: ध्रुपद में मुख्य रूप से वीर, रौद्र, शांत, श्रृंगार, करुण और भक्ति रस की अभिव्यक्ति होती है।

ध्रुपद के चार भाग (अवयव)

  1. स्थायी: बंदिश का पहला और मुख्य भाग।
  2. अंतरा: बंदिश का दूसरा भाग जो प्रायः तार सप्तक के स्वरों को छूता है।
  3. संचारी: बंदिश का तीसरा भाग जिसमें स्वरों का संचरण तीनों सप्तकों में होता है।
  4. आभोग: बंदिश का अंतिम भाग जिसमें रचनाकार का नाम या छाप होती है।

ध्रुपद की चार बानियाँ

हकीम मोहम्मद करम इमाम के ग्रंथ मआदनुल मुसीकी में ध्रुपद शैली की चार बानियों का उल्लेख मिलता है:

  1. खंडार बानी
  2. नौहार बानी
  3. डागुर बानी
  4. गोबरहार बानी

गायन पद्धति एवं प्रमुख कलाकार

ध्रुपद गायन के प्रारंभ में नोम-तोम, री, ते आदि निरर्थक बोलों से मंद्र, मध्य और तार सप्तक में आलाप किया जाता है। इसके बाद विभिन्न लयकारियों (आड़, दुगुन, तिगुन, चौगुन, छहगुन, अठगुन) का प्रदर्शन किया जाता है।

प्रमुख ध्रुपद कलाकार: उस्ताद वासिफुद्दीन डागर, बहराम खाँ, बन्दे खाँ, जाकिरुद्दीन मल्लिक, उस्ताद अमीनुद्दीन डागर, पंडित अभय नारायण मल्लिक, पंडित विदुर मल्लिक आदि।

ख्याल गायन शैली

वर्तमान काल में उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की सर्वाधिक प्रचलित गेय विधा ख्याल है। ख्याल का शाब्दिक अर्थ कल्पना या सृजनात्मकता है। इसमें राग के नियमों के अंतर्गत गायक अपनी कल्पनाशीलता से आलाप-तान द्वारा राग को सजाता है।

उत्पत्ति एवं ऐतिहासिक विकास

  • उत्पत्ति स्रोत: संगीत रत्नाकर में वर्णित रूपकालप्त और मतंग मुनि के बृहद्देशी ग्रंथ में वर्णित साधारणी गीति को ख्याल की पूर्वपीठिका माना जाता है।
  • प्रचारक: 15वीं शताब्दी में जौनपुर के बादशाह सुल्तान हुसैन शाह शर्की ने इस शैली का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।
  • विकास युग: मुगल शासक मोहम्मद शाह रंगीले के दरबार में प्रसिद्ध संगीतकार सदारंग और अदारंग ने अनेक ख्याल बंदिशों की रचना की।
  • भाषा: ख्याल की बंदिशें ब्रज, अवधी, हिंदी, उर्दू और राजस्थानी भाषाओं में मिलती हैं।

ख्याल के प्रकार

1. विलंबित ख्याल (बड़ा ख्याल)

  • इसे अत्यंत धीमी या विलंबित लय में गाया जाता है।
  • गायन का प्रारंभ राग के स्वरूप को दर्शाते हुए आकार के आलाप से होता है।
  • इसमें बोल-आलाप, बोल-तान और अंत में द्रुत लय की तानें (चौगुन, अठगुन, सोलहगुन) गाकर प्रदर्शन समाप्त किया जाता है।
  • प्रयुक्त तालें: एकताल, तिलवाड़ा, झूमरा, आड़ा चौताल आदि।

2. द्रुत ख्याल (छोटा ख्याल)

  • इसका गायन मध्य लय या द्रुत लय में होता है।
  • इसमें विलंबित ख्याल की तुलना में कम समय लगता है।
  • गायन के बीच में आलाप, बोल-आलाप, बोलबाँट और विभिन्न लयकारियों का प्रदर्शन होता है। अंत में द्रुत लय में बोलतान और तिहाई लगाकर गायन समाप्त किया जाता है।
  • प्रयुक्त तालें: त्रिताल, झपताल, रूपक, द्रुत एकताल आदि।

प्रमुख ख्याल गायक

पंडित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, केसरबाई केरकर, पंडित जसराज, अजय चक्रवर्ती, गिरिजा देवी आदि ने ख्याल गायकी को जन-साधारण तक पहुँचाया।

तराना

तराना शास्त्रीय संगीत की एक विशिष्ट और द्रुत लय की गायन शैली है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें सार्थक शब्दों के स्थान पर निरर्थक शब्दों का प्रयोग होता है।

सरगम गीत (स्वरमालिका)

राग में गाई जाने वाली स्वरों की तालबद्ध रचना को सरगम गीत या स्वरमालिका कहते हैं। इसमें कोई शब्द या बंदिश नहीं होती, केवल स्वर होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को स्वर, ताल और लय के साथ राग का ज्ञान कराना है।

