Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 5: हिंदुस्तानी संगीत में राग पद्धति का क्रमिक विकास

भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग का क्रमिक विकास एवं परिभाषा

भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रदर्शन में राग गायन की विधि को सर्वसम्मति से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। राग कोई जड़ या अपरिवर्तनीय नियम नहीं है, बल्कि इसमें अपरिसीम विकासवादी क्षमता होती है।

राग की शास्त्रीय परिभाषा

मतंग मुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ बृहद्देशी में राग की स्पष्ट परिभाषा देते हुए निम्नलिखित श्लोक लिखा है:

“योऽसौ ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः।
रंजको जनचित्तानां स च राग उदाहृतः।।”


भावार्थ / विश्लेषण: अर्थात वह विशिष्ट ध्वनि जो स्वर और वर्ण से विभूषित हो तथा मनुष्यों के चित्त (मन) का रंजन (मनोरंजन/आनंदित) करे, उसे ही राग कहा गया है।

राग के आधारभूत नियम एवं गेय विधाओं का वर्गीकरण

राग की गतिशीलता कुछ आधारभूत नियमों के अंतर्गत कार्य करती है जैसे— शुद्ध एवं कोमल स्वर, विशिष्ट स्वर, आरोह-अवरोह, वादी-संवादी, जाति, आलाप, तान, वर्जित स्वर, ताल, लय, कण, और मींड।

राग के नियमित स्वरों से निर्मित विविध स्वर समूहों के माध्यम से असंख्य रचनाएँ भिन्न-भिन्न गेय विधाओं के रूप में वर्गीकृत की जाती हैं:

  • शास्त्रीय संगीत: ध्रुपद, धमार, विलंबित ख्याल, द्रुत ख्याल आदि।
  • उपशास्त्रीय संगीत: ठुमरी, दादरा, कजरी आदि।
  • लोक संगीत: विभिन्न प्रदेशों के लोकगीत उनकी विशिष्ट बोलियों के साथ।
  • सुगम संगीत: भजन, गज़ल, सामाजिक एवं शिक्षाप्रद गीत आदि।
वैदिक काल में संगीत एवं राग के प्रारंभिक तत्व

वैदिक काल से ही ध्वनि पर गंभीर चिंतन प्रारंभ हुआ जिसका वैज्ञानिक स्वरूप सामवेद में देखने को मिलता है। सामवेद की रचना लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व मानी जाती है।

सामवेद में स्वर संख्या प्रयोग

सामवेद में विविध स्वर संख्या प्रयोगों के आधार पर गायन की निम्नलिखित संज्ञाएँ थीं:

  • आर्चिक — केवल एक स्वर का प्रयोग।
  • गाथिक — दो स्वरों का प्रयोग।
  • सामिक — तीन स्वरों का प्रयोग।
  • स्वरान्तर — चार स्वरों का प्रयोग।

वैदिक गान विधि एवं ऋग्वेद

ऋग्वेद साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ है जिसमें गीत, वाद्य तथा नृत्य तीनों कलाओं का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद की ऋचाओं के गेयात्मक स्वरूप का संग्रह ही सामवेद के रूप में हुआ।

  • वैदिक काल में 'राग' शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, परंतु साम गान की विधि में राग के अनेक तत्व विद्यमान थे।
  • यज्ञ के समय मंत्रोच्चारण हेतु नियमित स्वर समूह निर्धारित थे।
  • जैसे आज रागों में षड्ज (सा) को आधार स्वर माना जाता है, वैसे ही वैदिक युग में मंत्रोच्चारण से पूर्व 'हुम्' का उच्चारण अनिवार्य था।
  • वैदिक युग में उद्गाता, प्रस्तोता और प्रतिहर्ता नामक तीन गायक मिलकर संगीतमय मंत्रोच्चारण करते थे और आधार स्वर 'हुम्' पर ठहरकर मंत्रोच्चारण पूर्ण करते थे।
रामायण एवं महाभारत काल में संगीत

रामायण एवं महाभारत काल (लगभग 600 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व) में संगीत, वाद्य और नृत्य को समाज का अभिन्न अंग माना जाता था। इस काल में जाति गायन का प्रचलन था जो स्वर-समूह का द्योतक था।

जाति के प्रकार एवं लक्षण

रामायण में दो प्रकार की जातियों का उल्लेख मिलता है:

  • पाठ्य जाति — जो केवल पठन अथवा पाठ करने के योग्य हो।
  • स्वर जाति — जो विविध स्वर रचनाओं के साथ गाई जाती हो।

