स्वर, लय और तालबद्ध शब्दों से निर्मित रचना को गीत कहा जाता है। गीत का मुख्य उद्देश्य भावयुक्त अभिव्यक्ति, सौंदर्य और मनोरंजन उत्पन्न करना है। उत्तर भारत में हिन्दुस्तानी संगीत और दक्षिण भारत में कर्नाटक संगीत की विभिन्न विधाएँ इसके स्वरूप को स्पष्ट करती हैं।
ध्रुपद शब्द दो शब्दों के योग से बना है: ध्रुव (अटल/ईश्वर उपासना) + पद (पद्य रचना)। संगीत सम्राट तानसेन के अनुसार, चार तुकों से युक्त, शुद्ध अक्षरों वाली और नवरसों से परिपूर्ण रचना ध्रुपद कहलाती है।
हकीम मोहम्मद करम इमाम के ग्रंथ मआदनुल मुसीकी में ध्रुपद शैली की चार बानियों का उल्लेख मिलता है:
ध्रुपद गायन के प्रारंभ में नोम-तोम, री, ते आदि निरर्थक बोलों से मंद्र, मध्य और तार सप्तक में आलाप किया जाता है। इसके बाद विभिन्न लयकारियों (आड़, दुगुन, तिगुन, चौगुन, छहगुन, अठगुन) का प्रदर्शन किया जाता है।
प्रमुख ध्रुपद कलाकार: उस्ताद वासिफुद्दीन डागर, बहराम खाँ, बन्दे खाँ, जाकिरुद्दीन मल्लिक, उस्ताद अमीनुद्दीन डागर, पंडित अभय नारायण मल्लिक, पंडित विदुर मल्लिक आदि।
वर्तमान काल में उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की सर्वाधिक प्रचलित गेय विधा ख्याल है। ख्याल का शाब्दिक अर्थ कल्पना या सृजनात्मकता है। इसमें राग के नियमों के अंतर्गत गायक अपनी कल्पनाशीलता से आलाप-तान द्वारा राग को सजाता है।
पंडित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, केसरबाई केरकर, पंडित जसराज, अजय चक्रवर्ती, गिरिजा देवी आदि ने ख्याल गायकी को जन-साधारण तक पहुँचाया।
तराना शास्त्रीय संगीत की एक विशिष्ट और द्रुत लय की गायन शैली है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें सार्थक शब्दों के स्थान पर निरर्थक शब्दों का प्रयोग होता है।
राग में गाई जाने वाली स्वरों की तालबद्ध रचना को सरगम गीत या स्वरमालिका कहते हैं। इसमें कोई शब्द या बंदिश नहीं होती, केवल स्वर होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को स्वर, ताल और लय के साथ राग का ज्ञान कराना है।
| विभाग | विभाग 1 (X) | विभाग 2 (2) | विभाग 3 (0) | विभाग 4 (3) | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
| स्थायी (पंक्ति 1) | ग | प | नि | ध | नि | सं | ऽ | सं | रें | सं |
| स्थायी (पंक्ति 2) | सं | सं | रें | सं | नि | ध | प | ध | म | ग |
| स्थायी (पंक्ति 3) | ग | म | प | म | ग | म | रे | स | रे | स |
| स्थायी (पंक्ति 4) | ध | ध | रें | सं | नि | ध | प | ध | म | ग |
| अंतरा (पंक्ति 1) | प | प | नि | ध | नि | सं | ऽ | सं | रें | सं |
| अंतरा (पंक्ति 2) | सं | रें | गं | मं | पं | मं | गं | मं | रें | सं |
| अंतरा (पंक्ति 3) | गं | रें | सं | रें | सं | ध | प | सं | ध | प |
| अंतरा (पंक्ति 4) | ग | म | रे | ग | म | प | ग | म | रे | स |
जब किसी बंदिश के शब्द राग के शास्त्रीय लक्षणों (जैसे वादी, संवादी, वर्जित स्वर, गायन समय, जाति आदि) का वर्णन करते हैं, तो उसे लक्षण गीत कहा जाता है। इसके अभ्यास से राग संबंधी तथ्य सरलता से कंठस्थ हो जाते हैं। इसके दो भाग होते हैं: स्थायी और अंतरा।
स्थायी:
कान्हा मोहे आसावरी राग सुनाए।
ग नि को आरोहन में छुपाए।अंतरा:
धैवत वादी ग संवादी।
मध्यम सुर ग्रह न्यास सुपंचम।
अवरोहन संपुरन दिखावत।
स रे म रे म प ध प ध गं रें सं रें नि ध पभावार्थ / विश्लेषण: इस लक्षण गीत से स्पष्ट होता है कि राग आसावरी का वादी स्वर धैवत (ध) और संवादी स्वर गांधार (ग) है। इसके आरोह में गांधार (ग) और निषाद (नि) स्वर वर्जित हैं (जिससे इसकी जाति औडुव-संपूर्ण बनती है) और न्यास का स्वर पंचम (प) है।
स्वरों की वह रचना जो किसी निश्चित ताल में निबद्ध होती है और जिसमें वाद्य यंत्र (जैसे सितार, सरोद) के वादन के बोलों का प्रयोग होता है, गत कहलाती है। इसे बंदिश भी कहा जाता है। पारंपरिक रूप से गत दो प्रकार की होती है:
यह हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सबसे प्राचीन संगीत सम्मेलन है। यह प्रतिवर्ष महान प्रतिपादक बाबा हरबल्लभ की समाधि पर जालंधर के सिद्ध पीठ— श्री देवी तालाब में आयोजित किया जाता है। इसकी शुरुआत सर्वप्रथम वर्ष 1875 में हुई थी।
| विभाग 'अ' | विभाग 'आ' (सही उत्तर) |
|---|---|
| (क) वसिफुद्दीन डागर | 3. ध्रुपद |
| (ख) झमूरा | 4. विलंबित ताल |
| (ग) तदारे दा नि | 1. तराने के बोल |
| (घ) सरगम गीत | 5. स्वरमालिका |
| (ङ) केसरबाई केरकर | 2. ख्याल गायिका |