राग अल्हैया बिलावल - झपताल स्वरमालिका (तालिका)

विभागविभाग 1 (X)विभाग 2 (2)विभाग 3 (0)विभाग 4 (3)
मात्रा12345678910
स्थायी (पंक्ति 1)गपनिधनिसंऽसंरेंसं
स्थायी (पंक्ति 2)संसंरेंसंनिधपधमग
स्थायी (पंक्ति 3)गमपमगमरेसरेस
स्थायी (पंक्ति 4)धधरेंसंनिधपधमग
अंतरा (पंक्ति 1)पपनिधनिसंऽसंरेंसं
अंतरा (पंक्ति 2)संरेंगंमंपंमंगंमंरेंसं
अंतरा (पंक्ति 3)गंरेंसंरेंसंधपसंधप
अंतरा (पंक्ति 4)गमरेगमपगमरेस
लक्षण गीत

जब किसी बंदिश के शब्द राग के शास्त्रीय लक्षणों (जैसे वादी, संवादी, वर्जित स्वर, गायन समय, जाति आदि) का वर्णन करते हैं, तो उसे लक्षण गीत कहा जाता है। इसके अभ्यास से राग संबंधी तथ्य सरलता से कंठस्थ हो जाते हैं। इसके दो भाग होते हैं: स्थायी और अंतरा।

राग आसावरी - त्रिताल लक्षण गीत

स्थायी:
कान्हा मोहे आसावरी राग सुनाए।
ग नि को आरोहन में छुपाए।

अंतरा:
धैवत वादी ग संवादी।
मध्यम सुर ग्रह न्यास सुपंचम।
अवरोहन संपुरन दिखावत।
स रे म रे म प ध प ध गं रें सं रें नि ध प


भावार्थ / विश्लेषण: इस लक्षण गीत से स्पष्ट होता है कि राग आसावरी का वादी स्वर धैवत (ध) और संवादी स्वर गांधार (ग) है। इसके आरोह में गांधार (ग) और निषाद (नि) स्वर वर्जित हैं (जिससे इसकी जाति औडुव-संपूर्ण बनती है) और न्यास का स्वर पंचम (प) है।

गत (वादन विधा)

स्वरों की वह रचना जो किसी निश्चित ताल में निबद्ध होती है और जिसमें वाद्य यंत्र (जैसे सितार, सरोद) के वादन के बोलों का प्रयोग होता है, गत कहलाती है। इसे बंदिश भी कहा जाता है। पारंपरिक रूप से गत दो प्रकार की होती है:

1. मसीतखानी गत (विलंबित गत)

  • निर्माता: इसके जन्मदाता सेनिका घराने के मसीत खाँ थे।
  • लय: यह विलंबित लय में बजाई जाती है और हमेशा तीनताल में निबद्ध होती है।
  • निकास बोल: इसकी शुरुआत सदैव ताल की 12वीं मात्रा से होती है। इसके निश्चित बोल इस प्रकार हैं: दिर दा दिर दा रा दा दा रा।
  • रचना संरचना: 12वीं मात्रा से तीसरी मात्रा तक और पुनः चौथी मात्रा से 11वीं मात्रा तक इन बोलों की पुनरावृत्ति होती है। इसमें मींड, गमक, तोड़े और लयकारी का प्रयोग होता है।

2. रज़ाखानी गत (द्रुत गत)

  • निर्माता: इसके जन्मदाता लखनऊ के रजा खाँ थे।
  • लय: यह द्रुत लय में बजाई जाती है और तीनताल में निबद्ध होती है।
  • निकास बोल: इसके निश्चित बोल दा दिर दिर दिर दाऽ र, द डर, दा अथवा दिर दिर दाऽ र, दा ऽर, दा होते हैं।
  • विशेषता: इसमें दुगुन, तानें, लड़ियाँ और झाला प्रस्तुत कर अंत में तिहाई के साथ समापन किया जाता है।
भारतीय संगीत में प्रथम एवं अभ्यास

हरबल्लभ संगीत सम्मेलन

यह हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सबसे प्राचीन संगीत सम्मेलन है। यह प्रतिवर्ष महान प्रतिपादक बाबा हरबल्लभ की समाधि पर जालंधर के सिद्ध पीठ— श्री देवी तालाब में आयोजित किया जाता है। इसकी शुरुआत सर्वप्रथम वर्ष 1875 में हुई थी।

अभ्यास प्रश्न एवं मिलान तालिका

विभाग 'अ'विभाग 'आ' (सही उत्तर)
(क) वसिफुद्दीन डागर3. ध्रुपद
(ख) झमूरा4. विलंबित ताल
(ग) तदारे दा नि1. तराने के बोल
(घ) सरगम गीत5. स्वरमालिका
(ङ) केसरबाई केरकर2. ख्याल गायिका