Sangeet: Class 12 (Book 1) — Chapter 5: तबला एवं पखावज वाद्य की उत्पत्ति तथा विकास
तबला वाद्य की उत्पत्ति एवं विकास के विभिन्न मत
तबला उत्तर भारतीय संगीत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संगत वाद्य है। इसकी उत्पत्ति और विकास के संबंध में विद्वानों के मध्य विभिन्न मत प्रचलित हैं:
1. पखावज को काटकर तबला बनाने का मत (खंडन)
प्रचलित धारणा: पखावज को बीच से काटकर तबला वाद्य का निर्माण किया गया।
वैज्ञानिक खंडन: पखावज को बीच से काटने पर उसका प्रत्येक भाग नीचे से खुला रहेगा (जैसे विदेशी वाद्य बोंगो), जबकि तबले के दोनों भाग (दायाँ और बायाँ) नीचे से पूर्णतः बंद होते हैं। अतः यह मत अमान्य है।
2. अमीर खुसरो का मत (13वीं शताब्दी)
प्रचलित धारणा: अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो (1253 ई. - 1325 ई.) को तबले का आविष्कारक माना जाता है।
खंडन के तर्क: स्वयं अमीर खुसरो ने अपनी किसी पुस्तक में तबले का उल्लेख नहीं किया है। इसके अतिरिक्त, 18वीं शताब्दी तक किसी भी संगीत ग्रंथ में तबला वाद्य का कोई वर्णन नहीं मिलता।
3. विदेशी वाद्य 'तब्ल' का मत
धारणा: यह वाद्य मुस्लिमों द्वारा भारत लाया गया। अरब, फारस और तुर्किस्तान में ऊर्ध्वमुखी (ऊपर मुख वाले) अवनद्ध वाद्यों के लिए तब्ल शब्द का प्रयोग होता था।
तथ्य: 'तब्ल' शब्द का प्रयोग युद्ध के नगाड़े के अर्थ में किया जाता था, जिसका उल्लेख सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब और मलिक मुहम्मद जायसी कृत पद्मावत महाकाव्य में मिलता है।
4. मुगल काल और खुसरो खाँ का मत (ऐतिहासिक प्रामाणिकता)
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मुगल बादशाह मुहम्मद शाह 'रंगीला' (1719-1748 ई.) के दरबार में प्रसिद्ध गायक सदारंग और अदारंग ने खयाल गायन शैली का प्रचार किया।
आविष्कार: रहमान खाँ पखावजी के पुत्र खुसरो खाँ (जिन्हें कुछ विद्वान सिद्धार खाँ भी कहते हैं) ने सदारंग से खयाल गायन सीखा। उन्होंने खयाल की द्रुत और चंचल प्रकृति के अनुकूल संगत करने के लिए लोक अवनद्ध वाद्य तबले में सुधार किया।
दिल्ली घराना: इस सुधार के फलस्वरूप दिल्ली में जो तबला विकसित हुआ, उसे दिल्ली घराना और दिल्ली बाज का नाम मिला।
5. प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के प्रमाण
भाजा गुफा (महाराष्ट्र): दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की इस गुफा में एक स्त्री की मूर्ति उकेरी गई है, जो अपनी कमर में तबला-डग्गा सदृश जोड़ी वाद्य बाँधकर बजा रही है। इससे सिद्ध होता है कि यह वाद्य मुस्लिम शासन से पूर्व भी भारत में विद्यमान था।
6. नाट्यशास्त्र और त्रिपुष्कर का सिद्धांत
मूल आधार: वर्तमान में तबले की उत्पत्ति का आधार भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित त्रिपुष्कर वाद्य को माना जाता है।
स्वाति मुनि की कथा: वर्षा ऋतु में स्वाति मुनि जब पुष्कर (तालाब) पर जल लेने गए, तो बादलों की गर्जना और कमल पत्रों पर गिरती वर्षा की बूंदों से उत्पन्न कर्णप्रिय ध्वनि सुनकर आकर्षित हुए। उन्होंने विश्वकर्मा की सहायता से पुष्कर वाद्यों का निर्माण किया।
त्रिपुष्कर के भाग: इसमें तीन भाग थे - आंकिक (द्विमुखी वाद्य), ऊर्ध्वक और आलिंग्य (एक मुख वाले वाद्य)।