भरत मुनि के अनुसार, श्रुति, ग्रह, स्वर आदि के समूह से जाति की रचना होती है। नाट्यशास्त्र में जाति के 10 लक्षण बताए गए हैं:

“ग्रहांशौ तारमंद्रौ च न्यासोपन्यास एव्‍ंा च।
अल्पत्व च बहुत्व षाडवौडविते तथा।।”


जाति के 10 लक्षण: 1. ग्रह, 2. अंश, 3. तार, 4. मन्द्र, 5. न्यास, 6. अपन्यास, 7. अल्पत्व, 8. बहुत्व, 9. औडवत्व, 10. षाडवत्व।

ग्राम एवं जाति वर्गीकरण

प्राचीन काल में दो मुख्य ग्राम माने जाते थे— षड्ज ग्राम एवं मध्यम ग्राम। इन ग्रामों से उत्पन्न जातियाँ इस प्रकार थीं:

  • षड्ज ग्राम की जातियाँ (चार): षाडजी, आर्षभी, गांधारी, मध्यमी।
  • मध्यम ग्राम की जातियाँ (तीन): पंचमी, धैवती, नैषादी।

रामायण काल में कुल 7 शुद्ध जातियाँ थीं। बाद में भरत मुनि ने विकृत और संकीर्ण स्वरों के मेल से 11 और जातियों का विकास किया, जिससे भरत के समय कुल 18 जातियाँ प्रचलन में आईं।

गांधर्व संगीत

रामायण में गांधर्व शब्द का उल्लेख है जिसके अंतर्गत गीत और वाद्य दोनों आते थे। गांधर्व के मुख्य तत्व थे— स्वर, मूर्च्छना, पाठ्य, ताल, लय, जाति और रस।

नाट्यशास्त्र एवं मूर्च्छना पद्धति

भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र (दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच) को 'नाट्यवेद' भी कहा जाता है। इसके 28वें अध्याय में संगीत के सप्त स्वरों की गणना की गई है:

“षडजश्र ऋषभश्चैव गन्धारो मध्यमस्तथा ।
पंचमो धैवतश्चैव सप्‍तमोऽय निषादवात्।।”


सप्त स्वर: षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध), निषाद (नि)।

मूर्च्छना पद्धति

सप्त स्वरों का क्रमिक आरोहण-अवरोहण मूर्च्छना कहलाता है। प्राचीन काल में क्रमिक गायन का अर्थ अवरोहण क्रम में गाना था, जो साम गान की परंपरा से प्रेरित था।

षड्ज ग्राम की मूर्च्छना का उदाहरण

आरंभ स्वर मूर्च्छना का नाम स्वर रचना (अवरोह क्रम)
स उत्तरायता स नि ध प म ग रे
ग अश्वक्रान्ता ग रे स नि ध प म

मध्यम ग्राम की मूर्च्छना का उदाहरण

आरंभ स्वर मूर्च्छना का नाम स्वर रचना (अवरोह क्रम)
म सोवोरी म ग रे स ni ध प
नि मार्गी नि ध प म ग रे स

गीतियों के पाँच प्रकार

नाट्य में प्रयोग के नियमों के अनुसार रागों को गाने के पाँच ढंग या प्रकार थे जिन्हें गीतियाँ कहा जाता था:

  1. शुद्धा: सीधे परंतु अल्प अलंकृत स्वर।
  2. भिन्ना: साधारणतः अलंकृत स्वर।
  3. गौड़ी: पूर्णतः अलंकृत स्वर।
  4. बेसरा: द्रुत गति में गायन।
  5. साधारणी: साधारण रूप में गायन।

जो राग इन निर्दिष्ट नियमों के अंतर्गत नहीं आते थे, उन्हें देशी राग कहा गया। इनका आगे चलकर रागांग, भाषांग, उपांग और क्रियांग में विभाजन हुआ।

मध्यकालीन विकास एवं श्रुति-स्वर विभाजन

चौथी-पाँचवीं शताब्दी में कश्यप मुनि ने राग की परिभाषा इस प्रकार दी:

“चतुर्णामपि वर्णाना योगा राग:शोभना।
स सर्वो दृष्यते येन तेन राग इति स्मृता।।”


भावार्थ: चार वर्णों (स्थायी, आरोही, अवरोही, संचारी) का योग राग को शोभनीय बनाता है।

मतंग मुनि का योगदान

मतंग मुनि ने अपने ग्रंथ बृहद्देशी में रागों के लक्षणों का सर्वप्रथम विस्तृत उल्लेख किया। उन्होंने राग की एक अन्य परिभाषा दी:

“स्वर वर्ण विशेषेण ध्वनिभेदेन वा पुनः।
रज्यते येन य: कश्चित सराग: सम्मत: सताम्।।”


भावार्थ: विशिष्ट स्वर-वर्ण (गान क्रिया) अथवा ध्वनि भेद के द्वारा जो जन-रंजन करने में समर्थ हो, वही राग है।

शार्ङ्गदेव एवं संगीत रत्नाकर (13वीं शताब्दी)

शार्ङ्गदेव द्वारा रचित संगीत रत्नाकर में श्रुति, स्वर, नाद, ग्राम और मूर्च्छना का विस्तृत वर्णन है। उन्होंने कुल 264 रागों का विवरण दिया है।

इन्होंने नाद से श्रुति की उत्पत्ति बताई और 22 श्रुतियों के आधार पर स्वरों का विभाजन इस प्रकार किया:

स्वर-श्रुति संख्या सूत्र: स-4, रे-3, ग-2, म-4, प-4, ध-3, नि-2

22 श्रुतियों के नाम

क्र. सं. श्रुति का नाम क्र. सं. श्रुति का नाम क्र. सं. श्रुति का नाम क्र. सं. श्रुति का नाम
1 तीव्रा 7 कुमुद्वती 13 मंदा 19 रौद्री
2 दयावती 8 रंजनी 14 रक्तिका 20 प्रीति
3 क्रोधा 9 वज्रिका 15 प्रसारिणी 21 संदीपनी
4 मार्जनी 10 क्षिति 16 रक्ता 22 रम्या
5 आलापिनी 11 मदन्ती 17 रोहिणी
6 उग्रा 12 क्षोभिणी 18 छंदोवती
निबद्ध एवं अनिबद्ध गान

संगीत रत्नाकर में गान के दो मुख्य भेद बताए गए हैं:

आलाप के प्राचीन प्रकार

प्राचीन काल में आलाप के दो प्रकार माने जाते थे— रागालाप और रूपकालाप। आलाप गायन में स्वस्थान नियम का पालन किया जाता था जिसके चार चरण होते थे:

  1. प्रथम चरण: स्थायी स्वर का प्रयोग करते हुए आलाप।
  2. द्वितीय चरण: स्थायी स्वर से 4 या 5 स्वरों के अंतर पर स्थापित स्वर (द्वयर्ध स्वर) का प्रयोग।
  3. तृतीय चरण: आठवें स्वर यानी दुगुने ऊँचे स्वर (द्विगुण स्वर) का प्रयोग।
  4. चतुर्थ चरण: स्थायी स्वर से नीचे के द्विगुण स्वरों से लेकर राग के समस्त स्वरों और सप्तकों का प्रयोग।

प्रबंध गायन एवं उसके अंग

निबद्ध गान के अंतर्गत प्राचीन काल में प्रबंध, वस्तु और रूपक आते थे। प्रबंध के छह अंग और चार धातु होते थे:

प्रबंध के छह अंग:

  • स्वर — स रे ग म आदि सात स्वर।
  • विरुद — गीत के पात्रों का गुणगान (देवी, देवता, नायक आदि)।
  • पद — शब्द या रचना के बोल।
  • तेनक — 'ओम तत सत' जैसे मांगलिक शब्दों का प्रयोग।
  • पाट — ताल के बोलों का उच्चारण (जैसे धिट, कत आदि)।
  • ताल — समय को मापने वाले विभिन्न छंद एवं ताल।

प्रबंध की चार धातुएँ:

  • उद्ग्राहक — प्रबंध का प्रथम भाग (आज के स्थायी के समान)।
  • मेलापक — दूसरा भाग जो उद्ग्राहक और ध्रुव को जोड़ता है।
  • ध्रुव — प्रबंध का अनिवार्य और स्थिर रहने वाला तृतीय भाग।
  • आभोग — प्रबंध को पूर्ण करने वाला अंतिम चतुर्थ भाग (आज के आभोग/अंतरा के समान)।
राग-रागिनी पद्धति एवं समय सिद्धांत

मध्यकाल में रागों के वर्गीकरण के लिए राग-रागिनी पद्धति का प्रादुर्भाव हुआ। इसमें पुरुष और महिला के मूल चरित्रों के आधार पर रागों का विभाजन किया गया।

राग-रागिनी के चार मुख्य मत

इस पद्धति के अंतर्गत मुख्यतः चार मत प्रचलित हैं:

  1. सोमेश्वर मत
  2. कल्लिनाथ मत
  3. हनुमान मत
  4. भरत मत

प्रत्येक मत के अनुसार 6 मुख्य राग तथा उनकी 5-5 या 6-6 रागिनियाँ मानी गई हैं। इन राग-रागिनियों के ध्यान पर आधारित चित्रों को रागमाला चित्र कहा जाता है।

रागों का समय सिद्धांत (पं. भातखंडे के अनुसार)

विष्णु नारायण भातखंडे ने समय सिद्धांत के आधार पर रागों को तीन मुख्य वर्गों में विभाजित किया है:

वर्ग स्वरों की विशेषता गायन का समय उदाहरण राग
1. रे और ध कोमल वाले राग रे-ध कोमल, ग शुद्ध होना अनिवार्य (संधिप्रकाश राग) भोर (सुबह 4 से 7) और सायंकाल (शाम 4 से 7) भैरव, पूर्वी, मारवा
2. रे और ध शुद्ध वाले राग रे और ध शुद्ध स्वर वाले राग (संधिप्रकाश के बाद) प्रातःकाल एवं रात्रि के 7 से 10 बजे तक यमन, बिलावल, खमाज
3. ग और नि कोमल वाले राग गंधार और निषाद कोमल स्वर वाले राग दिन और रात के 10 बजे से 3-4 बजे तक आसावरी, जौनपुरी, मालकौंस, बागेश्री

मध्यम (म) स्वर की भूमिका: प्रातःकालीन संधिप्रकाश रागों में अधिकतर शुद्ध मध्यम तथा सायंकालीन संधिप्रकाश रागों में तीव्र मध्यम के प्रयोग की प्रधानता रहती है।

थाट-राग पद्धति एवं राग के नियम

उत्तर भारतीय संगीत में थाट-राग पद्धति को स्थापित करने का श्रेय पंडित विष्णु नारायण भातखंडे को जाता है। उन्होंने समस्त रागों को 10 थाटों के अंतर्गत वर्गीकृत किया।

रागों के 10 सैद्धांतिक नियम

  1. राग की उत्पत्ति थाट से होती है।
  2. राग में आरोह-अवरोह का होना आवश्यक है।
  3. राग में कम से कम पाँच स्वर होने चाहिए।
  4. षड्ज (सा) स्वर का राग में होना अनिवार्य है।
  5. म (मध्यम) एवं प (पंचम) में से कम से कम एक स्वर का होना अनिवार्य है।
  6. राग की विभिन्न जातियाँ हो सकती हैं— औडव (5 स्वर), षाडव (6 स्वर), संपूर्ण (7 स्वर)।
  7. राग मधुर और सुरीला होना चाहिए।
  8. राग में वादी-संवादी स्वर होना आवश्यक है।
  9. राग में पकड़ (विशिष्ट स्वर समूह) होना आवश्यक है।
  10. राग में पूर्वांग (सा रे ग म) या उत्तरांग (प ध नि सं) की प्रधानता होती है।

10 थाट और उनके स्वर स्वरूप

क्र. सं. थाट का नाम थाट के स्वर का स्वरूप
1 बिलावल सभी शुद्ध स्वर (स रे ग म प ध नि)
2 कल्याण तीव्र मध्यम (मँ) शेष शुद्ध स्वर
3 खमाज कोमल निषाद (नि) शेष शुद्ध स्वर
4 काफ़ी कोमल ग, नि शेष शुद्ध स्वर
5 आसावरी कोमल ग, ध, नि शेष शुद्ध स्वर
6 भैरव कोमल रे, ध शेष शुद्ध स्वर
7 भैरवी कोमल रे, ग, ध, नि शेष शुद्ध स्वर
8 पूर्वी कोमल रे, ध और तीव्र मँ शेष शुद्ध स्वर
9 मारवा कोमल रे और तीव्र मँ शेष शुद्ध स्वर
10 तोड़ी कोमल रे, ग, ध और तीव्र मँ

थाट के नियम

  • थाट में सातों स्वरों का क्रमानुसार (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) होना अनिवार्य है।
  • थाट में आरोह-अवरोह दोनों का होना आवश्यक नहीं है, केवल आरोह ही पर्याप्त है।
  • थाट में रंजकता का होना आवश्यक नहीं है।
  • थाट गाया-बजाया नहीं जाता, यह केवल रागों का जनक (उत्पत्ति स्थान) है।
भारतीय संगीत में प्रथम एवं ऐतिहासिक व्यक्तित्व

भारतीय संगीत के आधुनिक प्रचार-प्रसार में महान संगीतज्ञों का अमूल्य योगदान रहा है।