Sangeet: Class 12 (Book 1) — Chapter 2: संगीत लिपि पद्धति का संक्षिप्त इतिहास

संगीत लिपि पद्धति का इतिहास

प्राचीन काल में जब संगीत का विकसित रूप समाज में प्रचलित हुआ, उसके बहुत बाद इसके शास्त्र पक्ष का लेखन भी आरंभ हुआ। संगीत लिपिबद्ध करने के ऐतिहासिक प्रयास निम्नलिखित हैं:

भातखंडे ताल-लिपि पद्धति

पं. विष्णु नारायण भातखंडे द्वारा रचित ग्रंथों जैसे 'क्रमिक पुस्तक मालिका' (भाग 1-6), 'हिंदुस्तानी संगीत', 'लक्षण गीत संग्रह' आदि के माध्यम से यह पद्धति पूरे देश में अत्यधिक प्रचलित हुई। इसके प्रमुख चिह्न निम्नलिखित हैं:

क्रम सं.नामचिह्नविवरण / उपयोग
1.सम×ताल की पहली मात्रा को दर्शाने हेतु।
2.तालीसंख्या (2, 3, 4, 5...)सम के अतिरिक्त अन्य तालियों की संख्या दर्शाने हेतु।
3.खालीOखाली दर्शाने हेतु शून्य का प्रयोग।
4.विभाग| (खड़ी पाई)ताल के विभागों को अलग करने हेतु।
5.मात्रा अर्धचंद्राकार चिह्न ( ‿ )इस चिह्न के अंतर्गत जितने भी बोल/स्वर होंगे, उन्हें एक मात्रा में बोलना/कहना होगा।
6.अवग्रहऽविश्राम या स्वर को खींचने हेतु।
पं. विष्णु नारायण भातखंडे का जीवन परिचय

पं. विष्णु नारायण भातखंडे भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान उद्धारक और शास्त्रकार थे।

पलुस्कर ताल-लिपि पद्धति

पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा प्रणीत ताल-लिपि पद्धति के प्रमुख चिह्न निम्नलिखित हैं:

क्रम सं.नामचिह्नविवरण
1.सम1पहली ताली या सम के लिए '1' का प्रयोग।
2.तालीसंख्या (2, 3, 4...)अन्य तालियों की संख्या दर्शाने हेतु।
3.खाली+खाली दर्शाने हेतु '+' चिह्न का प्रयोग।
4.विभागकोई चिह्न नहींइस पद्धति में विभाग के लिए कोई विशेष चिह्न नहीं होता।
5.मात्रा के चिह्न¼ मात्रा ( ‿ ), अर्द्धमात्रा ( O ), एक मात्रा ( — ), दो मात्रा ( 𝆏 ), चार मात्रा ( + )मात्रा काल के विभिन्न मानों को दर्शाने वाले चिह्न।
6.आवर्तन की पूर्णता| (खड़ी पाई)आवर्तन की समाप्ति दर्शाने हेतु।
विभिन्न तालों का परिचय एवं लयकारी

यहाँ शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख तालों का परिचय, उनकी मात्राएँ, विभाग, ताली-खाली और उनकी विभिन्न लयकारियों (दुगुन, तिगुन, चौगुन) का विवरण दिया गया है:

1. त्रिताल (तीनताल)

त्रिताल तबले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, लोकप्रिय एवं प्रचलित ताल है। यह समपदी ताल है और चतुरस्र जाति के अंतर्गत आता है।

  • कुल मात्राएँ: 16
  • विभाग: 4 (प्रत्येक विभाग में 4-4 मात्राएँ)
  • ताली: 1, 5 और 13वीं मात्रा पर
  • खाली: 9वीं मात्रा पर
मात्रा123456789101112131415161
बोलधाधिंधिंधाधाधिंधिंधाधातिंतिंताताधिंधिंधाधा
चिह्न×203×

2. एकताल

यह चतुरस्र जाति का समपदी ताल है। इसका प्रयोग विलंबित, मध्य एवं द्रुत लय के खयाल तथा गत की संगत के लिए किया जाता है।

  • कुल मात्राएँ: 12
  • विभाग: 6 (प्रत्येक विभाग में 2-2 मात्राएँ)
  • ताली: 1, 5, 9 और 11वीं मात्रा पर
  • खाली: 3 और 7वीं मात्रा पर
मात्रा1234567891011121
बोलधिंधिंधागेतिरकिटतूनाकत्ताधागेतिरकिटधिंनाधिं
चिह्न×02034×

3. झपताल

यह खंड जाति का विषमपदी ताल है। इसका प्रयोग विलंबित और मध्य लय के खयाल तथा गतों की संगत के लिए किया जाता है।

  • कुल मात्राएँ: 10
  • विभाग: 4 (2/3/2/3 मात्राओं के विभाग)
  • ताली: 1, 3 और 8वीं मात्रा पर
  • खाली: 6वीं मात्रा पर
मात्रा123456789101
बोलधीनाधीधीनातीनाधीधीनाधी
चिह्न×203×

4. रूपक ताल

यह एकमात्र ऐसा ताल है जिसके सम पर खाली दर्शाया जाता है। इसका प्रयोग शास्त्रीय, उपशास्त्रीय तथा सुगम संगीत में किया जाता है।

