भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रदर्शन में राग गायन की विधि को सर्वसम्मति से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। राग कोई जड़ या अपरिवर्तनीय नियम नहीं है, बल्कि इसमें अपरिसीम विकासवादी क्षमता होती है।
मतंग मुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ बृहद्देशी में राग की स्पष्ट परिभाषा देते हुए निम्नलिखित श्लोक लिखा है:
“योऽसौ ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः।
रंजको जनचित्तानां स च राग उदाहृतः।।”
भावार्थ / विश्लेषण: अर्थात वह विशिष्ट ध्वनि जो स्वर और वर्ण से विभूषित हो तथा मनुष्यों के चित्त (मन) का रंजन (मनोरंजन/आनंदित) करे, उसे ही राग कहा गया है।
राग की गतिशीलता कुछ आधारभूत नियमों के अंतर्गत कार्य करती है जैसे— शुद्ध एवं कोमल स्वर, विशिष्ट स्वर, आरोह-अवरोह, वादी-संवादी, जाति, आलाप, तान, वर्जित स्वर, ताल, लय, कण, और मींड।
राग के नियमित स्वरों से निर्मित विविध स्वर समूहों के माध्यम से असंख्य रचनाएँ भिन्न-भिन्न गेय विधाओं के रूप में वर्गीकृत की जाती हैं:
वैदिक काल से ही ध्वनि पर गंभीर चिंतन प्रारंभ हुआ जिसका वैज्ञानिक स्वरूप सामवेद में देखने को मिलता है। सामवेद की रचना लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व मानी जाती है।
सामवेद में विविध स्वर संख्या प्रयोगों के आधार पर गायन की निम्नलिखित संज्ञाएँ थीं:
ऋग्वेद साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ है जिसमें गीत, वाद्य तथा नृत्य तीनों कलाओं का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद की ऋचाओं के गेयात्मक स्वरूप का संग्रह ही सामवेद के रूप में हुआ।
रामायण एवं महाभारत काल (लगभग 600 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व) में संगीत, वाद्य और नृत्य को समाज का अभिन्न अंग माना जाता था। इस काल में जाति गायन का प्रचलन था जो स्वर-समूह का द्योतक था।
रामायण में दो प्रकार की जातियों का उल्लेख मिलता है:
भरत मुनि के अनुसार, श्रुति, ग्रह, स्वर आदि के समूह से जाति की रचना होती है। नाट्यशास्त्र में जाति के 10 लक्षण बताए गए हैं:
“ग्रहांशौ तारमंद्रौ च न्यासोपन्यास एव्ंा च।
अल्पत्व च बहुत्व षाडवौडविते तथा।।”
जाति के 10 लक्षण: 1. ग्रह, 2. अंश, 3. तार, 4. मन्द्र, 5. न्यास, 6. अपन्यास, 7. अल्पत्व, 8. बहुत्व, 9. औडवत्व, 10. षाडवत्व।
प्राचीन काल में दो मुख्य ग्राम माने जाते थे— षड्ज ग्राम एवं मध्यम ग्राम। इन ग्रामों से उत्पन्न जातियाँ इस प्रकार थीं:
रामायण काल में कुल 7 शुद्ध जातियाँ थीं। बाद में भरत मुनि ने विकृत और संकीर्ण स्वरों के मेल से 11 और जातियों का विकास किया, जिससे भरत के समय कुल 18 जातियाँ प्रचलन में आईं।
रामायण में गांधर्व शब्द का उल्लेख है जिसके अंतर्गत गीत और वाद्य दोनों आते थे। गांधर्व के मुख्य तत्व थे— स्वर, मूर्च्छना, पाठ्य, ताल, लय, जाति और रस।
भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र (दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच) को 'नाट्यवेद' भी कहा जाता है। इसके 28वें अध्याय में संगीत के सप्त स्वरों की गणना की गई है:
“षडजश्र ऋषभश्चैव गन्धारो मध्यमस्तथा ।
पंचमो धैवतश्चैव सप्तमोऽय निषादवात्।।”
सप्त स्वर: षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध), निषाद (नि)।
सप्त स्वरों का क्रमिक आरोहण-अवरोहण मूर्च्छना कहलाता है। प्राचीन काल में क्रमिक गायन का अर्थ अवरोहण क्रम में गाना था, जो साम गान की परंपरा से प्रेरित था।
| आरंभ स्वर | मूर्च्छना का नाम | स्वर रचना (अवरोह क्रम) |
|---|---|---|
| स | उत्तरायता | स नि ध प म ग रे |
| ग | अश्वक्रान्ता | ग रे स नि ध प म |
| आरंभ स्वर | मूर्च्छना का नाम | स्वर रचना (अवरोह क्रम) |
|---|---|---|
| म | सोवोरी | म ग रे स ni ध प |
| नि | मार्गी | नि ध प म ग रे स |
नाट्य में प्रयोग के नियमों के अनुसार रागों को गाने के पाँच ढंग या प्रकार थे जिन्हें गीतियाँ कहा जाता था:
जो राग इन निर्दिष्ट नियमों के अंतर्गत नहीं आते थे, उन्हें देशी राग कहा गया। इनका आगे चलकर रागांग, भाषांग, उपांग और क्रियांग में विभाजन हुआ।
