प्राचीन काल में जब संगीत का विकसित रूप समाज में प्रचलित हुआ, उसके बहुत बाद इसके शास्त्र पक्ष का लेखन भी आरंभ हुआ। संगीत लिपिबद्ध करने के ऐतिहासिक प्रयास निम्नलिखित हैं:
पं. विष्णु नारायण भातखंडे द्वारा रचित ग्रंथों जैसे 'क्रमिक पुस्तक मालिका' (भाग 1-6), 'हिंदुस्तानी संगीत', 'लक्षण गीत संग्रह' आदि के माध्यम से यह पद्धति पूरे देश में अत्यधिक प्रचलित हुई। इसके प्रमुख चिह्न निम्नलिखित हैं:
| क्रम सं. | नाम | चिह्न | विवरण / उपयोग |
|---|---|---|---|
| 1. | सम | × | ताल की पहली मात्रा को दर्शाने हेतु। |
| 2. | ताली | संख्या (2, 3, 4, 5...) | सम के अतिरिक्त अन्य तालियों की संख्या दर्शाने हेतु। |
| 3. | खाली | O | खाली दर्शाने हेतु शून्य का प्रयोग। |
| 4. | विभाग | | (खड़ी पाई) | ताल के विभागों को अलग करने हेतु। |
| 5. | मात्रा | अर्धचंद्राकार चिह्न ( ‿ ) | इस चिह्न के अंतर्गत जितने भी बोल/स्वर होंगे, उन्हें एक मात्रा में बोलना/कहना होगा। |
| 6. | अवग्रह | ऽ | विश्राम या स्वर को खींचने हेतु। |
पं. विष्णु नारायण भातखंडे भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान उद्धारक और शास्त्रकार थे।
पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा प्रणीत ताल-लिपि पद्धति के प्रमुख चिह्न निम्नलिखित हैं:
| क्रम सं. | नाम | चिह्न | विवरण |
|---|---|---|---|
| 1. | सम | 1 | पहली ताली या सम के लिए '1' का प्रयोग। |
| 2. | ताली | संख्या (2, 3, 4...) | अन्य तालियों की संख्या दर्शाने हेतु। |
| 3. | खाली | + | खाली दर्शाने हेतु '+' चिह्न का प्रयोग। |
| 4. | विभाग | कोई चिह्न नहीं | इस पद्धति में विभाग के लिए कोई विशेष चिह्न नहीं होता। |
| 5. | मात्रा के चिह्न | ¼ मात्रा ( ‿ ), अर्द्धमात्रा ( O ), एक मात्रा ( — ), दो मात्रा ( 𝆏 ), चार मात्रा ( + ) | मात्रा काल के विभिन्न मानों को दर्शाने वाले चिह्न। |
| 6. | आवर्तन की पूर्णता | | (खड़ी पाई) | आवर्तन की समाप्ति दर्शाने हेतु। |
यहाँ शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख तालों का परिचय, उनकी मात्राएँ, विभाग, ताली-खाली और उनकी विभिन्न लयकारियों (दुगुन, तिगुन, चौगुन) का विवरण दिया गया है:
त्रिताल तबले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, लोकप्रिय एवं प्रचलित ताल है। यह समपदी ताल है और चतुरस्र जाति के अंतर्गत आता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | ता | धिं | धिं | धा | धा |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | × |
यह चतुरस्र जाति का समपदी ताल है। इसका प्रयोग विलंबित, मध्य एवं द्रुत लय के खयाल तथा गत की संगत के लिए किया जाता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धिं | धिं | धागे | तिरकिट | तू | ना | कत् | ता | धागे | तिरकिट | धिं | ना | धिं |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 | × |
यह खंड जाति का विषमपदी ताल है। इसका प्रयोग विलंबित और मध्य लय के खयाल तथा गतों की संगत के लिए किया जाता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धी | ना | धी | धी | ना | ती | ना | धी | धी | ना | धी |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | × |
यह एकमात्र ऐसा ताल है जिसके सम पर खाली दर्शाया जाता है। इसका प्रयोग शास्त्रीय, उपशास्त्रीय तथा सुगम संगीत में किया जाता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | तीं | तीं | ना | धीं | ना | धीं | ना |
| चिह्न | ⊗ | 2 | 3 |
यह सुगम, लोक और फिल्म संगीत में अत्यंत लोकप्रिय ताल है। इसकी प्रकृति चंचल और श्रृंगारिक होती है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धी | ना | धा | ती | ना | धा |
| चिह्न | × | 0 | × |
उत्तर भारत के कहार समाज के लोक नृत्य से उद्गमित यह ताल सुगम और फिल्म संगीत में बहुत लोकप्रिय है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | गे | न | ति | न | क | धि | न | धा |
| चिह्न | × | 0 | × |
यह पखावज का अत्यंत लोकप्रिय और प्राचीन ताल है। इसका प्रयोग ध्रुपद गायन और पखावज के स्वतंत्र वादन में किया जाता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन | धा |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 0 | 3 | 4 | × |
यह पखावज का लोकप्रिय ताल है जिसका वादन मध्य और द्रुत लय में ध्रुपद अंग के साथ होता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | तिट | कत | गदि | गन | धा |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 3 | 0 | × |
तेज गति में बजने के कारण इसका नाम तीव्रा पड़ा। यह मिश्र जाति का विषमपदी ताल है और इसमें खाली नहीं होता।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन | धा |
| चिह्न | × | 2 | 3 | × |
होरी गायन की संगत के लिए प्रयुक्त होने वाला यह ताल तबला वादकों और कथक नर्तकों में बहुत लोकप्रिय है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | क | धि | ट | धि | ट | धा | ऽ | ग | ति | ट | ति | ट | ता | ऽ | क |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | × |
यह सोलह मात्रा की ताल है जिसे विलंबित तीनताल भी कहा जाता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 1 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | तिरकिट | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | तिरकिट | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 | × |
अध्याय के अंत में दिए गए अभ्यास प्रश्न: