Sangeet: Class 11 (Book 2) — Chapter 10: प्रमुख घराने

घराना पद्धति: अर्थ, इतिहास एवं विकास

भारतीय शास्त्रीय संगीत में घराना पद्धति शिक्षण और कला संरक्षण की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट परंपरा है।

प्रमुख गायन एवं वादन घराने

1. ग्वालियर घराना

  • जन्मदाता: हद्दू खाँ और हस्सू खाँ के दादा नत्थन पीर बख्‍श।
  • प्रमुख कलाकार: हद्दू खाँ, हस्‍सू खाँ, मेंहदी हुसैन खाँ, रहमत खाँ, निसार हुसैन खाँ, बालकृष्‍ण बुआ इचलकरंजीकर, पं. विष्‍णु दिगम्‍बर पलुस्‍कर, पं. ओंकार नाथ ठाकुर, पं. विनायक राव पटवर्धन, पं. नारायण राव व्‍यास, शंकार पंडित, राजा भैया पूँछवाले।
  • गायन शैली की विशेषताएँ:
    • ज़ोरदार तथा खुली आवाज़ का गायन।
    • बंदिश के शब्दों में स्पष्टता।
    • ध्रुपद अंग के ख्याल।
    • सीधी व सपाट तानें।
    • बोल तानों में लयकारी और गमकों का प्रचुर प्रयोग।
  • ताल प्रयोग: विलंबित ख्याल प्रायः तिलवाड़ा और एकताल में तथा मध्य लय के ख्याल तीनताल में गाए जाते हैं।

2. आगरा घराना

  • प्रवर्तक: हाजी सुजान खाँ।
  • प्रचारक: घग्‍घे खुदाबख्‍श (इन्होंने ग्वालियर के नत्थन पीर बख्श से शिक्षा पाई, जिससे आगरा घराने में ग्वालियर की झलक मिलती है)।
  • प्रमुख कलाकार: उस्‍ताद फ़ैयाज़ खाँ (घराने को अत्यधिक प्रसिद्धि दिलाई), विलायत हुसैन खाँ, नत्थन खाँ, गुलाम अब्बास खाँ, भास्कर राव, श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, दिलीप चन्द्र बेदी, यूनुस हुसैन खाँ।
  • गायन शैली की विशेषताएँ:
    • नोमतोम का आलाप।
    • बंदिश का लयकारी युक्त गायन।
    • खुली तथा ज़ोरदार आवाज़।
    • ख्याल के साथ-साथ ध्रुपद-धमार गायन में विशेष प्रवीणता।
    • बोल तानों में असाधारण कुशलता।

3. किराना घराना

  • प्रवर्तक: बंदे अली खाँ।
  • प्रतिष्ठापक: अब्‍दुल करीम खाँ और अब्‍दुल वहीद खाँ।
  • प्रमुख कलाकार: सवाई गंधर्व, सुरेश बाबू माने, उस्‍ताद अमीर खाँ, रजबअली खाँ, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी, रोशनआरा बेगम, हीराबाई बड़ोदकर।
  • गायन शैली की विशेषताएँ:
    • स्वर लगाने की विधि में विशेष चिकनापन और मधुरता।
    • आलाप प्रधान ख्याल गायकी।
    • मींड प्रधान ठुमरी गायकी।
    • एक-एक स्वर को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हुए राग का क्रमिक विस्तार।
    • मींड तथा गमकयुक्त तान क्रिया।

4. जयपुर घराना (जयपुर-अतरौली)

  • जन्मदाता: भूपत खाँ 'मनरंग'।
  • शाखाएँ: आगे चलकर यह घराना पटियाला घराना और अल्लादिया खाँ घराना के रूप में विभाजित हुआ।
  • प्रमुख कलाकार: गुलाम गौस खाँ, इमाम बख्श, छज्जू खाँ, केसरबाई केसरकर, किशोरी अमोनकर।
  • गायन शैली की विशेषताएँ:
    • खुली आवाज़ का प्रयोग।
    • ख्याल गायन में विशेष बोलबनाव युक्त अदाकारी।
    • वक्र तानों तथा आलाप की छोटी-छोटी तानों से राग की बढ़त।
    • बोल, उपज तथा अनाघात लय का सुंदर प्रयोग।

5. दिल्ली घराना

  • संस्थापक: मियाँ अचपल।
  • प्रमुख कलाकार: तानरस खाँ (मियाँ अचपल के उत्कृष्ट शिष्य), उस्ताद चाँद खाँ, उस्ताद उमराव खाँ, उस्ताद नसीर अहमद खाँ, उस्ताद ज़फ़र इकबाल खान।
  • गायन शैली की विशेषताएँ:
    • राग की शुद्धता एवं उसके सिद्धांतों का कड़ाई से पालन।
    • कलापूर्ण ख्याल बंदिशें।
    • मींड, गमक और लहक का सुंदर प्रयोग।
    • राग की बढ़त में गहनता।
    • विभिन्न प्रकार की घरानागत तानों (जैसे उलझाव की तान, सवाल-जवाब की तान, झूला की तान, फंदे की तान) का प्रयोग।
    • ताल और लय पर पूर्ण अधिकार।

6. पटियाला घराना

  • संस्थापक: अली बख्श और फ़तेह अली (प्रसिद्ध जोड़ी 'अलिया-फत्तू')।
  • प्रमुख कलाकार: बड़े गुलाम अली खाँ (जिन्होंने घराने को शिखर पर पहुँचाया), मुनव्वर अली खाँ, अमानत अली, अजय चक्रवर्ती, मीरा बनर्जी, प्रसून बनर्जी।
  • गायन शैली की विशेषताएँ:
    • रचनाओं में विशेष चपलता और आकर्षण।
    • अलंकारिक वक्र तथा फिरत की तानों का प्रचुर प्रयोग।
    • छोटे ख्यालों की कलापूर्ण बंदिशें।
    • गायन में पंजाब अंग या टप्पा शैली का स्पष्ट प्रभाव।
    • ठुमरी गायन में विशेष निपुणता।
    • तैयार तानों का अधिक प्रयोग।

7. रामपुर-सहसवान घराना

  • संस्थापक: हद्दू खाँ के दामाद इनायत खाँ हुसैन। यह ग्वालियर घराने का ही एक उप-घराना माना जाता है।
  • प्रमुख कलाकार: इमदाद खाँ, इनायत हुसैन खाँ, मुश्ताक हुसैन खाँ, निसार हुसैन खाँ, वारिस हुसैन खाँ, गुलाम मुस्तफा खाँ।
  • गायन शैली की विशेषताएँ:
    • स्वर की स्पष्टता पर विशेष बल।
    • राग के विस्तार में क्रमिक नियमों का कड़ाई से अनुपालन।
    • तराना गायकी में विशेष निपुणता।
    • खुली एवं ज़ोरदार आवाज़ का प्रयोग।

8. सेनिया घराना

  • विशेषता: यह घराना मुख्य रूप से तंत्री वाद्यों (विशेषकर सितार और सुरबहार) की वादन परंपरा से संबद्ध है।
  • प्रतिपादक: तानसेन के दामाद मिसरी सिंह।
  • प्रमुख कलाकार: मसीत खाँ, मुश्ताक अली खाँ, सुख सेन, बहादुर सेन, रहीम सेन, अमृत सेन, बरकतउल्ला खाँ, आशिक अली खाँ, देबू चौधरी।
  • वादन शैली की विशेषताएँ:
    • केवल 17 परदों में सितार वादन की कला।
    • तारों को मिज़राब से छेड़े बिना केवल अँगुलियों से स्वरों को बजाना।
    • बीन अंग और ध्रुपद अंग की शैलियों का समावेश।
    • राग में स्वरों की शुद्धता, बंदिशों की स्वच्छता, गमक और मींड का उत्कृष्ट प्रयोग।
संगीत के प्रसिद्ध व्यक्तित्व

1. अमीर खुसरो

  • जीवन परिचय: जन्म 1234 ई. (658 हिजरी) में एटा जिले के पटियाली नामक स्थान पर हुआ। पिता अमीर मोहम्मद सैफुद्दीन शम्सी तुर्क जाति के थे।
  • राज्याश्रय: गुलाम वंश के गयासुद्दीन बलबन और खिलजी वंश के अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में रहे।
  • संगीत में योगदान:
    • भारतीय संगीत में अरबी, ईरानी और तूरानी तत्वों का समावेश किया।
    • मिश्रित रागों का आविष्कार किया, जिनमें साजगिरी, उश्शाक, ज़िलाफ़ और सरपरदा प्रमुख हैं।
    • पारंपरिक वीणा में परिवर्तन कर सहतार का निर्माण किया, जो कालांतर में सितार कहलाया।
    • गायन की नवीन शैली कव्वाली को जन्म दिया।
    • स्थानीय भाषाओं में नए गीतों की रचना की, जो आगे चलकर ख्याल के रूप में प्रसिद्ध हुए। इन्हें ख्याल का जन्मदाता भी माना जाता है।

