Sangeet: Class 12 (Book 1) — Chapter 4: विभिन्न वाद्यों का परिचय

मध्यकालीन अवनद्ध वाद्यों का संक्षिप्त परिचय

मध्यकाल में विभिन्न प्रकार के अवनद्ध (चमड़े से मढ़े हुए) वाद्यों का प्रयोग किया जाता था। इन वाद्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:

1. पणव (Panav)

  • ऐतिहासिक संदर्भ: यह एक अति प्राचीन अवनद्ध वाद्य है जिसका उल्लेख सूत्र साहित्य, जातक साहित्य, रामायण, महाभारत और नाट्यशास्त्र में मिलता है।
  • संरचना: यह एक द्विमुखी वाद्य है जिसका मध्य भाग भीतर की तरफ दबा होता है। इसके दोनों मुख चमड़े से मढ़े होते हैं और पुड़ी को सूत की डोरी से बाँधा जाता है।
  • वादन विधि: वादन के लिए बाएं हाथ की उंगलियों से डोरी को कसा जाता था और दाहिने हाथ की कनिष्ठिका व अनामिका से चमड़े पर आघात किया जाता था।
  • पटाक्षर (Bol): इसके वादन में क, ख, ग, ट, ण, दे, वा, ह, र, ल, कु, लि, लं, घ्र, ण, कि, रि, किण्ण आदि पटाक्षर प्रयुक्त होते थे।
  • आधुनिक साम्यता: वर्तमान लोकसंगीत में प्रचलित हुडुक्का और पणव लगभग समान हैं।

2. हुडुक्का (Hudukka)

  • ऐतिहासिक संदर्भ: इसका उल्लेख नाट्यशास्त्र, संगीत पारिजात और संगीत रत्नाकर में मिलता है। इसे आवज, हुडुक, पणव आदि नामों से भी जाना जाता है।
  • आकृति व आकार: इसकी आकृति डमरू से मिलती-जुलती है। यह लगभग सवा फुट लंबा और खोखली लकड़ी का बना होता है।
  • क्षेत्रीय रूप: हिमाचल प्रदेश में इसे हुडक कहा जाता है। इससे थोड़े बड़े आकार के वाद्य को हिमाचल में गुज्जु कहा जाता है।
  • निर्माण सामग्री: इसकी पुड़ियाँ बकरे के आमाशय (पेट) की भीतरी खाल से बनाई जाती हैं जो कागज से भी पतली होती हैं। पुड़ी की कुंडली बाँस की छड़ी से बनती है।
  • उपयोग: उत्तराखंड के लोकगीतों और जागर गीतों में हुडुक से संगत की जाती है।

3. दर्दुर (Dardur)

  • ऐतिहासिक संदर्भ: नाट्यशास्त्र में दर्दुर को अवनद्ध वाद्यों की श्रेणी में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। संगीत रत्नाकर में इसे घट कहा गया है।
  • संरचना: यह घट (घड़े) के आकार का होता है। इसके मुख का माप लगभग 10 इंच होता है, जिस पर लगभग 6 इंच व्यास की चमड़े की पुड़ी लगी होती है।
  • वादन विधि: इसमें दोनों हाथों का प्रयोग होता है। दाहिने हाथ से मुक्त, अर्धमुक्त और बंद ध्वनियाँ निकाली जाती हैं, जबकि बायाँ हाथ सहायक के रूप में कार्य करता है।
  • कर्नाटक संगीत में साम्यता: इसका साम्य कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध वाद्य घटम् से है, परंतु घटम् में चमड़े की पुड़ी का प्रयोग नहीं होता।

4. पटह (Patah)

