Sangeet: Class 12 (Book 1) — Chapter 3: तबला और पखावज के स्वतंत्र वादन में बंदिशों का महत्व

स्वतंत्र वादन एवं बंदिश का परिचय

संगीत के क्षेत्र में सभी वाद्य (अवनद्ध, घन, सुषिर, तत) मुख्यतः गायन की संगति के लिए आविष्कृत हुए हैं। समय के साथ महान कलाकारों के सौजन्य से अनेक वाद्यों ने स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित किया है, जिनमें अवनद्ध वर्ग से तबला और पखावज सर्वाधिक प्रमुख हैं।

स्वतंत्र वादन (एकल वादन / सोलो) क्या है?

  • परिभाषा: अकेले स्वतंत्रतापूर्वक एकल वादन करते हुए अपनी वादन क्षमता और कला कौशल से दर्शकों व श्रोताओं को आनंदित करना।
  • जब कोई वादक किसी दूसरी विधा के संगीतकार की संगति न करके स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार वादन प्रस्तुत करता है, तो उसे एकल वादन, मुक्त वादन या सोलो (Solo) कहा जाता है।
  • यह वादन पूरी तरह एकल नहीं होता, क्योंकि लय और ताल के दिग्दर्शन के लिए मंच पर एक स्वर वाद्य वादक (लहरा/नगमा बजाने वाला) उपस्थित रहता है।
  • संगति में वादक मुख्य कलाकार का सहयोग करता है, जबकि स्वतंत्र वादन में वह अपनी शिक्षा, ज्ञान और कलात्मकता का पूर्ण प्रदर्शन करता है।

'बंदिश' शब्द का अर्थ एवं वर्गीकरण

  • शाब्दिक अर्थ: बंधन युक्त अर्थात एक अनुशासित बंधन।
  • सांगीतिक अर्थ: महान संगीतकारों द्वारा रचित वे विशिष्ट रचनाएँ जिन्हें सामान्यतः उसी रूप में बजाया जाता है जिसमें वे रची गई हैं। इनके मूल स्वरूप में फेरबदल की गुंजाइश नहीं होती।
  • बंदिशों के प्रकार: बंदिशों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है:
    1. विस्तारशील बंदिशें: वे रचनाएँ जिनका विस्तार कलाकार अपने घराने के नियमों के अनुसार कर सकता है। उदाहरण: पेशकार, कायदा, बाँट, रेला, ठेके का प्रस्तार, गत-कायदा आदि।
    2. अविस्तारशील बंदिशें: वे रचनाएँ जिन्हें उसी रूप में बजाया जाता है जिसमें वे रची गई हैं। उदाहरण: टुकड़ा, गत, परण, गत-टुकड़ा, गत-परण, फर्द, कवित्त, स्तुति परण आदि।
घरानों की शैलीगत विविधताएँ

विभिन्न घरानों की स्थापना और विकास में बंदिशों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बंदिशों के आधार पर ही अलग-अलग घरानों की पहचान होती है।

पखावज वादन की परंपराएँ एवं घराने

  • कुदऊ सिंह परंपरा: क्लिष्ट और जोरदार वर्णों से निर्मित लंबी-लंबी परणों का बहुतायत में प्रयोग।
  • नाना पानसे परंपरा: अपेक्षाकृत मुलायम और आसानी से द्रुत लय में बजने वाले बोलों का प्रयोग। पखावज, तबला और कथक नृत्य का सामीप्य।
  • रायगढ़ घराना: ध्वन्यांकित वर्णों और प्रकृति चित्रण से जुड़ी बंदिशों पर अधिक ध्यान।
  • श्रीनाथ परंपरा: कर्णप्रिय, मधुर बंदिशों के साथ-साथ कवित्त और स्तुति परणों की रचना।
  • स्वामी रामशंकर दास 'पागल दास' (अवधी घराना): पखावज, तबले और नृत्य के लिए सैकड़ों बंदिशों की रचना। प्रमुख रचनाएँ: आदेशी परण, सार्थक परण, बोल परण, कवित्त और स्तुति परण।
  • पं. सुरेश तलवलकर: आधुनिक युग के श्रेष्ठ ताबलिक। इन्होंने दक्षिण भारतीय लयों, लयकारियों और ताल पद्धतियों का अध्ययन कर तबले और पखावज को नई भाषा दी। इनकी बंदिशों में गणितीय चमत्कार दिखाई देता है।

तबला वादन के घराने और उनकी विशेषताएँ

  • दिल्ली बाज (घराना): पेशकार, बराबर की लय के एक वर्णीय कायदे, छोटे-छोटे रेले और गत जैसी बंदिशों की प्रधानता।
  • अजराड़ा घराना: त्र्यस्र जाति (तीसरी जाति) के कायदों पर विशेष कार्य।
  • लखनऊ घराना: नृत्य की संगति के कारण खुला बाज। चाँटी के स्थान पर 'लव' का प्रयोग। किनार, लव और स्याही के बोलों की प्रधानता। गत-कायदा, गत-टुकड़े और गत-परण जैसी बंदिशों की रचना।
  • फर्रूखाबाद घराना: पेशकार के साथ-साथ 'चलन' (चाला) का विकास। रेला के अंतिम चरण को 'रौ' के रूप में तैयार करना। गतों पर सर्वाधिक कार्य।
  • बनारस घराना: तबले में उठान, बाँट, लय-बाँट और गतों की जगह फर्द को वरीयता। हिंदू देवी-देवताओं पर आधारित कवित्त और स्तुति परणों का वादन।
  • पंजाब घराना: पखावज का स्पष्ट प्रभाव। कायदों में भी परणों के वर्णों का समावेश। पंजाबी गतों के साथ-साथ दुधारी, तिधारी और चौधारी गतों का निर्माण।
प्रमुख बंदिशों के लक्षण एवं परिभाषाएँ

