मध्यकाल में विभिन्न प्रकार के अवनद्ध (चमड़े से मढ़े हुए) वाद्यों का प्रयोग किया जाता था। इन वाद्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:
| विशेषता | मार्ग पटह (Margi Patah) | देशी पटह (Deshi Patah) |
|---|---|---|
| लंबाई | साढ़े तीन से चार फीट | 27 इंच |
| परिधि | 30 इंच | - |
| दायाँ मुख व्यास | 6 इंच | साढ़े तीन इंच |
| बायाँ मुख व्यास | 5 इंच | तीन इंच |
तार वाले वाद्यों को तत् वाद्य कहा जाता है। इस अध्याय में तानपूरा और गिटार का विस्तृत विवरण दिया गया है:
| भाग का नाम | विवरण व कार्य |
|---|---|
| तुम्बा (Tumba) | सूखे कद्दू (काशीफल) का आधा हिस्सा जो प्रतिध्वनि उत्पन्न करने में सहायक होता है। |
| तबली (Tabli) | तुम्बे के ऊपर लगी लकड़ी की प्लेट। |
| डाँड़ (Dand) | तानपूरे की लंबी लकड़ी की नली (गर्दन)। |
| गुल (Gul) | वह स्थान जहाँ डाँड़ और तुम्बा आपस में मिलते हैं। |
| खूँटियाँ (Pegs) | तारों को कसने या ढीला करने के लिए डाँड़ के ऊपरी भाग में लगी युक्तियाँ। |
| अटी और तारगहन | हाथी दाँत की पट्टियाँ जिनसे होकर तार गुजरते हैं। |
| घोड़ी / घुड़च (Bridge) | तबली के ऊपर लकड़ी या हड्डी की बनी चौकी जिस पर तार टिके होते हैं। |
| मनका (Beads) | तारों के सूक्ष्म अंतर को ठीक करने के लिए प्रयुक्त मोती। |
| धागा (Javari Thread) | ब्रिज के ऊपर तारों के नीचे दबाया जाने वाला धागा जो स्वर में झंकार उत्पन्न करता है। |
हवा या फूँक के माध्यम से बजाए जाने वाले वाद्यों को सुषिर वाद्य कहा जाता है:
| क्षेत्र / भाषा | बाँसुरी का नाम |
|---|---|
| कन्नड़ | कोलवी |
| मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ | उडल / बाँसुरी |
| नागालैंड | कुली / बाँसुरी |
| पश्चिम बंगाल | बाशी |
| गुजरात | वेनो, वंशी, वेणु, मुरली |
धातु या काष्ठ के आघात से बजने वाले वाद्य घन वाद्य कहलाते हैं, साथ ही आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का परिचय यहाँ दिया गया है:
अध्याय के अंत में दिए गए मूल्यांकन प्रश्नों का संकलन:
| स्तंभ 'अ' | स्तंभ 'ब' (सही उत्तर) |
|---|---|
| 1. मोहनवीणा | (ग) विश्वमोहन भट्ट |
| 2. तुम्बा | (ङ) तानपूरा का भाग |
| 3. मनका | (ख) मोती |
| 4. गिटार | (क) ब्रजभूषण काबरा |
| 5. पाश्चात्य वाद्य | (घ) वायलिन |