भारतीय संगीत में प्राचीन काल से ही वाद्य यंत्रों की एक समृद्ध परंपरा रही है। वाद्य शब्द संस्कृत की ‘वद्’ धातु से बना है, जिसका सामान्य अर्थ होता है— बोलना। सांगीतिक ध्वनि तथा गति प्रकट करने के उपकरण को ‘वाद्य’ कहा जाता है।
भारतीय संगीत में वाद्यों के वर्गीकरण का मुख्य आधार ध्वनि उत्पत्ति की विधि रही है। सर्वप्रथम भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में वाद्यों का चतुर्विध (चार प्रकार का) वर्गीकरण किया है।
“ततं चैवावनद्धं च घनं सुषिरमेव च।
चतुर्विध तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम्।।”
— नाट्यशास्त्र 28/1भावार्थ / विश्लेषण: भरत मुनि के अनुसार वाद्य चार प्रकार के होते हैं— तत, अवनद्ध, घन एवं सुषिर।
“ततं तन्त्रीगतम् ज्ञेयमवनद्धं तु पौष्करम्।
घनं तालस्तु विज्ञेय: सुषिरो वंश उच्यते।।”
— नाट्यशास्त्र 28/2भावार्थ / विश्लेषण: तंत्री (तार) के कंपन से बजने वाले वाद्य 'तत', चमड़े से मढ़े वाद्य 'अवनद्ध', धातु से बने चोट वाले वाद्य 'घन' तथा फूँक से बजने वाले वाद्य 'सुषिर' कहलाते हैं।
| क्र. सं. | वाद्य श्रेणी | ध्वनि उत्पत्ति का आधार | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | तत (तंत्री) वाद्य | तार या तंत्री के कंपन द्वारा | तानपुरा, सितार, सरोद, वाॅयलिन, सारंगी, इसराज |
| 2 | अवनद्ध वाद्य | खोखले पात्र पर मढ़े चमड़े पर आघात द्वारा | tabla, पखावज, मृदंगम्, थविल, ढोलक, खोल |
| 3 | घन वाद्य | ठोस धातु या लकड़ी के आपस में टकराने से | करताल, खंजरी, घँघरू, घंटी, झाँझ, मंजीरा |
| 4 | सुषिर वाद्य | वायु के कंपन (फूँक मारने) द्वारा | बाँसुरी, शहनाई, शंख, हारमोनियम, क्लेरोनेट |
तत श्रेणी के अंतर्गत वे वाद्य आते हैं जिनमें तारों में कंपन उत्पन्न करके स्वर निकाले जाते हैं। इन्हें उँगलियों, मिज़राब (जवा) या गज (बो) की सहायता से बजाया जाता है।
तानपुरा एकतारा या दोतारा का विकसित रूप है। इसे तम्बोरा या तमुरा भी कहा जाता है। यह शास्त्रीय संगीत में आधार स्वर (drone) प्रदान करने का मुख्य वाद्य है।
सितार आज का सर्वाधिक लोकप्रिय तंत्री वाद्य है।
सरोद एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ 'गीत' या 'राग' है। यह अफगानिस्तान के रबाब का विकसित रूप माना जाता है।
वाॅयलिन पाश्चात्य मूल का वाद्य माना जाता है जो भारत में 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों के साथ आया, परंतु इसकी वादन शैली प्राचीन भारतीय वाद्य ‘रावणहत्था’ से अत्यधिक मिलती है।
इसराज सितार और सारंगी का संयुक्त रूप है। इसमें सितार की तरह परदे (सत्रह से उन्नीस) होते हैं और इसे सारंगी की तरह गज (बो) से बजाया जाता है। यह बंगाल के रवीन्द्र संगीत में अत्यंत लोकप्रिय है।
भारतीय संगीत में गिटार का प्रवेश लगभग वर्ष 1925 में हुआ। भारतीय संगीतकारों ने हवाइयन गिटार में तरब और चिकारी के तार जोड़कर इसे पूर्णतः भारतीय स्वरूप प्रदान किया है।
अवनद्ध वाद्य वे वाद्य यंत्र हैं जो अंदर से खोखले होते हैं और जिनके मुख पर चमड़ा मढ़ा होता है। इन्हें हाथ या डंडी की चोट से बजाया जाता है। इन्हें प्राचीन काल में ‘मृदंग’ या ‘पुष्कर’ कहा जाता था।
तबला उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का मुख्य अवनद्ध वाद्य है। इसके दो भाग होते हैं— दायाँ (तबला) और बायाँ (डग्गा)।
पखावज उत्तर भारत का एक प्राचीन दोमुखी वाद्य है, जिसका प्रयोग मुख्य रूप से ध्रुपद व धमार गायकी की संगति में होता है। इसके बाएँ मुख पर गीला आटा लगाया जाता है जिससे गंभीर ध्वनि उत्पन्न होती है।
मृदंगम् दक्षिण भारतीय संगीत का मुख्य अवनद्ध वाद्य है। यह कटहल की लकड़ी से बनता है। इसके बाएँ मुख पर सूजी की लुगदी (पेस्ट) लगाई जाती है और दाहिने मुख पर स्थायी रूप से ‘सोरू’ (स्याही) लगी होती है।
थविल दक्षिण भारत (विशेषकर केरल) का प्रमुख वाद्य है जो नागस्वरम् की संगति में बजाया जाता है।
बंगाल, ओडिशा और असम के कीर्तन संगीत में प्रयुक्त होने वाला मिट्टी का बना दोमुखी वाद्य।
ये मूलतः अफ्रीकी वाद्य हैं जिनका प्रयोग भारतीय सुगम एवं फिल्म संगीत में लय देने के लिए किया जाता है।
ये वाद्य धातु या लकड़ी के बने होते हैं और इन्हें आपस में टकराकर बजाया जाता है। इनका मुख्य कार्य संगीत में लय बनाए रखना है।
इन वाद्यों में वायु के कंपन द्वारा स्वर उत्पन्न किए जाते हैं।
तकनीकी विकास के साथ संगीत अभ्यास को सुगम बनाने के लिए कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ है।