संगीत के क्रियात्मक पक्ष को स्वर और ताल सहित लिखने की विधि को स्वरलिपि कहा जाता है। इसका मूल उद्देश्य संगीत के क्रियात्मक पक्ष का प्रलेखन एवं संरक्षण करना है।
उत्तर भारत में वर्तमान समय में पं. भातखण्डे द्वारा निर्मित स्वरलिपि पद्धति सर्वाधिक प्रचलित है। इसके प्रमुख नियम और चिह्न निम्नलिखित हैं:
पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा निर्मित स्वरलिपि पद्धति अधिक सूक्ष्म और विस्तृत है। इसके प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं:
| विशेषता / चिह्न | भातखण्डे पद्धति | विष्णु दिगम्बर पद्धति |
|---|---|---|
| कोमल स्वर | स्वर के नीचे आड़ी रेखा (जैसे— ध॒) | स्वर के नीचे हलन्त (जैसे— ध्) |
| तीव्र स्वर | स्वर के ऊपर खड़ी रेखा (जैसे— म॑) | स्वर के नीचे उल्टा हलन्त (जैसे— मृ) |
| मंद्र सप्तक | स्वर के नीचे बिंदु (जैसे— प़) | स्वर के ऊपर बिंदु (जैसे— पं) |
| तार सप्तक | स्वर के ऊपर बिंदु (जैसे— सं) | स्वर के ऊपर खड़ी लकीर (जैसे— स॑) |
| सम | × (गुणा चिह्न) | 1 (अंक) |
| खाली | ० (शून्य) | + (धन चिह्न) |
| उच्चारण बढ़ाना | प - - या रा ऽ म | प ऽ ऽ या रा • • • म |
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | क | त्ता | धागे | तिरकिट | धी | ना |
| चिह्न | × | ० | 2 | ० | 3 | 4 |
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | क | त्ता | धागे | तिरकिट | धी | ना |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चिह्न | 9 | + | 5 | + | 9 | 11 |