भारतीय संगीत में समय नापने के साधन को ताल कहते हैं। ताल को संगीत का प्राण माना गया है। शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ सुगम, लोक और फिल्मी संगीत में भी ताल की प्रधानता होती है।
आचार्य शारंगदेव कृत संगीत रत्नाकर के अनुसार ताल शब्द की व्युत्पत्ति 'तल' धातु से हुई है:
“तालस्तल प्रतिष्ठायामिति धातोर्धञ्: स्मृतः।
गीतं वाद्यं तथा नृत्तं यतस्ताले प्रतिष्ठितम् ।।”
भावार्थ: 'प्रतिष्ठा' (व्यवस्थित करना, आधार प्रदान करना) अर्थ वाली 'तल' धातु में 'घञ्' प्रत्यय लगाने से 'ताल' शब्द बनता है। गीत, वाद्य और नृत्य को जो व्यवस्थित आधार प्रदान करता है, वही ताल है।
संगीत में जो स्थान ताल का है, काव्य साहित्य में वही स्थान छंद का है। दोनों का उद्देश्य समय (काल) को मापना है।
चौपाई उदाहरण:
मंगल (ऽ||) भवन (|||) अमंगल (ऽ||) हारी (ऽऽ) [16 मात्राएँ]
द्रवहु (|||) सु (|) दशरथ (||||) अजर (|||) बिहारी (|ऽऽ) [16 मात्राएँ]
भारतीय संगीत की यह विशेषता है कि समान मात्रा और समान विभाग होने पर भी प्रकृति, लय और वादन शैली के भेद से तालों का स्वरूप बदल जाता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धिं | ऽ | धा | धा | तिं | ऽ | ता | तिं | ऽ | धा | धा | धिं | ऽ |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 2 | ||||||||||
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | ऽधा | तिरकिट | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तिं | ऽता | तिरकिट | धिं | धिं | धागे | तिरकिट |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | ||||||||||
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | तिं | तिं | ना | धिं | ना | धिं | ना |
| चिह्न | ⊗ (खाली) | 1 | 2 | ||||
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | दिं | ता | तेटे | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 2 | 3 | ||||
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | ता | धिं | धिं | धा |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | ||||||||||||
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | तिरकिट | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | तिरकिट | तिं | तिं | धा | धा | धिं | धिं |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | ||||||||||||
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | कत् | ता | धागे | तिरकिट | धी | ना |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 | ||||||
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | दिं | ता | तेटे | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 | ||||||
सर्वप्रथम नारद कृत संगीत मकरंद ग्रंथ में ताल के दस अनिवार्य तत्वों को 'प्राण' की संज्ञा दी गई है:
“कालो मार्गक्रियाङ्गानि ग्रहजातिः कला लयः ।
यति प्रस्तारकश्चेति ताल प्राणा दश स्मृताः ।।”
संगीत में व्यतीत हो रहे समय को मापने का साधन काल है। इसकी सबसे छोटी इकाई मात्रा है।
किसी ताल की प्रथम मात्रा से अंतिम मात्रा तक पहुँचने की पद्धति को मार्ग कहते हैं। प्राचीन ताल पद्धति में चार मार्ग थे: ध्रुव, चित्र, वार्तिक और दक्षिण।
हाथ से ताल दिखाने की क्रिया को दो भागों में बाँटा गया है:
ताल के विभिन्न भागों या खंडों को अंग कहते हैं। उत्तर भारतीय संगीत में इसे विभाग कहा जाता है।
गीत और ताल के मिलाप के स्थान को ग्रह कहते हैं। इसके मुख्य दो भेद हैं:
तालों के लय प्रकारों और मात्राओं के विभाजन के आधार पर पाँच जातियाँ मानी गई हैं:
भरत मुनि के अनुसार मात्रिक काल को कला माना गया है। इसके अंतर्गत द्विकल, चतुष्कल, अष्टकल आदि रूपों का प्रदर्शन होता है।
समय की समान गति को लय कहते हैं। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं: विलंबित लय (धीमी गति), मध्य लय (साधारण गति), और द्रुत लय (तेज गति)।
लय के प्रवाही गुण या मार्ग को यति कहते हैं। मुख्य प्रकार:
ताल के अंगों या बोलों को व्यवस्थित और निश्चित क्रम से उलट-पुलट कर विस्तार करने की प्रक्रिया को प्रस्तार कहते हैं।