Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 8: भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण

प्रस्तावना एवं संगीत में वाद्यों का महत्व

भारतीय संगीत में प्राचीन काल से ही वाद्य यंत्रों की एक समृद्ध परंपरा रही है। वाद्य शब्द संस्कृत की ‘वद्’ धातु से बना है, जिसका सामान्य अर्थ होता है— बोलना। सांगीतिक ध्वनि तथा गति प्रकट करने के उपकरण को ‘वाद्य’ कहा जाता है।

वाद्यों का ऐतिहासिक एवं सामाजिक महत्व

  • ऐतिहासिक संदर्भ: सर्वप्रथम वैदिक काल में सांगीतिक वाद्यों का वर्णन मिलता है। रामायण काल में वीणा और मृदंग द्वारा नृत्य की संगति का उल्लेख है, तथा महाभारत काल में महती वीणा, वेणु, दुंदुभि, पुष्कर आदि वाद्यों का वर्णन मिलता है।
  • धार्मिक एवं आध्यात्मिक संबंध: हिंदू देव-देवताओं का वाद्यों से गहरा संबंध है; जैसे श्रीकृष्ण की बाँसुरी, माँ सरस्वती की वीणा, शिव का डमरू तथा गणेश का मृदंग।
  • मानव शरीर: मानव शरीर को भी एक प्राकृतिक वाद्य यंत्र माना गया है और इसे शास्त्रों में ‘गात्र वीणा’ कहा गया है।
  • विविध उपयोग: प्राचीन काल में वाद्यों का प्रयोग संदेश भेजने, जंगली जानवरों को भगाने, युद्ध भूमि में सैनिकों का उत्साह बढ़ाने (दुंदुभि, शंख, ढोल, ताशा द्वारा) तथा मांगलिक कार्यों में किया जाता था।
वाद्य वर्गीकरण (Classification of Instruments)

भारतीय संगीत में वाद्यों के वर्गीकरण का मुख्य आधार ध्वनि उत्पत्ति की विधि रही है। सर्वप्रथम भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में वाद्यों का चतुर्विध (चार प्रकार का) वर्गीकरण किया है।

“ततं चैवावनद्धं च घनं सुषिरमेव च।
चतुर्विध तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम्।।”
— नाट्यशास्त्र 28/1


भावार्थ / विश्लेषण: भरत मुनि के अनुसार वाद्य चार प्रकार के होते हैं— तत, अवनद्ध, घन एवं सुषिर।

“ततं तन्त्रीगतम् ज्ञेयमवनद्धं तु पौष्करम्।
घनं तालस्तु विज्ञेय: सुषिरो वंश उच्यते।।”
— नाट्यशास्त्र 28/2


भावार्थ / विश्लेषण: तंत्री (तार) के कंपन से बजने वाले वाद्य 'तत', चमड़े से मढ़े वाद्य 'अवनद्ध', धातु से बने चोट वाले वाद्य 'घन' तथा फूँक से बजने वाले वाद्य 'सुषिर' कहलाते हैं।

चार प्रमुख वाद्य श्रेणियाँ

क्र. सं.वाद्य श्रेणीध्वनि उत्पत्ति का आधारप्रमुख उदाहरण
1तत (तंत्री) वाद्यतार या तंत्री के कंपन द्वारातानपुरा, सितार, सरोद, वाॅयलिन, सारंगी, इसराज
2अवनद्ध वाद्यखोखले पात्र पर मढ़े चमड़े पर आघात द्वाराtabla, पखावज, मृदंगम्, थविल, ढोलक, खोल
3घन वाद्यठोस धातु या लकड़ी के आपस में टकराने सेकरताल, खंजरी, घँघरू, घंटी, झाँझ, मंजीरा
4सुषिर वाद्यवायु के कंपन (फूँक मारने) द्वाराबाँसुरी, शहनाई, शंख, हारमोनियम, क्लेरोनेट
तत (तंत्री) वाद्य एवं उनके प्रकार

तत श्रेणी के अंतर्गत वे वाद्य आते हैं जिनमें तारों में कंपन उत्पन्न करके स्वर निकाले जाते हैं। इन्हें उँगलियों, मिज़राब (जवा) या गज (बो) की सहायता से बजाया जाता है।

1. तानपुरा (Tanpura)

तानपुरा एकतारा या दोतारा का विकसित रूप है। इसे तम्बोरा या तमुरा भी कहा जाता है। यह शास्त्रीय संगीत में आधार स्वर (drone) प्रदान करने का मुख्य वाद्य है।

  • मुख्य भाग:
    • तुम्बा: सूखे कद्दू का आधा हिस्सा जो प्रतिध्वनि (गूँज) पैदा करता है।
    • तबली: तुम्बे के ऊपर लगी लकड़ी की प्लेट।
    • गुल: वह स्थान जहाँ तुम्बा और डाँड़ आपस में मिलते हैं।
    • डाँड़: तानपुरे की लंबी खोखली लकड़ी की नली।
    • खूँटियाँ: डाँड़ के ऊपरी हिस्से में लगी चाबियाँ जिनसे तार कसे जाते हैं।
    • अटी और तारगहन: खूँटियों से पहले तार जिन पट्टियों से गुजरते हैं।
    • ब्रिज (घड़ुच/घोड़ी): तबली के ऊपर स्थित लकड़ी या हड्डी की चौकी जिस पर तार टिके होते हैं।
    • मनका: ब्रिज और लँगोट के बीच पिरोए गए मोती, जिनसे सूक्ष्म स्वर मिलाया जाता है।
    • सूत (धागा): ब्रिज और तार के बीच दबाया जाने वाला धागा जो गूँज (जवारी) उत्पन्न करता है।
  • तारों की संख्या एवं मिलाना: तानपुरे में कुल 4 तार होते हैं (तीन स्टील के और चौथा ताँबे का)।
    • प्रथम तार: मंद्र पंचम (प) में। पंचम वर्जित रागों में इसे मंद्र मध्यम (म) या मंद्र निषाद (नी) में मिलाते हैं।
    • द्वितीय व तृतीय तार (जोड़ी के तार): मध्य षड्ज (स) में।
    • चतुर्थ तार: मंद्र षड्ज (स) में।
  • निर्माण सामग्री: उत्तर भारत में तानपुरा प्रायः टुन या टीक की लकड़ी से और दक्षिण भारत में कटहल (जैकफ्रूट) की लकड़ी से बनता है।

2. सितार (Sitar)

सितार आज का सर्वाधिक लोकप्रिय तंत्री वाद्य है।

  • संरचना: इसमें तुम्बा, तबली, डाँड़, घड़ुच, मनका और खूँटियाँ होती हैं। डाँड़ पर पीतल या लोहे की सलाइयाँ ताँत से बँधी होती हैं जिन्हें परदा या सुंदरी कहते हैं (इनकी संख्या 17 से 24 तक होती है)।
  • तार: सितार में मुख्य रूप से 7 तार होते हैं। इसके अतिरिक्त गूँज के लिए नीचे तरब के तार होते हैं।
  • वादन विधि: दाहिने हाथ की तर्जनी उँगली में लोहे का मिज़राब पहनकर तारों पर आघात किया जाता है।

3. सरोद (Sarod)

सरोद एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ 'गीत' या 'राग' है। यह अफगानिस्तान के रबाब का विकसित रूप माना जाता है।

  • विशेषता: यह बिना परदे का वाद्य है। इसकी डाँड़ पर स्टील की प्लेट मढ़ी होती है जिस पर बाएँ हाथ की उँगलियों से तार दबाकर गज या जवा की सहायता से बजाया जाता है।
  • संरचना: इसमें तीन खंड होते हैं। तीसरा खंड खोखला होता है जिसे तुम्बी कहते हैं, जो बकरे के चमड़े से ढका होता है।
  • तार: इसमें 8 मुख्य तार और 11 से 15 तरब के तार होते हैं। इसे नारियल के कड़े खोल से बने त्रिकोणीय ‘जवा’ से बजाया जाता है।
  • प्रसिद्ध वादक: उस्ताद अलाउद्दीन खाँ, हाफिज अली खाँ, उस्ताद अली अकबर खाँ, शरण रानी, उस्ताद अमजद अली खाँ।

4. वाॅयलिन (Violin)

वाॅयलिन पाश्चात्य मूल का वाद्य माना जाता है जो भारत में 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों के साथ आया, परंतु इसकी वादन शैली प्राचीन भारतीय वाद्य ‘रावणहत्था’ से अत्यधिक मिलती है।

  • वादन शैली: इसे कंधे पर रखकर गज (बो) की सहायता से बजाया जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत में यह मुख्य संगत वाद्य है।
  • प्रसिद्ध वादक: पंडित वी.जी. जोग, एन. राजम, डॉ. एल. सुब्रमण्यम, एम.एस. गोपालकृष्णन।

5. इसराज (Esraj)

इसराज सितार और सारंगी का संयुक्त रूप है। इसमें सितार की तरह परदे (सत्रह से उन्नीस) होते हैं और इसे सारंगी की तरह गज (बो) से बजाया जाता है। यह बंगाल के रवीन्द्र संगीत में अत्यंत लोकप्रिय है।

6. गिटार (Guitar)

भारतीय संगीत में गिटार का प्रवेश लगभग वर्ष 1925 में हुआ। भारतीय संगीतकारों ने हवाइयन गिटार में तरब और चिकारी के तार जोड़कर इसे पूर्णतः भारतीय स्वरूप प्रदान किया है।

