Sangeet: Class 12 (Book 1) — Chapter 1: ताल की अवधारणा तथा संगीत में इसका महत्व

ताल की अवधारणा एवं संगीत में महत्व

भारतीय संगीत में समय नापने के साधन को ताल कहते हैं। ताल को संगीत का प्राण माना गया है। शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ सुगम, लोक और फिल्मी संगीत में भी ताल की प्रधानता होती है।

ताल की व्युत्पत्ति एवं शास्त्रीय परिभाषा

आचार्य शारंगदेव कृत संगीत रत्नाकर के अनुसार ताल शब्द की व्युत्पत्ति 'तल' धातु से हुई है:

“तालस्तल प्रतिष्ठायामिति धातोर्धञ्: स्मृतः।
गीतं वाद्यं तथा नृत्तं यतस्ताले प्रतिष्ठितम् ।।”


भावार्थ: 'प्रतिष्ठा' (व्यवस्थित करना, आधार प्रदान करना) अर्थ वाली 'तल' धातु में 'घञ्' प्रत्यय लगाने से 'ताल' शब्द बनता है। गीत, वाद्य और नृत्य को जो व्यवस्थित आधार प्रदान करता है, वही ताल है।

ताल का ऐतिहासिक विकास

  • भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र: ताल का सर्वप्रथम उल्लेख इसी ग्रंथ में मिलता है। इसमें पाँच मार्गी तालें बताई गई हैं: चच्चत्पुट, चाचपुट, षट्पितापुत्रक, सम्पक्वेष्टाक और उदघट्ट।
  • प्राचीन काल में ताल अवनद्ध वाद्यों के बजाय घन वाद्यों (जैसे मँजीरा) पर ताली-खाली के रूप में प्रदर्शित की जाती थी।
  • शारंगदेव कृत संगीत रत्नाकर: इसमें मार्गी तालों के साथ-साथ 120 देशी तालों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
  • अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ: संगीत समयसार, संगीत सुधाकर, रस कौमुदी, और संगीत दर्पण।

ताल और छंद का पारस्परिक संबंध

संगीत में जो स्थान ताल का है, काव्य साहित्य में वही स्थान छंद का है। दोनों का उद्देश्य समय (काल) को मापना है।

  • ताल संगीत के काल को मात्राओं में मापता है।
  • छंद साहित्य के काल को लघु (मान: 1 मात्रा) और गुरु (मान: 2 मात्रा) के माध्यम से मापता है।

चौपाई उदाहरण:
मंगल (ऽ||) भवन (|||) अमंगल (ऽ||) हारी (ऽऽ) [16 मात्राएँ]
द्रवहु (|||) सु (|) दशरथ (||||) अजर (|||) बिहारी (|ऽऽ) [16 मात्राएँ]

समान मात्रा एवं विभाग वाली तालों का तुलनात्मक अध्ययन

भारतीय संगीत की यह विशेषता है कि समान मात्रा और समान विभाग होने पर भी प्रकृति, लय और वादन शैली के भेद से तालों का स्वरूप बदल जाता है।

1. दीपचंदी और झूमरा ताल (14 मात्राएँ, विभाग: 3/4/3/4)

  • दीपचंदी ताल: चंचल प्रकृति की ताल है। इसका प्रयोग मध्य लय में ठुमरी, भजन, होरी और सुगम संगीत में होता है।
  • झूमरा ताल: गंभीर प्रकृति की ताल है। इसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत में विलंबित खयाल गायन के साथ किया जाता है।

दीपचंदी ताल का ठेका

मात्रा 123 4567 8910 11121314
बोल धाधिंऽ धाधातिंऽ तातिंऽ धाधाधिंऽ
चिह्न × 2 0 2

झूमरा ताल का ठेका

मात्रा 123 4567 8910 11121314
बोल धिंऽधातिरकिट धिंधिंधागेतिरकिट तिंऽतातिरकिट धिंधिंधागेतिरकिट
चिह्न × 2 0 3

2. रूपक और तीव्रा ताल (7 मात्राएँ, विभाग: 3/2/2)

  • रूपक ताल: चंचल प्रकृति की ताल है जो तबले पर बजाई जाती है। इसका प्रयोग खयाल, ठुमरी, भजन, गज़ल और सुगम संगीत में होता है। इसके सम पर खाली (0) दर्शाया जाता है।
  • तीव्रा ताल: गंभीर प्रकृति की ताल है जो पखावज पर बजाई जाती है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से ध्रुपद गायन के साथ होता है।

रूपक ताल का ठेका

मात्रा 123 45 67
बोल तिंतिंना धिंना धिंना
चिह्न ⊗ (खाली) 1 2

तीव्रा ताल का ठेका

मात्रा 123 45 67
बोल धादिंता तेटेकत गदिगन
चिह्न × 2 3

3. त्रिताल और तिलवाड़ा ताल (16 मात्राएँ, विभाग: 4/4/4/4)

  • त्रिताल (तीनताल): तबले की सर्वाधिक लोकप्रिय ताल है। इसका प्रयोग शास्त्रीय गायन, वादन और कथक नृत्य में विलंबित, मध्य और द्रुत तीनों लयों में होता है।
  • तिलवाड़ा ताल: इसका प्रयोग केवल विलंबित लय में बड़े खयाल की संगति के लिए किया जाता है।