2. स्वामी हरिदास

  • जीवन परिचय: जन्म 1512 ई. में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के खैर कस्बा (हरिदासपुर) में हुआ। पिता श्री आशुधीर और माता गंगा देवी थीं। 25 वर्ष की आयु में संन्यास लेकर वृंदावन के निधिवन निकुंज में रहने लगे। मृत्यु 1607 ई. में हुई।
  • संगीत साधना व योगदान:
    • ब्रजभाषा में अनेक ध्रुपदों की रचना की और उन्हें शास्त्रीय रागों व तालों में निबद्ध किया।
    • गायन के अतिरिक्त वादन व नृत्य में भी पारंगत थे। उन्होंने धमार, त्रिवट और चतुरंग की रचना की।
    • ब्रज में प्रचलित रासलीला को स्वामी हरिदास की ही देन माना जाता है।
    • इन्होंने सखी संप्रदाय नामक संगीतमय धार्मिक संप्रदाय की स्थापना की।
    • इनकी रचनाएँ संगीतकल्पद्रुम में संकलित हैं।
  • प्रमुख शिष्य: तानसेन, बैजू बावरा, मदनराय, रामदास, दिवाकर पंडित, सोमनाथ पंडित।
  • ऐतिहासिक प्रसंग: सम्राट अकबर ने तानसेन के साथ भेष बदलकर स्वामी जी का अलौकिक गायन सुना था।

3. सामता प्रसाद मिश्र उर्फ़ गुदई महाराज

  • जीवन परिचय: जन्म 20 जुलाई 1921 को बनारस में हुआ। पिता पंडित बाचा मिश्र भी प्रसिद्ध तबला वादक थे। पिता के देहांत के बाद मौसेरे भाई पंडित बिक्कू महाराज की देखरेख में प्रतिदिन 15-16 घंटे कड़ा अभ्यास किया। मृत्यु 21 मई 1994 को पुणे में हुई।
  • वादन शैली व विशेषताएँ:
    • बनारस घराने के अत्यंत प्रतिष्ठित तबला वादक।
    • तिरकिट, तक्तक, धिनगिन और धिरधिर किटितक जैसे कठिन बोलों पर असाधारण अधिकार।
    • बाएँ तबले की स्याही अपनी ओर रखकर वादन करने की अनूठी शैली, जिससे विशेष गूँज उत्पन्न होती थी।
    • इन्होंने 'शोले', 'बसंत बहार', 'मेरी सूरत तेरी आँखें', 'झनक झनक पायल बाजे' जैसी अनेक प्रसिद्ध फ़िल्मों में तबला वादन किया।
  • सम्मान व उपाधियाँ: ताल मार्तण्ड, ताल शिरोमणि, तबला सम्राट, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण।

4. सदारंग-अदारंग

  • वास्तविक नाम: सदारंग का असली नाम नियामत खाँ और अदारंग का फिरोज खाँ था।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: 18वीं शताब्दी में मुगल सम्राट मोहम्मद शाह रंगीले के दरबार में दरबारी गायक और बीनकार थे।
  • संगीत में योगदान:
    • ख्याल गायकी के प्रचार-प्रसार का मुख्य श्रेय इन्हें ही जाता है।
    • इन्होंने अनेक ख्यालों की रचना की और सम्राट को प्रसन्न करने के लिए बंदिशों में 'रंगीले' शब्द का प्रयोग किया।
    • स्वयं ध्रुपद गाते थे, परंतु अपने शिष्यों को केवल ख्याल सिखाते थे, जिससे ख्याल गायकी को समाज में उच्च स्थान प्राप्त हुआ।
    • नियामत खाँ के दो पुत्र फिरोज खाँ और भूपत खाँ (मनरंग) थे, जिन्होंने संगीत क्षेत्र में उच्च स्थान प्राप्त किया।

5. बैजू और गोपाल

  • बैजू (बैजनाथ मिश्र / बैजू बावरा):
    • 16वीं शताब्दी के महान ध्रुपद गायक और तानसेन के समकालीन।
    • गुजरात के ब्राह्मण परिवार में जन्म। 'बावरा' जनजाति से संबंध होने के कारण 'बैजू बावरा' कहलाए।
    • अकबर के शासनकाल में दिल्ली में निवास करते थे और गोपाल नायक के गुरु थे।
  • गोपाल नायक:
    • 1294-95 ई. के आसपास देवगिरी के राजा रामदेव के दरबारी गायक थे।
    • अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद दिल्ली आए, जहाँ अमीर खुसरो के साथ उनकी ऐतिहासिक संगीत प्रतियोगिता हुई।
    • इतिहासकारों के अनुसार वे ध्रुपद के स्थान पर तमिल और संस्कृत के अन्य प्राचीन प्रबंध गाते थे।