  • कुल मात्राएँ: 7
  • विभाग: 3 (3/2/2 मात्राओं के विभाग)
  • ताली: 4 और 6वीं मात्रा पर
  • खाली: 1ली मात्रा पर (सम पर खाली)
मात्रा1234567
बोलतींतींनाधींनाधींना
चिह्न⊗23

5. दादरा ताल

यह सुगम, लोक और फिल्म संगीत में अत्यंत लोकप्रिय ताल है। इसकी प्रकृति चंचल और श्रृंगारिक होती है।

  • कुल मात्राएँ: 6
  • विभाग: 2 (3/3 मात्राओं के विभाग)
  • ताली: 1ली मात्रा पर
  • खाली: 4थी मात्रा पर
मात्रा1234561
बोलधाधीनाधातीनाधा
चिह्न×0×

6. कहरवा ताल

उत्तर भारत के कहार समाज के लोक नृत्य से उद्गमित यह ताल सुगम और फिल्म संगीत में बहुत लोकप्रिय है।

  • कुल मात्राएँ: 8
  • विभाग: 2 (4/4 मात्राओं के विभाग)
  • ताली: 1ली मात्रा पर
  • खाली: 5वीं मात्रा पर
मात्रा123456781
बोलधागेनतिनकधिनधा
चिह्न×0×

7. चारताल अथवा चौताल (पखावज हेतु)

यह पखावज का अत्यंत लोकप्रिय और प्राचीन ताल है। इसका प्रयोग ध्रुपद गायन और पखावज के स्वतंत्र वादन में किया जाता है।

  • कुल मात्राएँ: 12
  • विभाग: 6 (प्रत्येक विभाग में 2-2 मात्राएँ)
  • ताली: 1, 5, 9 और 11वीं मात्रा पर
  • खाली: 3 और 7वीं मात्रा पर
मात्रा1234567891011121
बोलधाधादिंताकिटधादिंतातिटकतगदिगनधा
चिह्न×02034×

8. सूलताल

यह पखावज का लोकप्रिय ताल है जिसका वादन मध्य और द्रुत लय में ध्रुपद अंग के साथ होता है।

  • कुल मात्राएँ: 10
  • विभाग: 5 (प्रत्येक विभाग में 2-2 मात्राएँ)
  • ताली: 1, 5 और 7वीं मात्रा पर
  • खाली: 3 और 9वीं मात्रा पर
मात्रा123456789101
बोलधाधादिंताकिटधातिटकतगदिगनधा
चिह्न×0230×

9. तीव्रा या तेवरा

तेज गति में बजने के कारण इसका नाम तीव्रा पड़ा। यह मिश्र जाति का विषमपदी ताल है और इसमें खाली नहीं होता।

  • कुल मात्राएँ: 7
  • विभाग: 3 (3/2/2 मात्राओं के विभाग)
  • ताली: 1, 4 और 6वीं मात्रा पर
  • खाली: कोई खाली नहीं
मात्रा12345671
बोलधादिंतातिटकतगदिगनधा
चिह्न×23×

10. धमार ताल

होरी गायन की संगत के लिए प्रयुक्त होने वाला यह ताल तबला वादकों और कथक नर्तकों में बहुत लोकप्रिय है।

  • कुल मात्राएँ: 14
  • विभाग: 4 (5/2/3/4 मात्राओं के विभाग)
  • ताली: 1, 6 और 11वीं मात्रा पर
  • खाली: 8वीं मात्रा पर
मात्रा12345678910111213141
बोलकधिटधिटधाऽगतिटतिटताऽक
चिह्न×203×

11. तिलवाड़ा

यह सोलह मात्रा की ताल है जिसे विलंबित तीनताल भी कहा जाता है।

  • कुल मात्राएँ: 16
  • विभाग: 4 (प्रत्येक विभाग में 4-4 मात्राएँ)
  • ताली: 1, 5 और 13वीं मात्रा पर
  • खाली: 9वीं मात्रा पर
मात्रा123456789101112131415161
बोलधातिरकिटधिंधिंधाधातिंतिंतातिरकिटधिंधिंधाधाधिंधिंधा
चिह्न×203×
अभ्यास एवं प्रश्नोत्तर

अध्याय के अंत में दिए गए अभ्यास प्रश्न:

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. संगीत का आधुनिक काल 18-19वीं शताब्दी को माना जाता है।
  2. ताल के ठेके को पूर्ण कीजिए — धिं धिं धागे तिरकिट तू ना क त्ता
  3. नाट्यशास्त्र में गुरु का मान दो मात्रा काल का बताया गया है।
  4. एकताल में तीसरी एवं सातवीं मात्रा पर खाली होती है।
  5. ताल के ठेके को पूर्ण कीजिए — धीना धीधी नाधी धीना धीना धीधी नाधी धीना
  6. पखावज पर चौताल/सूलताल ताल बजाया जाता है।
  7. दादरा त्रिस्र जाति का ताल है।
  8. ताल के ठेके को पूर्ण कीजिए — धा धी न ति न क धि न
  9. चारताल में 6 विभाग एवं 4 ताली होते हैं।
  10. सूलताल में 3 ताली होती हैं।
  11. धा दिं ता तिट कत गदि गन के बोल तीव्रा ताल के हैं।
  12. तीव्रा खुले और जोरदार वर्णों से निर्मित ताल है।