  • प्रसिद्ध प्रयोगकर्ता: पंडित विश्व मोहन भट्ट (जिन्होंने इसे ‘मोहन वीणा’ नाम दिया), ब्रज भूषण काबरा, सलिल भट्ट (सात्विक वीणा)।
अवनद्ध वाद्य एवं उनके प्रकार

अवनद्ध वाद्य वे वाद्य यंत्र हैं जो अंदर से खोखले होते हैं और जिनके मुख पर चमड़ा मढ़ा होता है। इन्हें हाथ या डंडी की चोट से बजाया जाता है। इन्हें प्राचीन काल में ‘मृदंग’ या ‘पुष्कर’ कहा जाता था।

1. तबला (Tabla)

तबला उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का मुख्य अवनद्ध वाद्य है। इसके दो भाग होते हैं— दायाँ (तबला) और बायाँ (डग्गा)।

  • तबले के मुख्य अंग:
    • पुड़ी: बकरे की खाल से मढ़ा हुआ ऊपरी हिस्सा।
    • चाँटी (किनार): पुड़ी के किनारे की चमड़े की पट्टी।
    • लव (मैदान): चाँटी और स्याही के बीच का खाली स्थान।
    • स्याही: पुड़ी के केंद्र में स्थित काले रंग का गोलाकार लेप (लोहे के चूर्ण और लेई का मिश्रण)।
    • गजरा: पुड़ी को कसने वाली चमड़े की गूँथी हुई माला जिसमें 16 छिद्र (घर) होते हैं।
    • गट्टा: बद्धी के नीचे फँसाए गए लकड़ी के बेलनाकार टुकड़े, जिनसे स्वर मिलाया जाता है।
    • बद्धी: गजरे से होकर नीचे इँडरी तक जाने वाली चमड़े की पट्टी जो पुड़ी को कसती है।
    • इँडरी (गुड़री): तबले के नीचे रखी जाने वाली कपड़े या रस्सी की गोल गद्दी।

2. पखावज (Pakhawaj)

पखावज उत्तर भारत का एक प्राचीन दोमुखी वाद्य है, जिसका प्रयोग मुख्य रूप से ध्रुपद व धमार गायकी की संगति में होता है। इसके बाएँ मुख पर गीला आटा लगाया जाता है जिससे गंभीर ध्वनि उत्पन्न होती है।

3. मृदंगम् (Mridangam)

मृदंगम् दक्षिण भारतीय संगीत का मुख्य अवनद्ध वाद्य है। यह कटहल की लकड़ी से बनता है। इसके बाएँ मुख पर सूजी की लुगदी (पेस्ट) लगाई जाती है और दाहिने मुख पर स्थायी रूप से ‘सोरू’ (स्याही) लगी होती है।

4. थविल (Thavil)

थविल दक्षिण भारत (विशेषकर केरल) का प्रमुख वाद्य है जो नागस्वरम् की संगति में बजाया जाता है।

5. खोल (Khol)

बंगाल, ओडिशा और असम के कीर्तन संगीत में प्रयुक्त होने वाला मिट्टी का बना दोमुखी वाद्य।

6. बौंगो (Bongo) एवं कौंगो (Conga)

ये मूलतः अफ्रीकी वाद्य हैं जिनका प्रयोग भारतीय सुगम एवं फिल्म संगीत में लय देने के लिए किया जाता है।

घन एवं सुषिर वाद्य

घन वाद्य (Solid Instruments)

ये वाद्य धातु या लकड़ी के बने होते हैं और इन्हें आपस में टकराकर बजाया जाता है। इनका मुख्य कार्य संगीत में लय बनाए रखना है।

  • प्रमुख घन वाद्य: करताल, खंजरी, मंजीरा, झाँझ, घँघरू, घंटी।

सुषिर वाद्य (Wind Instruments)

इन वाद्यों में वायु के कंपन द्वारा स्वर उत्पन्न किए जाते हैं।

  • बाँसुरी (Flute): यह बाँस से बनी होती है जिसमें 6 या 7 छिद्र होते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे वंशी, मुरली, वेणु, पावा, अलगूजा आदि नामों से जाना जाता है। प्रसिद्ध वादक: पन्नालाल घोष, हरिप्रसाद चौरसिया।
  • हारमोनियम (Harmonium): यह एक स्वतंत्र रीड वाद्य है। इसके मुख्य चार भाग होते हैं— धौंकनी, वायु कक्ष, कुंजियाँ और रीड।
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वाद्य एवं ऐप्स

तकनीकी विकास के साथ संगीत अभ्यास को सुगम बनाने के लिए कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ है।