त्रिताल का ठेका

मात्रा 1234 5678 9101112 13141516
बोल धाधिंधिंधा धाधिंधिंधा धातिंतिंता ताधिंधिंधा
चिह्न × 2 0 3

तिलवाड़ा ताल का ठेका

मात्रा 1234 5678 9101112 13141516
बोल धातिरकिटधिंधिं धाधातिंतिं तातिरकिटतिंतिं धाधाधिंधिं
चिह्न × 2 0 3

4. एकताल और चौताल (12 मात्राएँ, विभाग: 2/2/2/2/2/2)

  • एकताल: तबले पर बजाई जाने वाली ताल है। इसका प्रयोग खयाल गायन और तंत्र वाद्यों में अति विलंबित से लेकर द्रुत लय तक किया जाता है।
  • चौताल (चारताल): पखावज पर बजाई जाने वाली गंभीर प्रकृति की ताल है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से ध्रुपद गायन के साथ होता है।

एकताल का ठेका

मात्रा 12 34 56 78 910 1112
बोल धिंधिं धागेतिरकिट तूना कत्ता धागेतिरकिट धीना
चिह्न × 0 2 0 3 4

चौताल का ठेका

मात्रा 12 34 56 78 910 1112
बोल धाधा दिंता किटधा दिंता तेटेकत गदिगन
चिह्न × 0 2 0 3 4
ताल के दस प्राण (Dash Pran of Taal)

सर्वप्रथम नारद कृत संगीत मकरंद ग्रंथ में ताल के दस अनिवार्य तत्वों को 'प्राण' की संज्ञा दी गई है:

“कालो मार्गक्रियाङ्गानि ग्रहजातिः कला लयः ।
यति प्रस्तारकश्चेति ताल प्राणा दश स्मृताः ।।”

1. काल (Time)

संगीत में व्यतीत हो रहे समय को मापने का साधन काल है। इसकी सबसे छोटी इकाई मात्रा है।

  • पंचनिमेष काल: पाँच बार पलकें झपकाने में लगने वाला समय 1 मात्रा कहलाता है।
  • एक मात्रिक काल को लघु, द्विमात्रिक को गुरु तथा त्रिमात्रिक को प्लुत कहा जाता है।

2. मार्ग (Path)

किसी ताल की प्रथम मात्रा से अंतिम मात्रा तक पहुँचने की पद्धति को मार्ग कहते हैं। प्राचीन ताल पद्धति में चार मार्ग थे: ध्रुव, चित्र, वार्तिक और दक्षिण।

3. क्रिया (Action)

हाथ से ताल दिखाने की क्रिया को दो भागों में बाँटा गया है:

  • सशब्द क्रिया: हाथ से ताली बजाकर ध्वनि उत्पन्न करना।
  • निःशब्द क्रिया: बिना ध्वनि किए हाथ को एक तरफ गिराकर खाली दर्शाना।

4. अंग (Limb)

ताल के विभिन्न भागों या खंडों को अंग कहते हैं। उत्तर भारतीय संगीत में इसे विभाग कहा जाता है।

5. ग्रह (Starting Point)

गीत और ताल के मिलाप के स्थान को ग्रह कहते हैं। इसके मुख्य दो भेद हैं:

  • सम ग्रह: जब गीत और ताल दोनों एक साथ पहली मात्रा (सम) से प्रारंभ हों।
  • विषम ग्रह: इसके दो उपभेद हैं:
    • अतीत ग्रह: जब ताल शुरू होने के बाद बंदिश या गीत का बोल शुरू हो।
    • अनागत ग्रह: जब ताल शुरू होने से पहले ही बंदिश का बोल शुरू हो जाए।

6. जाति (Classification)

तालों के लय प्रकारों और मात्राओं के विभाजन के आधार पर पाँच जातियाँ मानी गई हैं:

  • त्र्यस्र जाति: 3 मात्राओं का समूह (उदा. दादरा ताल)।
  • चतुस्र जाति: 4 मात्राओं का समूह (उदा. त्रिताल)।
  • खंड जाति: 5 मात्राओं का समूह (उदा. झपताल)।
  • मिश्र जाति: 7 मात्राओं का समूह (उदा. रूपक ताल)।
  • संकीर्ण जाति: 9 मात्राओं का समूह (उदा. वसंत ताल)।

7. कला

भरत मुनि के अनुसार मात्रिक काल को कला माना गया है। इसके अंतर्गत द्विकल, चतुष्कल, अष्टकल आदि रूपों का प्रदर्शन होता है।

8. लय (Tempo)

समय की समान गति को लय कहते हैं। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं: विलंबित लय (धीमी गति), मध्य लय (साधारण गति), और द्रुत लय (तेज गति)।

9. यति (Flow of Laya)

लय के प्रवाही गुण या मार्ग को यति कहते हैं। मुख्य प्रकार:

  • समायति: आदि से अंत तक एक समान लय।
  • स्रोतागता यति: नदी के प्रवाह की तरह पहले धीमी फिर क्रमशः तेज होती लय।
  • गोपुच्छा यति: गाय की पूँछ की तरह पहले तेज और अंत में धीमी होती लय।

10. प्रस्तार (Permutation)

ताल के अंगों या बोलों को व्यवस्थित और निश्चित क्रम से उलट-पुलट कर विस्तार करने की प्रक्रिया को प्रस्तार कहते हैं।