विकास क्रम: आंकिक भाग से उत्तर भारतीय मृदंग या पखावज तथा दक्षिण भारतीय मृदंगम् का विकास हुआ। ऊर्ध्वक और आलिंग्य भाग से आधुनिक तबला-डग्गा का विकास हुआ।
तबला वाद्य की संरचनात्मक एवं वादन तकनीक का विकास
1. 18वीं से 20वीं शताब्दी के परिवर्तन
वादन शैली में बदलाव: प्रारंभ में खड़े होकर कमर में बाँधकर बजाने की प्रथा थी (18वीं सदी के चित्रों के अनुसार)। बाद में बैठकर बजाने की परिपाटी विकसित हुई।
स्याही का प्रयोग: पहले बायें (डग्गे) पर गीला आटा लगाकर बजाया जाता था (पंजाब में इसे धामा कहा जाता था)। बाद में दोनों पर पक्की स्याही का प्रयोग होने लगा।
ऐतिहासिक ग्रंथ: 20वीं शताब्दी के आरंभ (1900-1906 ई.) में मुहम्मद इसहाक द्वारा लिखित पुस्तक रिसाल-ए-तबला नवाज़ी में तबले के तत्कालीन स्वरूप का वर्णन मिलता है।
आकार में परिवर्तन: समय के साथ डग्गा (बायाँ) आकार में बड़ा और दायाँ तबला छोटा होता गया, जिससे नाद में गंभीरता और गूँज बढ़ी।
2. विभिन्न घरानों में तबले का स्वरूप
अजराड़ा घराना: बायें तबले (डग्गे) को प्रधानता देकर विशेष रचनाओं का निर्माण किया गया।
लखनऊ घराना: प्रारंभ में बायाँ छोटा और दायाँ बड़ा होता था। यहाँ थपिया बाज और बाद में लव (मैदान) का प्रयोग बढ़ा।
फर्रुखाबाद घराना: बंद और खुले बोलों के संयोग से विकास हुआ।
बनारस घराना: तबला और बायाँ सामान्यतः समान आकार के होते हैं। इसमें पाँचों उँगलियों का प्रयोग और पखावज का आंशिक प्रभाव दिखाई देता है।
पंजाब घराना: इसकी वादन शैली प्रारंभ में पूर्णतः पखावज से प्रेरित थी, बाद में तबले के वर्णों का समावेश हुआ।
पखावज की ऐतिहासिकता एवं संरचनात्मक विकास
1. ऐतिहासिक संदर्भ एवं नामकरण
प्राचीनता: पखावज (मृदंग) का सर्वप्रथम उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। अजंता की मूर्तिकला में भी इसका चित्रण है।
क्षेत्रीय नाम: वर्तमान में इसे उत्तर भारत में पखावज, दक्षिण भारत में मृदंगम्, और पूर्वी राज्यों (ओडिशा, बंगाल, असम, मणिपुर) में मर्दल, खोल, या पुंग कहा जाता है।
शब्द व्युत्पत्ति: 'पख' (पक्ष/बाँह का वह भाग जो बगल में पड़ता है) + 'आवज' (बजाना)। अर्थात पूरे बाहु के बल से बजाया जाने वाला वाद्य।
2. संरचनात्मक विकास
मिट्टी से काष्ठ तक: प्राचीन काल में मृदंग मिट्टी (मृत्तिका) से बनता था, इसलिए इसे 'मृदंग' कहा गया। मिट्टी का शरीर होने के कारण इसमें ट्यूनिंग के लिए लकड़ी के गट्टे नहीं लगाए जा सकते थे।
गट्टों का प्रयोग: मध्यकाल में मिट्टी के स्थान पर काष्ठ (लकड़ी) का प्रयोग होने लगा। चमड़े की पूड़ियों को कसने के लिए लोहे के छल्ले हटाकर लकड़ी के गट्टे लगाए गए, जिससे स्वर-परिवर्तन अत्यंत सुगम हो गया।
पखावज के प्रमुख घराने एवं उनकी शैलीगत विशेषताएँ
1. कुदऊ सिंह घराना
संस्थापक: महाराज कुदऊ सिंह (जन्म लगभग 1812 ई., बांदा, उत्तर प्रदेश)। ये लाला भवानीदीन के शिष्य थे। दतिया के राजा भवानी सिंह के दरबारी कलाकार रहे। इनका देहांत 1907 ई. में हुआ।
उपाधि: इन्हें पखावज का युग पुरुष कहा जाता है।
योगदान: इन्होंने सैकड़ों परणों की रचना की, जैसे गज परण, शिव तांडव परण, अश्व परण आदि।
शैलीगत विशेषताएँ:
वादन शैली में गांभीर्य, ओज और तैयारी की स्पष्टता।
परणों की क्लिष्टता, लंबाई और वैचित्र्य (24 आवृत्ति तक की परणें)।
हाथों की शुद्धता, ध्वनि एवं बोलों की स्पष्टता।
पाँच, सात, दस, बीस और चौबीस आवृत्तियों की परणों का विशेष वादन।
वीर रस की प्रधानता।
2. नाना पानसे घराना
संस्थापक: नाना पानसे (मूल नाम: नारायण थोरपे)। जन्म महाराष्ट्र के वाई तालुका के बावधन में हुआ। इन्होंने पुणे और काशी में शिक्षा प्राप्त की और योगिराज माधव स्वामी के पास 12 वर्ष तक रहे। बाद में इंदौर रियासत में आश्रय प्राप्त किया।
योगदान: गणितशास्त्र के आधार पर परणों का नवीनीकरण किया और सुदर्शन ताल की रचना की।
शैलीगत विशेषताएँ:
बाज अत्यंत सरल, मधुर और मुलायम है। यहाँ लंबी परणों और कठिन बोलों का प्रयोग नहीं किया जाता।
बंदिशें सरल होती हैं जिन्हें द्रुत लय में बजाना आसान होता है। रेला और चक्रदार का सुंदर प्रयोग।
सर्वप्रथम बंदिशों को ताल देकर साधा जाता है, लय सही होने पर ही साज छूने की अनुमति होती है।
त्र्यस्र जाति के परणों का बाहुल्य।
3. नाथद्वारा घराना
संस्थापक: राजस्थान के आमेर के पं. तुलसी। यह घराना श्रीनाथजी मंदिर के ध्रुपद-अंग संकीर्तन से जुड़ा है।
वंश परंपरा: पं. तुलसी के वंशज पं. रूपराम जयपुर दरबार के कलाकार बने। उनके पुत्र वल्लभदास 1802 ई. में नाथद्वारा आए। वल्लभदास के प्रपौत्र पं. घनश्याम दास ने मृदंग सागर पुस्तक को पूर्ण किया। वर्तमान में गुरु पुरुषोत्तम दास ने इस घराने का सफल विकास किया।
शैलीगत विशेषताएँ:
'टेटे' के स्थान पर 'किट' का अधिक प्रयोग (जैसे: धा किटतक, ता किटतक)।
वादन का प्रारंभ प्रायः गणेश वंदना, पंचदेव स्तुति या सरस्वती स्तुति परण से होता है।
स्तुति परण के पश्चात 'धिननक' का विशेष बोल बजाया जाता है।
4. अवधी घराना
उत्पत्ति: यह कुदऊ सिंह घराने की ही एक शाखा है।
प्रमुख कलाकार: कुदऊ सिंह के शिष्य मदन मोहन उपाध्याय और बाबा राम कुमार दास 1930 के आसपास अयोध्या आए। बाबा रामदास के शिष्य स्वामी भगवान दास और उनके शिष्य स्वामी रामशंकर दास 'पागल दास' ने इस घराने को विश्वव्यापी ख्याति दिलाई।
शैलीगत विशेषताएँ:
गणित द्वारा 'ता' और 'धा' के वादन में चमत्कार उत्पन्न करना।
बंदिशों की रचनाओं में साहित्यिक और काव्य पक्ष (स्तुतियाँ, कवित्त) पर विशेष ध्यान।
व्याख्यात्मक ढंग से बोलों की विशेषताओं को समझाते हुए वादन करना।
अभ्यास एवं मूल्यांकन
1. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
मृदंग सागर पुस्तक में किस घराने की बात कही गई है? उत्तर: (ख) नाथद्वारा घराना
मृदंग का सर्वप्रथम उल्लेख कहाँ मिलता है? उत्तर: (क) रामायण में पाया जाता है।
पखावज शब्द किन दो शब्दों से बना है? उत्तर: (ख) पख+आवज
'धिननक' बाज किस घराने की परंपरा रही है? उत्तर: (ख) नाथद्वारा
सुदर्शन ताल के रचयिता हैं — उत्तर: (क) नाना पानसे
2. सही और गलत कथन
1. अवनद्ध वाद्यों में मृदंग का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। (सही)
2. पखावज का प्राचीन नाम मृदंग था। (सही)
3. मिट्टी की मृदंग में गट्टे नहीं लगाये जाते थे। (सही)
4. पक्ष के शाब्दिक दो अर्थ हैं — भुजाएँ एवं वस्तु के दो छोर। (सही)
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