मानव सभ्यता के विकास के साथ संगीत को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता महसूस हुई ताकि संगीत रचनाओं को सुरक्षा कवच प्रदान किया जा सके और बंदिशों के मूल स्वरूप की रक्षा हो सके। आधुनिक काल (18वीं-19वीं शताब्दी) में विभिन्न विद्वानों ने संगीत को लिपिबद्ध करने के लिए अपनी-अपनी पद्धतियाँ अपनाईं।
संगीत में समय नापने के साधन को ताल कहते हैं। यह मात्राओं, विभागों, ताली और खाली के योग से बनता है। किसी ताल का वह मूल बोल जिसके द्वारा उस ताल की पहचान होती है, उसे ठेका कहते हैं।
प्राचीन काल में भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र में संगीत और ताल की महत्वपूर्ण चर्चा मिलती है। नाट्यशास्त्र के पश्चात् मतंग मुनि के बृहद्देशी और शार्ङ्गदेव के संगीत रत्नाकर का योगदान उल्लेखनीय है। प्राचीन काल में तालों की चर्चा करते समय लघु, गुरु और प्लुत का प्रयोग किया जाता था।
| वैदिक काल | लघु | गुरु | प्लुतः |
|---|---|---|---|
| मात्रा काल | 1 मात्रा | 2 मात्रा | 3 मात्रा |
उत्तर भारतीय संगीत में तबले और पखावज पर बजाई जाने वाली प्रमुख तालों के ठेके, दुगुन, तिगुन और चौगुन का विवरण निम्नलिखित है:
यह तबले की सर्वाधिक लोकप्रिय ताल है। इसमें 16 मात्राएँ होती हैं जो 4/4/4/4 के चार विभागों में विभाजित होती हैं। इसमें पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर ताली तथा नौवीं मात्रा पर खाली होती है। यह चतस्र जाति की ताल है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | ता | धिं | धिं | धा |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
यह चतस्र जाति की समपदी ताल है जिसमें 12 मात्राएँ और 6 विभाग (2/2/2/2/2/2) होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11) और दो खाली (3, 7) होती हैं। इसका प्रयोग ख्याल और गत की संगति में होता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | क | त्ता | धागे | तिरकिट | धिन | ना |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
यह सुगम और फिल्मी संगीत में अत्यंत लोकप्रिय ताल है। इसमें 6 मात्राएँ और 2 विभाग (3/3) होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और चौथी मात्रा पर खाली होती है। इसकी जाति तिस्र है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 |
|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धी | ना | धा | ती | ना |
| चिह्न | × | 0 |
यह लोक संगीत, सुगम संगीत और फिल्मों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली ताल है। इसमें 8 मात्राएँ और 2 विभाग (4/4) होते हैं। पहली मात्रा पर ताली और पाँचवीं मात्रा पर खाली होती है। यह चतस्र जाति की ताल है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | गे | न | ति | न | क | धि | न |
| चिह्न | × | 0 |
यह पखावज की अत्यंत प्राचीन और लोकप्रिय ताल है जिसका प्रयोग ध्रुपद गायन के साथ किया जाता है। इसमें 12 मात्राएँ और 6 विभाग होते हैं। इसमें चार ताली (1, 5, 9, 11) और दो खाली (3, 7) होती हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 |
यह पखावज की ताल है जिसका वादन मध्य और द्रुत लय में ध्रुपद अंग के गायन के साथ होता है। इसमें 10 मात्राएँ और 5 विभाग होते हैं। तीन ताली (1, 5, 7) और दो खाली (3, 9) होती हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 3 | 0 |
यह पखावज की प्राचीन ताल है जो तीव्र गति में बजने के कारण तीव्रा कहलाती है। इसमें 7 मात्राएँ और 3 विभाग (3/2/2) होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 4, 6) होती हैं और खाली नहीं होती। यह मिश्र जाति की ताल है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 2 | 3 |
यह पखावज की अत्यंत लोकप्रिय ताल है जिसका प्रयोग होरी गायन की संगति में किया जाता है। इसमें 14 मात्राएँ और 4 विभाग (5/2/3/4) होते हैं। इसमें तीन ताली (1, 6, 11) और एक खाली (8) होती है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | क | धि | ट | धि | ट | धा | ऽ | ग | ति | ट | ति | ट | ता | ऽ |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
भारतीय संगीत के इतिहास में रिकॉर्डिंग तकनीक के आगमन का विशेष महत्व है:
| विभाग 'अ' | विभाग 'आ' |
|---|---|
| (क) क्रमिक पुस्तक मालिका | 4. विष्णु नारायण भातखण्डे |
| (ख) गांधर्व महाविद्यालय | 2. 1901 |
| (ग) धागे तिरकिट बोल | 5. एकताल |
| (घ) चारताल में तिटकत गदिगन | 3. 9, 10, 11, 12 |
| (ङ) सूलताल की जाति | 6. चतस्र जाति |
| (च) कहरवा | 1. आठ मात्रा |