चौथी-पाँचवीं शताब्दी में कश्यप मुनि ने राग की परिभाषा इस प्रकार दी:
“चतुर्णामपि वर्णाना योगा राग:शोभना।
स सर्वो दृष्यते येन तेन राग इति स्मृता।।”
भावार्थ: चार वर्णों (स्थायी, आरोही, अवरोही, संचारी) का योग राग को शोभनीय बनाता है।
मतंग मुनि ने अपने ग्रंथ बृहद्देशी में रागों के लक्षणों का सर्वप्रथम विस्तृत उल्लेख किया। उन्होंने राग की एक अन्य परिभाषा दी:
“स्वर वर्ण विशेषेण ध्वनिभेदेन वा पुनः।
रज्यते येन य: कश्चित सराग: सम्मत: सताम्।।”
भावार्थ: विशिष्ट स्वर-वर्ण (गान क्रिया) अथवा ध्वनि भेद के द्वारा जो जन-रंजन करने में समर्थ हो, वही राग है।
शार्ङ्गदेव द्वारा रचित संगीत रत्नाकर में श्रुति, स्वर, नाद, ग्राम और मूर्च्छना का विस्तृत वर्णन है। उन्होंने कुल 264 रागों का विवरण दिया है।
इन्होंने नाद से श्रुति की उत्पत्ति बताई और 22 श्रुतियों के आधार पर स्वरों का विभाजन इस प्रकार किया:
स्वर-श्रुति संख्या सूत्र: स-4, रे-3, ग-2, म-4, प-4, ध-3, नि-2
| क्र. सं. | श्रुति का नाम | क्र. सं. | श्रुति का नाम | क्र. सं. | श्रुति का नाम | क्र. सं. | श्रुति का नाम |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | तीव्रा | 7 | कुमुद्वती | 13 | मंदा | 19 | रौद्री |
| 2 | दयावती | 8 | रंजनी | 14 | रक्तिका | 20 | प्रीति |
| 3 | क्रोधा | 9 | वज्रिका | 15 | प्रसारिणी | 21 | संदीपनी |
| 4 | मार्जनी | 10 | क्षिति | 16 | रक्ता | 22 | रम्या |
| 5 | आलापिनी | 11 | मदन्ती | 17 | रोहिणी | ||
| 6 | उग्रा | 12 | क्षोभिणी | 18 | छंदोवती |
संगीत रत्नाकर में गान के दो मुख्य भेद बताए गए हैं:
प्राचीन काल में आलाप के दो प्रकार माने जाते थे— रागालाप और रूपकालाप। आलाप गायन में स्वस्थान नियम का पालन किया जाता था जिसके चार चरण होते थे:
निबद्ध गान के अंतर्गत प्राचीन काल में प्रबंध, वस्तु और रूपक आते थे। प्रबंध के छह अंग और चार धातु होते थे:
मध्यकाल में रागों के वर्गीकरण के लिए राग-रागिनी पद्धति का प्रादुर्भाव हुआ। इसमें पुरुष और महिला के मूल चरित्रों के आधार पर रागों का विभाजन किया गया।
इस पद्धति के अंतर्गत मुख्यतः चार मत प्रचलित हैं:
प्रत्येक मत के अनुसार 6 मुख्य राग तथा उनकी 5-5 या 6-6 रागिनियाँ मानी गई हैं। इन राग-रागिनियों के ध्यान पर आधारित चित्रों को रागमाला चित्र कहा जाता है।
विष्णु नारायण भातखंडे ने समय सिद्धांत के आधार पर रागों को तीन मुख्य वर्गों में विभाजित किया है:
| वर्ग | स्वरों की विशेषता | गायन का समय | उदाहरण राग |
|---|---|---|---|
| 1. रे और ध कोमल वाले राग | रे-ध कोमल, ग शुद्ध होना अनिवार्य (संधिप्रकाश राग) | भोर (सुबह 4 से 7) और सायंकाल (शाम 4 से 7) | भैरव, पूर्वी, मारवा |
| 2. रे और ध शुद्ध वाले राग | रे और ध शुद्ध स्वर वाले राग (संधिप्रकाश के बाद) | प्रातःकाल एवं रात्रि के 7 से 10 बजे तक | यमन, बिलावल, खमाज |
| 3. ग और नि कोमल वाले राग | गंधार और निषाद कोमल स्वर वाले राग | दिन और रात के 10 बजे से 3-4 बजे तक | आसावरी, जौनपुरी, मालकौंस, बागेश्री |
मध्यम (म) स्वर की भूमिका: प्रातःकालीन संधिप्रकाश रागों में अधिकतर शुद्ध मध्यम तथा सायंकालीन संधिप्रकाश रागों में तीव्र मध्यम के प्रयोग की प्रधानता रहती है।
उत्तर भारतीय संगीत में थाट-राग पद्धति को स्थापित करने का श्रेय पंडित विष्णु नारायण भातखंडे को जाता है। उन्होंने समस्त रागों को 10 थाटों के अंतर्गत वर्गीकृत किया।
| क्र. सं. | थाट का नाम | थाट के स्वर का स्वरूप |
|---|---|---|
| 1 | बिलावल | सभी शुद्ध स्वर (स रे ग म प ध नि) | 2 | कल्याण | तीव्र मध्यम (मँ) शेष शुद्ध स्वर |
| 3 | खमाज | कोमल निषाद (नि) शेष शुद्ध स्वर |
| 4 | काफ़ी | कोमल ग, नि शेष शुद्ध स्वर |
| 5 | आसावरी | कोमल ग, ध, नि शेष शुद्ध स्वर |
| 6 | भैरव | कोमल रे, ध शेष शुद्ध स्वर |
| 7 | भैरवी | कोमल रे, ग, ध, नि शेष शुद्ध स्वर |
| 8 | पूर्वी | कोमल रे, ध और तीव्र मँ शेष शुद्ध स्वर |
| 9 | मारवा | कोमल रे और तीव्र मँ शेष शुद्ध स्वर |
| 10 | तोड़ी | कोमल रे, ग, ध और तीव्र मँ |
भारतीय संगीत के आधुनिक प्रचार-प्रसार में महान संगीतज्ञों का अमूल्य योगदान रहा है।