  • ऐतिहासिक संदर्भ: यह एक प्रमुख द्विमुखी अवनद्ध वाद्य है। भरत मुनि ने इसे प्रत्यंग वाद्य के अंतर्गत रखा है। मानसोल्लास, संगीत रत्नाकर और संगीत पारिजात में इसका विस्तृत वर्णन है।
  • भेद: मध्यकालीन ग्रंथकारों ने इसके दो भेद बताए हैं — मार्ग पटह (या मार्गी) और देशी पटह।
  • संरचनात्मक अंतर:
    विशेषतामार्ग पटह (Margi Patah)देशी पटह (Deshi Patah)
    लंबाईसाढ़े तीन से चार फीट27 इंच
    परिधि30 इंच-
    दायाँ मुख व्यास6 इंचसाढ़े तीन इंच
    बायाँ मुख व्यास5 इंचतीन इंच
  • निर्माण व स्वर संगति: इसका ढाँचा खैर या लाल चंदन की लकड़ी से बनता है। इसमें सात-सात छिद्रों के माध्यम से डोरी द्वारा पुड़ी कसी जाती है और स्वर मिलाने के लिए धातु के सात छल्ले (कड़े) लगाए जाते हैं।
  • वर्ण: पटह पर 16 वर्ण प्रयुक्त होते हैं — क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, र, ह।
  • आधुनिक रूप: पंडित अहोबल कृत संगीत पारिजात में पटह को ढोलक कहा गया है, जिससे स्पष्ट है कि वर्तमान ढोलक इसी का परिवर्तित रूप है।

5. मृदंगम् (Mridangam)

  • महत्व: यह दक्षिण भारतीय (कर्नाटक) संगीत का मुख्य अवनद्ध वाद्य है। इसके बिना कर्नाटक संगीत की कल्पना असंभव है।
  • संरचना: यह द्विमुखी वाद्य है जिसे लिटाकर बजाया जाता है। इसे मुख्य रूप से कटहल की लकड़ी से बनाया जाता है। इसका दायाँ मुख बाएं मुख की तुलना में छोटा होता है।
  • पखावज से तुलना: यह दिखने में उत्तर भारतीय पखावज जैसा है, परंतु इसकी लंबाई कम होती है और इसका दायाँ चमड़ा अधिक मोटा होता है।
  • स्याही (Soru): इसके दाहिने मुख पर लगी स्याही को दक्षिण भारत में सोरू कहते हैं, जो लौह चूर्ण और पके चावल के मिश्रण से बनती है।
  • पुलीका: बाएं मुख पर सूजी का लेप लगाया जाता है जिसे पुलीका कहते हैं, जिससे गंभीर ध्वनि उत्पन्न होती है।

6. ताशा (Tasha)

  • संरचना: यह एक उर्ध्वमुखी लोक अवनद्ध वाद्य है। इसका आकार मिट्टी या धातु के चपटे कटोरे जैसा होता है और मुख पर बकरे की खाल मढ़ी होती है।
  • वादन: इसे गले में लटकाकर दो पतली डंडियों से बजाया जाता है। इसका प्रयोग मुख्यतः ढोल और झाँझ की संगत में होता है।
  • ऐतिहासिक तथ्य: अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ताशा बजाने में अत्यंत पारंगत थे।

7. नक्कारा (Nakkara)

  • उत्पत्ति: नक्कारा फारसी भाषा का शब्द है। प्राचीन ग्रंथों में वर्णित दुन्दुभि ही आज का नक्कारा या नगाड़ा है।
  • संरचना: इसके दो भाग होते हैं। बड़े भाग को भारी आवाज के लिए और छोटे भाग को तीखी आवाज के लिए प्रयोग किया जाता है। छोटे भाग को झील कहा जाता है।
  • वादन व उपयोग: इसका प्रयोग स्वांग, नौटंकी, भगत और शहनाई के साथ संगत में होता है। मुगल काल में अकबर के दरबार में नक्कारखाने का विशेष महत्व था।

8. ढोलक (Dholak)

  • परिचय: यह उत्तर भारत का अत्यंत लोकप्रिय लोक वाद्य है। यह आम, शीशम या सागौन की लकड़ी से बनता है।
  • माप: इसकी लंबाई लगभग 45 सेमी और मध्य व्यास लगभग 27 सेमी होता है।
  • वादन शैली: इसे उंगलियों से बजाया जाता है। इसकी भीतरी सतह पर ध्वनि को गंभीर करने के लिए एक विशेष लेप लगाया जाता है।
  • प्रसिद्ध कलाकार: 20वीं शताब्दी में उस्ताद बफ़ाती खाँ, उस्ताद गुलाम जाफ़र खाँ और वर्तमान में गिरीश विश्व इसके प्रमुख वादक हैं।

