Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 9: विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी

ताल लिपि पद्धति का इतिहास एवं विकास

मानव सभ्यता के विकास के साथ संगीत को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता महसूस हुई ताकि संगीत रचनाओं को सुरक्षा कवच प्रदान किया जा सके और बंदिशों के मूल स्वरूप की रक्षा हो सके। आधुनिक काल (18वीं-19वीं शताब्दी) में विभिन्न विद्वानों ने संगीत को लिपिबद्ध करने के लिए अपनी-अपनी पद्धतियाँ अपनाईं।

प्रमुख संगीतज्ञ एवं लिपि पद्धतियाँ

  • मौलाबख्श, सौरेन्द्र मोहन टैगोर, क्षेत्र मोहन गोस्वामी ने प्रारंभिक प्रयास किए।
  • पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे ने आधुनिक संगीत शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए स्वर-ताल लिपि पद्धतियों का निर्माण किया।
  • भातखण्डे स्वर-ताल लिपि पद्धति अपनी सरलता और सहजता के कारण वर्तमान में सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रचलित है।

भातखण्डे ताल लिपि पद्धति की मुख्य विशेषताएँ

  • सम (×): ताल की प्रथम मात्रा को दर्शाने के लिए '×' चिह्न का प्रयोग किया जाता है। उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में प्रथम मात्रा हमेशा सम होती है।
  • खाली (0): खाली के विभाग को दर्शाने के लिए '0' का प्रयोग किया जाता है। रूपक ताल में पहली मात्रा पर ही खाली होती है।
  • ताली (संख्या): ताली दर्शाने के लिए ताली की संख्या (जैसे 2, 3, 4) लिखी जाती है।
  • विभाग (।): ताल के विभागों को अलग करने के लिए खड़ी पाई '।' का प्रयोग किया जाता है।
  • विश्रांति या ठहराव (ऽ): किसी बोल को आगे बढ़ाने या ठहराव दर्शाने के लिए अवग्रह 'ऽ' का प्रयोग किया जाता है।
  • अर्धचन्द्र (⌒): एक मात्रा काल में एक से अधिक स्वर या बोल होने पर उनके नीचे अर्धचन्द्र '⌒' लगाया जाता है।
ताल एवं ठेका की परिभाषा तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

संगीत में समय नापने के साधन को ताल कहते हैं। यह मात्राओं, विभागों, ताली और खाली के योग से बनता है। किसी ताल का वह मूल बोल जिसके द्वारा उस ताल की पहचान होती है, उसे ठेका कहते हैं।

प्राचीन एवं मध्यकालीन समय का संक्षिप्त विवरण

प्राचीन काल में भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र में संगीत और ताल की महत्वपूर्ण चर्चा मिलती है। नाट्यशास्त्र के पश्चात् मतंग मुनि के बृहद्देशी और शार्ङ्गदेव के संगीत रत्नाकर का योगदान उल्लेखनीय है। प्राचीन काल में तालों की चर्चा करते समय लघु, गुरु और प्लुत का प्रयोग किया जाता था।

वैदिक काललघुगुरुप्लुतः
मात्रा काल1 मात्रा2 मात्रा3 मात्रा

आधुनिक काल में संगीत का प्रचार-प्रसार

  • पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे ने बड़ौदा, ग्वालियर, लखनऊ आदि स्थानों पर संगीत की विद्यालयी शिक्षा का सूत्रपात किया।
  • पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने लाहौर में वर्ष 1901 में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना की।
  • भातखण्डे जी द्वारा रचित ग्रंथ क्रमिक पुस्तक मालिका और हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति संगीत शिक्षण में अत्यंत सहायक सिद्ध हुए।
प्रमुख उत्तर भारतीय तालों का विस्तृत विवरण

उत्तर भारतीय संगीत में तबले और पखावज पर बजाई जाने वाली प्रमुख तालों के ठेके, दुगुन, तिगुन और चौगुन का विवरण निम्नलिखित है:

1. त्रिताल (तीनताल)

यह तबले की सर्वाधिक लोकप्रिय ताल है। इसमें 16 मात्राएँ होती हैं जो 4/4/4/4 के चार विभागों में विभाजित होती हैं। इसमें पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर ताली तथा नौवीं मात्रा पर खाली होती है। यह चतस्र जाति की ताल है।

मात्रा12345678910111213141516
बोलधाधिंधिंधाधाधिंधिंधाधातिंतिंताताधिंधिंधा
चिह्न×203

2. एकताल

यह चतस्र जाति की समपदी ताल है जिसमें 12 मात्राएँ और 6 विभाग (2/2/2/2/2/2) होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11) और दो खाली (3, 7) होती हैं। इसका प्रयोग ख्याल और गत की संगति में होता है।

मात्रा123456789101112
बोलधिंधिंधागेतिरकिटतूनाकत्ताधागेतिरकिटधिनना
चिह्न×02034

3. दादरा ताल

यह सुगम और फिल्मी संगीत में अत्यंत लोकप्रिय ताल है। इसमें 6 मात्राएँ और 2 विभाग (3/3) होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और चौथी मात्रा पर खाली होती है। इसकी जाति तिस्र है।

मात्रा123456
बोलधाधीनाधातीना
चिह्न×0

4. कहरवा ताल

यह लोक संगीत, सुगम संगीत और फिल्मों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली ताल है। इसमें 8 मात्राएँ और 2 विभाग (4/4) होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और पाँचवीं मात्रा पर खाली होती है। यह चतस्र जाति की ताल है।

मात्रा12345678
बोलधागेनतिनकधिन
चिह्न×0

5. चारताल (चौताल)

यह पखावज की अत्यंत प्राचीन और लोकप्रिय ताल है जिसका प्रयोग ध्रुपद गायन के साथ किया जाता है। इसमें 12 मात्राएँ और 6 विभाग होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11) और दो खाली (3, 7) होती हैं।

मात्रा123456789101112
बोलधाधादिंताकिटधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×02034

6. सूलताल

यह पखावज की ताल है जिसका वादन मध्य और द्रुत लय में ध्रुपद अंग के गायन के साथ होता है। इसमें 10 मात्राएँ और 5 विभाग होते हैं। तीन ताली (1, 5, 7) और दो खाली (3, 9) होती हैं।

मात्रा12345678910
बोलधाधादिंताकिटधातिटकतगदिगन
चिह्न×0230

7. तीव्रा या तेवरा

यह पखावज की प्राचीन ताल है जो तीव्र गति में बजने के कारण तीव्रा कहलाती है। इसमें 7 मात्राएँ और 3 विभाग (3/2/2) होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 4, 6) होती हैं और खाली नहीं होती। यह मिश्र जाति की ताल है।

मात्रा1234567
बोलधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×23

8. धमार ताल

यह पखावज की अत्यंत लोकप्रिय ताल है जिसका प्रयोग होरी गायन की संगति में किया जाता है। इसमें 14 मात्राएँ और 4 विभाग (5/2/3/4) होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 6, 11) और एक खाली (8) होती है।

मात्रा1234567891011121314
बोलकधिटधिटधाऽगतिटतिटताऽ
चिह्न×203
भारतीय संगीत में प्रथम

भारतीय संगीत के इतिहास में रिकॉर्डिंग तकनीक के आगमन का विशेष महत्व है:

अभ्यास एवं मूल्यांकन

बहुविकल्पीय प्रश्न

  1. तीनताल में पाँचवीं मात्रा पर कौन-सा बोल है?
    उत्तर: (ग) धा
  2. एकताल में कितने विभाग होते हैं?
    उत्तर: (ख) 6
  3. सूलताल कितनी मात्राओं का ताल है?
    उत्तर: (ग) दस मात्रा
  4. दादरा में कितनी मात्राएँ हैं?
    उत्तर: (घ) 6
  5. कहरवा ताल में कितने ताल के चिह्न होते हैं?
    उत्तर: (घ) 2

विभाग मिलान (सुमेलन)

विभाग 'अ'विभाग 'आ'
(क) क्रमिक पुस्तक मालिका4. विष्णु नारायण भातखण्डे
(ख) गांधर्व महाविद्यालय2. 1901
(ग) धागे तिरकिट बोल5. एकताल
(घ) चारताल में तिटकत गदिगन3. 9, 10, 11, 12
(ङ) सूलताल की जाति6. चतस्र जाति
(च) कहरवा1. आठ मात्रा