उठान (Uthan)

'उठान' का अर्थ है उठना या प्रारंभ करना। बनारस घराने के वादक अपने वादन का प्रारंभ पेशकार के स्थान पर उठान से करते हैं। यह मूलतः टुकड़ा और परण जैसी रचना होते हुए भी विभिन्न लयकारियों से युक्त होती है। इसका वादन विलंबित लय से शुरू होकर चौगुन, अठगुन तक जाता है। इसके बोल खुले और जोरदार होते हैं तथा अंत में एक तिहाई होती है।

चक्रदार (Chakradar)

जब कोई बड़ा और संपूर्ण बोल (जिसके अंत में तिहाई हो) हूबहू तीन बार बजाया जाता है, तो उसे चक्रदार कहते हैं। इसके अंतर्गत चक्रदार टुकड़ा, चक्रदार परण आदि आते हैं।

परण (Paran)

परण मूलतः पखावज का बोल है, जो आज तबला और कथक नृत्य में भी प्रयुक्त होता है। इसमें गंभीर, खुले और जोरदार बोलों (जैसे: धागतेटे, तागेतेटे, क्रिधातेटे, धमुकिटतक) का प्रयोग होता है। यह आकार में टुकड़े से बड़ा होता है और इसके अंत में तिहाई अनिवार्य होती है।

पेशकार (Peshkar)

पेशकार फ़ारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'पेश करने वाला'। यह स्वतंत्र वादन की प्रारंभिक रचना है। इसकी प्रकृति कायदे जैसी होती है परंतु इसमें कायदे जैसी कठोर नियमबद्धता नहीं होती। इसका वादन मध्य लय की डगमगाती हुई चाल में होता है।

बाँट (Baat)

बाँट का अर्थ है विभाजित करना या विस्तार करना। यह कायदे की तरह की रचना है जिसे विभिन्न प्रकार से बाँटा जाता है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं: बोल बाँट और लय बाँट। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसके समापन भाग में एक रेला जुड़ा होता है।

फर्द (Fard)

फर्द या इक्कड़ तबला वादन की अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट अविस्तारशील रचना है। इसके वर्ण खुले और जोरदार होते हैं। इसमें टुकड़े-परण की तरह तिहाई नहीं होती। इसका समापन प्रायः 'धिरधिर किटितक' जैसे वर्णों से होता है। फर्द का शाब्दिक अर्थ 'अकेला' है, इसलिए इसका कोई जोड़ा नहीं होता। इसकी रचना का श्रेय बनारस घराने को जाता है।

गत (Gat)

गत तबले की अत्यंत महत्वपूर्ण और गेय रचना है। पुराने विद्वानों ने इसे 'तबले की शायरी' कहा है। इसमें तबले के मुलायम, खूबसूरत और कर्णप्रिय वर्णों का प्रयोग होता है। इसमें टुकड़ों की तरह तिहाई नहीं होती। इसके दो भाग होते हैं: खुले और बंद। यह सम के ठीक पहले समाप्त होती है। इसके विशेष प्रकारों में दोपल्ली गत (दो अलग-अलग लयों में प्रस्तुत) और तिपल्ली गत (तीन अलग-अलग लयों में प्रस्तुत) शामिल हैं।

लग्गी एवं लड़ी (Laggi & Ladi)

लग्गी-लड़ी भारतीय उपशास्त्रीय और सुगम संगीत (कहरवा, दादरा, दीपचंदी तालों) में तबले पर बजाई जाने वाली रचना है। इसका विस्तार कायदे की तुलना में अधिक स्वतंत्रता से किया जाता है। लग्गी का छोटा भाग जब द्रुत गति से रेले के समान बजाया जाता है, तो उसे लड़ी कहते हैं।

ताल लिपिबद्ध बंदिशें (Notation Tables)

त्रिताल में एक उठान (48 मात्रा)

मात्रा12345678910111213141516
बोलधाऽतेटेतेटेधगतेटेघेड़ाऽनकतकतकतकतगदिगनधाऽदींऽताऽकऽतेटेतेटेकतगदिगन
चिह्नX203

मात्रा17181920212223242526272829303132
बोलनगतेटेधगतेटेतेटेकतगदिगनदींऽऽनगिनकऽतड़ाऽनकतगदिगनतेटेकतगदिगननगेतेटेकतगदिगनक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगनधाऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगनधाऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगनधाऽ
चिह्नX203

मात्रा33343536373839404142434445464748
बोलऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगनधाऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिनधाऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगनधाऽऽऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगनधाऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगनधाऽक्रिधातेटेगदिगनधाऽकतगदिगन धा (सम)
चिह्नX203X

त्रिताल में चक्रदार टुकड़ा

विभागप्रथम विभाग (1-4)द्वितीय विभाग (5-8)तृतीय विभाग (9-12)चतुर्थ विभाग (13-16)
मात्रा12345678910111213141516
बोलधाऽनधेतेटेनगिनतेतेटेकतेटेतगिनधाऽनधादींदींधातिरकिटधतेटेतकिटधीक‍िटताऽनधा
चिह्नX203

सरस्वती परण — चौताल (स्वामी पागल दास रचित)

मात्रा123456789101112
बोलजयतिजयतिजयमाऽतसुरऽस्वतीचमचमचनद्रमुकुटसोऽहतअतिकरबांऽधेऽसरुविनयकरतलेऽ
चिह्नX02034X02034

कहरवा ताल में एक लग्गी

मात्रा12345678
बोलधाधिंधाड़ाधातिंनाड़ा
चिह्नX0