9. पुंग (Pung)

  • क्षेत्र: यह मणिपुर क्षेत्र का पारंपरिक और विशिष्ट द्विमुखी अवनद्ध वाद्य है। यह मणिपुरी जनजीवन, संकीर्तन और नृत्य का अभिन्न अंग है।
  • संरचना: लकड़ी से निर्मित यह वाद्य लगभग दो फुट लंबा होता है। इसके दाहिने मुख को मनाड और बाएं मुख को मरू कहते हैं। दोनों मुखों पर स्याही का लेप पूरी गोलाई में होता है।

10. ढोल (Dhol)

  • संरचना: यह बेलनाकार खोखला वाद्य है जो आम, बड़, नीम या सागौन की लकड़ी से बनता है। इसकी लंबाई 25 सेमी से 90 सेमी तक होती है।
  • वादन: इसका वादन एक तरफ हाथ से और दूसरी तरफ डंडी (स्टिक) से किया जाता है। इसकी ध्वनि अत्यंत तेज और गंभीर होती है।
तत् वाद्यों का परिचय (Chordophones)

तार वाले वाद्यों को तत् वाद्य कहा जाता है। इस अध्याय में तानपूरा और गिटार का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. तानपूरा (Tanpura)

  • परिचय: यह एकतारा या दोतारा का विकसित रूप है। इसे तम्बोरा या तंबूरा भी कहा जाता है। यह शास्त्रीय संगीत में आधार स्वर (Drone) प्रदान करता है।
  • मुख्य भाग:
    भाग का नामविवरण व कार्य
    तुम्बा (Tumba)सूखे कद्दू (काशीफल) का आधा हिस्सा जो प्रतिध्वनि उत्पन्न करने में सहायक होता है।
    तबली (Tabli)तुम्बे के ऊपर लगी लकड़ी की प्लेट।
    डाँड़ (Dand)तानपूरे की लंबी लकड़ी की नली (गर्दन)।
    गुल (Gul)वह स्थान जहाँ डाँड़ और तुम्बा आपस में मिलते हैं।
    खूँटियाँ (Pegs)तारों को कसने या ढीला करने के लिए डाँड़ के ऊपरी भाग में लगी युक्तियाँ।
    अटी और तारगहनहाथी दाँत की पट्टियाँ जिनसे होकर तार गुजरते हैं।
    घोड़ी / घुड़च (Bridge)तबली के ऊपर लकड़ी या हड्डी की बनी चौकी जिस पर तार टिके होते हैं।
    मनका (Beads)तारों के सूक्ष्म अंतर को ठीक करने के लिए प्रयुक्त मोती।
    धागा (Javari Thread)ब्रिज के ऊपर तारों के नीचे दबाया जाने वाला धागा जो स्वर में झंकार उत्पन्न करता है।
  • तारों की संख्या व मिलाना: तानपूरे में 4 तार होते हैं। पहला तार मंद्र पंचम (प) या मध्यम (म) में, बीच के दो तार (जोड़ी के तार) मध्य षड्ज (स) में, और चौथा तार मंद्र षड्ज (स) में मिलाया जाता है।

2. गिटार (Guitar)

  • मूल: यह मूलतः एक पाश्चात्य वाद्य है जिसे भारतीय संगीतज्ञों ने अपनी शैली के अनुकूल ढाल लिया है।
  • वादन उपकरण: इसे बजाने के लिए कोण, मिजराब या पिक (Pick/Plectrum) का प्रयोग किया जाता है।
  • भारतीय रूपांतरण: भारतीय कलाकारों ने इसमें तरब और चिकारी के तार जोड़कर इसे पूर्णतः भारतीय स्वरूप दिया है। पंडित विश्वमोहन भट्ट ने इसे संशोधित कर मोहन वीणा का आविष्कार किया।
सुषिर वाद्यों का परिचय (Aerophones)

