Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 7: स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ

प्रस्तावना एवं स्वरलिपि का महत्व

संगीत के क्रियात्मक पक्ष को स्वर और ताल सहित लिखने की विधि को स्वरलिपि कहा जाता है। इसका मूल उद्देश्य संगीत के क्रियात्मक पक्ष का प्रलेखन एवं संरक्षण करना है।

भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति

उत्तर भारत में वर्तमान समय में पं. भातखण्डे द्वारा निर्मित स्वरलिपि पद्धति सर्वाधिक प्रचलित है। इसके प्रमुख नियम और चिह्न निम्नलिखित हैं:

स्वर चिह्न (Note Symbols)

  • शुद्ध स्वर: शुद्ध स्वरों को दर्शाने के लिए किसी भी चिह्न का प्रयोग नहीं किया जाता है (जैसे— स रे ग म प ध नि)।
  • कोमल स्वर: कोमल स्वरों को दर्शाने के लिए स्वरों के नीचे एक आड़ी रेखा (underline) खींची जाती है (जैसे— रे॒ ग॒ ध॒ नि॒)।
  • तीव्र स्वर: तीव्र मध्यम को दर्शाने के लिए स्वर के ऊपर एक खड़ी रेखा खींची जाती है (जैसे— म॑)।

सप्तक चिह्न (Octave Symbols)

  • मंद्र सप्तक: स्वरों के नीचे बिंदु लगाकर दर्शाया जाता है (जैसे— स़ नि़ ध़ प़)।
  • मध्य सप्तक: इसके लिए किसी भी चिह्न का प्रयोग नहीं होता (जैसे— स रे ग म)।
  • तार सप्तक: स्वरों के ऊपर बिंदु लगाकर दर्शाया जाता है (जैसे— सं रें गं)।

स्वर अलंकरण (Note Ornaments)

  • मींड: जिन स्वरों के ऊपर अर्धचंद्राकार रेखा होती है, उन्हें मींड में गाया जाता है (जैसे— ग͡ स)।
  • कण स्वर: मूल स्वर के ऊपर बाईं या दाईं ओर छोटा स्वर लिखा जाता है (जैसे— निस)।
  • खटका: कोष्ठक में दिए गए स्वर को खटके से गाते हैं, जिसमें आगे व पीछे के स्वर शामिल होते हैं (जैसे— (स) का अर्थ हुआ रेसानि़सा या नि़ स रे स)।
  • उच्चारण काल बढ़ाना: स्वरों का उच्चारण काल बढ़ाने के लिए आड़ी रेखाओं का प्रयोग होता है (जैसे— स – –)। शब्दों का उच्चारण बढ़ाने के लिए अवग्रह (ऽ) का प्रयोग होता है (जैसे— रा ऽ म)।

स्वर मान (Note Duration)

  • एक मात्रा: सामान्य रूप से लिखे स्वर एक मात्रा के होते हैं (जैसे— ग रे स रे)।
  • अर्ध मात्रा (आधी मात्रा): दो स्वरों के नीचे अर्धचंद्र लगाकर दर्शाया जाता है (जैसे— ग़रे़)।
  • चौथाई मात्रा (1/4 मात्रा): चार स्वरों को एक साथ अर्धचंद्र के भीतर लिखा जाता है (जैसे— ग़रे़स़रे़)।

ताल चिह्न (Tala Symbols)

  • सम (×): ताल की पहली मात्रा (सम) को दर्शाने के लिए गुणा (×) का चिह्न लगाया जाता है।
  • खाली (0): खाली के स्थान को दर्शाने के लिए शून्य (0) का प्रयोग होता है।
  • ताली (संख्या): अन्य तालियों के स्थान पर उनकी संख्या (2, 3, 4 आदि) लिखी जाती है।
विष्णु दिगम्बर पलुस्कर स्वरलिपि पद्धति

पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा निर्मित स्वरलिपि पद्धति अधिक सूक्ष्म और विस्तृत है। इसके प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं:

स्वर एवं सप्तक चिह्न

  • शुद्ध स्वर: शुद्ध स्वरों के लिए कोई चिह्न नहीं होता (जैसे— स रे ग म)।
  • कोमल स्वर: स्वरों के नीचे हलन्त लगाकर दर्शाया जाता है (जैसे— ग् म् ध्)।
  • तीव्र स्वर: तीव्र मध्यम को उल्टे हलन्त चिह्न से लिखते हैं (जैसे— मृ)।
  • मंद्र सप्तक: स्वरों के ऊपर बिंदु लगाकर दर्शाया जाता है (जैसे— नीं धं पं)।
  • तार सप्तक: स्वरों के ऊपर खड़ी लकीर लगाकर दर्शाया जाता है (जैसे— स॑ ग॑ रे॑)।

स्वर मान एवं मात्रा चिह्न

  • एक मात्रा (लघु): स्वर के नीचे आड़ी रेखा लगाई जाती है (जैसे— स॒ रे॒)।
  • आधी मात्रा (द्रुत): स्वर के नीचे छोटा शून्य/वृत्त लगाया जाता है (जैसे— स̥ रे̥)।
  • 1/4 मात्रा (अणुद्रुत): स्वर के नीचे अर्धचंद्र लगाया जाता है।
  • 1/8 मात्रा (अणु-अणुद्रुत): स्वर के नीचे दोहरा अर्धचंद्र लगाया जाता है।
  • दो मात्रा: इसके लिए अवग्रह चिह्न ऽ का प्रयोग होता है।

ताल एवं विभाग चिह्न

  • सम: सम के लिए 1 अंक लिखा जाता है।
  • खाली: खाली के लिए धन (+) चिह्न का प्रयोग होता है।
  • विभाग: इस पद्धति में ताल को विभागों में न बांटकर प्रत्येक आवर्तन के बाद एक विराम (।), स्थायी के अंत में दो विराम (।।) और पूरे गीत के अंत में तीन विराम (।।।) लगाए जाते हैं।
स्वर-ताल लिपि तुलनात्मक तालिका
विशेषता / चिह्न भातखण्डे पद्धति विष्णु दिगम्बर पद्धति
कोमल स्वर स्वर के नीचे आड़ी रेखा (जैसे— ध॒) स्वर के नीचे हलन्त (जैसे— ध्)
तीव्र स्वर स्वर के ऊपर खड़ी रेखा (जैसे— म॑) स्वर के नीचे उल्टा हलन्त (जैसे— मृ)
मंद्र सप्तक स्वर के नीचे बिंदु (जैसे— प़) स्वर के ऊपर बिंदु (जैसे— पं)
तार सप्तक स्वर के ऊपर बिंदु (जैसे— सं) स्वर के ऊपर खड़ी लकीर (जैसे— स॑)
सम × (गुणा चिह्न) 1 (अंक)
खाली ० (शून्य) + (धन चिह्न)
उच्चारण बढ़ाना प - - या रा ऽ म प ऽ ऽ या रा • • • म
ताल लिपि उदाहरण: एकताल (Ektaal)

भातखण्डे ताल-लिपि पद्धति में एकताल

मात्रा 123456789101112
बोल धिंधिंधागेतिरकिटतूनाकत्ताधागेतिरकिटधीना
चिह्न ×०2०34

विष्णु दिगम्बर ताल-लिपि पद्धति में एकताल

बोल धिंधिंधागेतिरकिटतूनाकत्ताधागेतिरकिटधीना
चिह्न 9+5+911
महान संगीतज्ञों का जीवन परिचय

पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे (1860 – 1936)

  • जन्म: 10 अगस्त 1860 को वालकेश्वर, मुंबई में हुआ।
  • शिक्षा: गायन, बाँसरी और सितार वादन सीखा। बी.ए. तथा एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण कर कराची में वकालत प्रारंभ की।
  • योगदान: संपूर्ण भारत का भ्रमण कर प्राचीन संगीत ग्रंथों की खोज की और संगीतज्ञों से मिलकर रागों का संकलन किया। उन्होंने अत्यंत सरल और सुबोध भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति का निर्माण किया।
  • राग वर्गीकरण: उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से समस्त रागों को 10 थाटों में विभाजित किया (बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, भैरवी, काफ़ी, आसावरी, तोड़ी, पूर्वी और मारवा)।
  • ग्रंथ रचना: 'हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति', 'भातखण्डे संगीत शास्त्र' (4 भाग), 'अभिनव राग मंजरी', 'श्रीमल्लक्ष्य संगीतम्' तथा 'स्वरमालिका'।
  • संस्थानों की स्थापना: बड़ौदा, ग्वालियर (माधव संगीत विद्यालय, 1918) तथा लखनऊ (मैरिस कॉलेज ऑफ़ हिन्दुस्तानी म्यूज़िक, 1926 - वर्तमान में भातखण्डे संगीत संस्थान समविश्वविद्यालय) में संगीत विद्यालयों की स्थापना कराई।
  • मृत्यु: सन् 1936 में मुंबई में उनका देहावसान हुआ।

पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर (1872 – 1931)

  • जन्म: 15 अगस्त 1872 को बेलगाँव (करून्दवाड़) में हुआ।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: पिता दिगम्बर गोपाल एक अच्छे कीर्तनकार थे।
  • दुर्घटना एवं संगीत शिक्षा: बचपन में दीपावली पर आतिशबाजी की दुर्घटना में आँखों की ज्योति खो दी। इसके बाद मिरज के प्रसिद्ध गायक पं. बालकृष्ण बुआ इचलकरंजीकर से संगीत की शिक्षा प्राप्त की।
  • मिशन: शास्त्रीय संगीत को जन-जन तक पहुँचाना और संगीतकारों को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाना। उन्होंने गीतों के शब्दों को बदलकर भक्ति रस के शब्दों में ढाला।
  • गांधर्व महाविद्यालय: 5 मई 1901 को लाहौर में प्रथम गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना की। इसके बाद 1908 में मुंबई में इसकी शाखा स्थापित की।
  • ग्रंथ एवं पत्रिका: लगभग 50 पुस्तकें लिखीं (जैसे— संगीत बाल प्रकाश, बालबोध, राग प्रवेश, भजनामृत लहरी आदि) तथा 'संगीतामृत प्रवाह' नामक पत्रिका निकाली।
  • प्रमुख शिष्य: पं. विनायक राव पटवर्धन, स्व. वी. ए. कशालकर, स्व. पं. ओंकारनाथ ठाकुर, बी. आर. देवधर, पं. शंकर व्यास और पं. नारायण राव व्यास।
  • मृत्यु: 21 अगस्त 1931 को मिरज में उनका निधन हुआ।