Sangeet: Class 12 (Book 1) — Chapter 6: कर्नाटक ताल-लिपि पद्धति की अवधारणा

परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो मुख्य शाखाएँ हैं: हिन्दुस्तानी संगीत (उत्तर भारतीय) और कर्नाटक संगीत (दक्षिण भारतीय)। दोनों ही पद्धतियों में ताल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, परंतु उनके नाम, संरचना और हाथ पर दर्शाने की विधियों में भिन्नता पाई जाती है।

ताल पद्धति का विकासक्रम

  • अष्टोत्तर शत (108) ताल पद्धति: प्राचीन काल में कर्नाटक संगीत में 108 तालों का प्रचलन था। यह पद्धति अत्यंत क्लिष्ट और जटिल थी, जिसके कारण कई तालों का व्यावहारिक प्रयोग लुप्त हो गया।
  • सूलादि सप्त ताल पद्धति: 14वीं शताब्दी में जटिल 108 ताल पद्धति को सरल बनाने के लिए एक नवीन पद्धति का उदय हुआ।
  • पं. पुरंदरदास का योगदान: दक्षिण भारतीय संगीत के महान विद्वान और वाग्गेयकार पं. पुरंदरदास ने जनरुचि के अनुसार सरल 'सूलादि' नामक संगीतमय रचनाओं का सृजन किया। इन रचनाओं में उन्होंने सात मुख्य तालों का प्रयोग किया, जिन्हें सूलादि सप्त ताल कहा जाता है। वर्तमान कर्नाटक संगीत के अधिकांश ताल इसी पद्धति पर आधारित हैं।
सूलादि सप्त ताल एवं उनके चिह्न

कर्नाटक संगीत के सात मूल तालों के नाम, उनके अंग-चिह्न और कुल अक्षरकाल (चतुरस्र जाति के आधार पर) निम्नलिखित तालिका में दिए गए हैं:

क्रमांकताल का नामचिह्न या अंगकुल अक्षरकाल
1ध्रुवI O I I14
2मठ्यI O I10
3रूपकO I06
4झम्पI U O07
5त्रिपुटI O O08
6अटI I O O12
7एकI04
ताल के षडांग (Six Angas of Tala)

भारतीय संगीत में ताल के दस प्राणों का विशेष महत्व है (काल, मार्ग, क्रिया, अंग, ग्रह, जाति, कला, लय, यति और प्रस्तार)। इनमें से 'अंग' प्राण के अंतर्गत ताल के छह अंगों का वर्णन मिलता है, जिन्हें षडांग कहा जाता है।

अणुद्रुतो द्रुतश्चैव लघुर्गुरु प्लुतस्तथा
काकपदम् तथा प्रोक्तं तालङ्गं मितिशविधिम्


भावार्थ: अणुद्रुत, द्रुत, लघु, गुरु, प्लुत और काकपाद - ये ताल के छह अंग कहलाते हैं।

षडांग विवरण तालिका

क्रमांकअंग का नामचिह्नअक्षरकाल
1अणुद्रुतU1
2द्रुतO2
3लघुI4 (जाति अनुसार परिवर्तनशील)
4गुरुऽ8
5प्लुतऽ॒12
6काकपाद+16

विशेष ध्यान दें: सूलादि सप्त तालों में केवल प्रथम तीन अंगों (अणुद्रुत, द्रुत, और लघु) का ही प्रयोग किया जाता है। शेष तीन अंगों का प्रयोग प्राचीन 108 ताल पद्धति में होता था।

अंगों को दर्शाने की हस्त क्रियाएँ (Kriyas)

  1. अणुद्रुत (U): यह सबसे छोटा अंग है। इसे केवल दाहिने हाथ की एक थाप (ताली) से दर्शाया जाता है।
  2. द्रुत (O): इसमें दो अक्षरकाल होते हैं। पहले अक्षरकाल पर हथेली से थाप दी जाती है और दूसरे पर हथेली को पलटकर (विक्षेप) दर्शाया जाता है।
  3. लघु (I): इसके अक्षरकाल जाति के अनुसार बदलते हैं। चतुरस्र जाति में इसके 4 अक्षरकालों को दर्शाने के लिए पहली मात्रा पर थाप दी जाती है और शेष तीन मात्राओं को क्रमशः कनिष्ठिका, अनामिका और मध्यमा उँगलियों को गिराकर गिना जाता है।
पंच जाति भेद (Five Jati Varieties)

संगीत मकरंद के अनुसार ताल के दस प्राणों में 'जाति' का स्थान छठा है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ताल के अंगों में केवल लघु (I) का मान ही जाति के अनुसार परिवर्तित होता है, शेष सभी अंग यथावत रहते हैं।

35 तालों का निर्माण: सप्त तालों में इन 5 जातियों के प्रयोग से कुल $7 \times 5 = 35$ तालों की उत्पत्ति होती है।

35 तालों की विस्तृत निर्देशिका
ताल का नाममूल चिह्नजाति भेदअक्षरकाल विभागकुल अक्षरकाल
ध्रुवI O I Iतिश्र3+2+3+311
चतुरश्र4+2+4+414
खण्ड5+2+5+517
मिश्र7+2+7+723
संकीर्ण9+2+9+929
मठ्यI O Iतिश्र3+2+38
चतुरश्र4+2+410
खण्ड5+2+512
मिश्र7+2+716
संकीर्ण9+2+920
रूपकO Iतिश्र3+25
चतुरश्र4+26
खण्ड5+27
मिश्र7+29
संकीर्ण9+211
झम्पI U Oतिश्र3+1+26
चतुरश्र4+1+27
खण्ड5+1+28
मिश्र7+1+210
संकीर्ण9+1+212
त्रिपुटI O Oतिश्र3+2+27
चतुरश्र4+2+28
खण्ड5+2+29
मिश्र7+2+211
संकीर्ण9+2+213
अटI I O Oतिश्र3+3+2+210
चतुरश्र4+4+2+212
खण्ड5+5+2+214
मिश्र7+7+2+218
संकीर्ण9+9+2+222
एकIतिश्र33
चतुरश्र44
खण्ड55
मिश्र77
संकीर्ण99
कर्नाटक सप्तताल स्वरूप की विशेषताएँ
अभ्यास एवं मूल्यांकन

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

  1. पं. पुरंदरदास किस संगीत पद्धति के विद्वान थे?
    उत्तर: वे दक्षिण भारतीय (कर्नाटक) संगीत पद्धति के विख्यात विद्वान और वाग्गेयकार थे।
  2. कर्नाटक संगीत में 'O' चिह्न क्या दर्शाता है?
    उत्तर: कर्नाटक संगीत में 'O' चिह्न द्रुत अंग को दर्शाता है, जिसका मान 2 अक्षरकाल होता है।
  3. मिश्र जाति में लघु का अक्षरकाल कितना होता है?
    उत्तर: मिश्र जाति में लघु का मान 7 अक्षरकाल होता है।
  4. सशब्द और निःशब्द क्रिया में क्या अंतर है?
    उत्तर: ताली देकर ध्वनि उत्पन्न करने वाली क्रिया को सशब्द क्रिया (जैसे शम्पा) कहते हैं, जबकि बिना आवाज के हाथ पलटने या उँगलियों पर गिनने की क्रिया को निःशब्द क्रिया (जैसे विक्षेप) कहते हैं।