हवा या फूँक के माध्यम से बजाए जाने वाले वाद्यों को सुषिर वाद्य कहा जाता है:

1. बाँसुरी (Flute)

  • ऐतिहासिक नाम: प्राचीन काल में इसे मुख वीणा भी कहा जाता था। इसके अन्य नाम वंशी, वंसी, मुरली, वेणु, पावा, अलगोजा आदि हैं।
  • क्षेत्रीय नाम:
    क्षेत्र / भाषाबाँसुरी का नाम
    कन्नड़कोलवी
    मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़उडल / बाँसुरी
    नागालैंडकुली / बाँसुरी
    पश्चिम बंगालबाशी
    गुजरातवेनो, वंशी, वेणु, मुरली
  • प्रसिद्ध वादक: पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पन्नालाल घोष, विजय राघव राव, रघुनाथ सेठ, राजेंद्र प्रसन्ना और सिक्किल सिस्टर्स।

2. हारमोनियम (Harmonium)

  • संरचना: यह एक स्वतंत्र रीड वाद्य है। इसके मुख्य चार भाग होते हैं — धौंकनी, वायु कक्ष, कुंजियाँ (Keys) और रीड।
  • की-बोर्ड: इसमें लगभग तीन से साढ़े तीन सप्तक तक की कुंजियाँ होती हैं। वादक एक हाथ से धौंकनी चलाता है और दूसरे हाथ से कुंजियाँ दबाता है।
  • प्रसिद्ध वादक: अप्पा जलगाँवकर, महमूद धौलपुरी और अरविंद थत्ते।
घन वाद्य एवं आधुनिक उपकरण (Idiophones & Modern Devices)

धातु या काष्ठ के आघात से बजने वाले वाद्य घन वाद्य कहलाते हैं, साथ ही आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का परिचय यहाँ दिया गया है:

1. घुँघरू (Ghungroo)

  • प्राचीन नाम: ग्रंथों में इसे क्षुद्रघंटिका या घर्घरिका कहा गया है।
  • निर्माण: यह कांसा, पीतल या लोहे के खोखले गोलों से बनता है जिसके भीतर लोहे या पत्थर की छोटी गोली होती है।

2. मँजीरा (Manjira)

  • परिचय: प्राचीन काल में इसे ताल कहा जाता था। यह कांसा, पीतल या अष्टधातु से निर्मित प्यालेनुमा वाद्य है।
  • क्षेत्रीय रूप: ओडिशा में इसके बड़े रूप को कांशी कहा जाता है।

3. झाँझ (Jhanjh)

  • विवरण: संगीत सार ग्रंथ के अनुसार इसे कांस्यताल भी कहा जाता है। यह मँजीरे से आकार में काफी बड़ा और चपटा होता है।

4. इलेक्ट्रॉनिक की-बोर्ड (Electronic Keyboard)

  • इतिहास: इसका आविष्कार 17वीं सदी के आसपास इटली के बार्टोलोमियो क्रिस्टोफोरी ने किया था। तब इसे पियानोफोर्टे कहा जाता था।
  • विशेषता: इसमें ऑक्टेव (अष्टक) होते हैं और विभिन्न वाद्यों की ध्वनियाँ व लय (टेंपो) पहले से रिकॉर्डेड रूप में उपलब्ध होती हैं।

5. संगीत ऐप्स (Music Apps)

  • उपयोगिता: मोबाइल और लैपटॉप में प्रयुक्त होने वाले ये सॉफ्टवेयर तानपूरा, नगमा, और संगत के लिए ठेके की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे रियाज करना सुगम हो जाता है।
पाठ्यपुस्तक अभ्यास एवं मिलान

अध्याय के अंत में दिए गए मूल्यांकन प्रश्नों का संकलन:

स्तंभ मिलान (Match the Following)

स्तंभ 'अ'स्तंभ 'ब' (सही उत्तर)
1. मोहनवीणा(ग) विश्वमोहन भट्ट
2. तुम्बा(ङ) तानपूरा का भाग
3. मनका(ख) मोती
4. गिटार(क) ब्रजभूषण काबरा
5. पाश्चात्य वाद्य(घ) वायलिन