Sangeet: Class 12 (Book 1) — Chapter 7: 7. जीवन परिचय

अध्याय 7: जीवन परिचय (प्रसिद्ध तबला, पखावज एवं मृदंगम वादक)

इस अध्याय में भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान तबला, पखावज और मृदंगम वादकों के जीवन, उनकी संगीत साधना, घरानों, शिष्यों और उनके ऐतिहासिक योगदान का विस्तृत परिचय दिया गया है।

1. पं. किशन महाराज (बनारस घराना)

  • जन्म व घराना: 3 सितंबर 1923 को बनारस के प्रतिष्ठित संगीतज्ञ परिवार में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि व गुरु: पिता लय भास्कर पं. हरि महाराज और चाचा/गुरु वाद्य शिरोमणि पं. कंठे महाराज थे।
  • वादन शैली: शुद्ध बनारस बाज का वादन। विषम प्रकृति के तालों और कठिन लयकारियों के प्रयोग में विशेष रुचि। उनके द्वारा प्रस्तुत उठान और पड़ाल बनारस बाज की पहचान बन गए।
  • फ़िल्मी योगदान: सत्यजीत रे की फ़िल्म 'नीचा नगर' (संगीतकार: पं. रवि शंकर), चेतन आनंद की 'आँधियाँ' (संगीत निर्देशक: उस्ताद अली अकबर खाँ), मज़हर खान की 'पहली नज़र' और 'बड़ी माँ' (सितारा देवी के नृत्य के साथ पखावज वादन)।
  • संगत व जुगलबंदी: शंभु महाराज, बिरजू महाराज, सितारा देवी, अलाउद्दीन खाँ, रवि शंकर, निखिल बनर्जी, शिवकुमार शर्मा आदि के साथ संगत की। 1960 के दशक में उत्तर भारत के उस्ताद अल्ला रक्खा और दक्षिण भारत के पालघाट शिवमणि व विक्कू विनायकराम के साथ सफल युगल वादन किया।
  • बहुमुखी प्रतिभा: वे एक अच्छे लेखक, कवि (उपनाम मलिक), चित्रकार, वक्ता और कार्यक्रम संयोजक भी थे।
  • सम्मान: संगीत सम्राट (प्रयाग संगीत समिति), ताल विलास (सुर सिंगार संसद), उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ सम्मान, पद्म श्री, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता।
  • प्रमुख शिष्य: पं. पूरन महाराज (पुत्र), नंदन मेहता, कुमार बोस, सुखविंदर सिंह नामधारी, कालीनाथ मिश्र, संदीप दास, अरविंद आज़ाद।
  • निधन: 4 मई 2008 को 84 वर्ष की आयु में।

2. पं. ज्ञान प्रकाश घोष

  • जन्म व पृष्ठभूमि: 8 मई 1909 को कोलकाता के एक बंगाली परिवार में हुआ। इनके पितामह द्वारकानाथ घोष प्रसिद्ध 'द्वारकिन हारमोनियम' के आविष्कारक थे।
  • शिक्षा व संगीत की ओर झुकाव: प्रेसीडेंसी कॉलेज से एम.ए. किया। फुटबॉल खेलते समय आँख में चोट लगने के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी और पूर्णतः संगीत में रम गए।
  • गुरु परंपरा: गायन की शिक्षा पं. गिरिजा शंकर चक्रवर्ती, मो. सगीर खाँ और मो. दबीर खाँ से ली। तबला वादन की शिक्षा उस्ताद मसीत खाँ (फर्रूखाबाद घराना) और उस्ताद फ़िरोज़ खाँ (पंजाब घराना) से प्राप्त की।
  • आकाशवाणी व रचनाएँ: आकाशवाणी कोलकाता में 15 वर्ष तक प्रोड्यूसर रहे। 'रामायण गीति' कार्यक्रम तैयार किया। पखावज, तबला, कथक और तराना पर आधारित उनकी संगीत संरचना चतुरंग अत्यंत लोकप्रिय हुई।
  • अंतर्राष्ट्रीय योगदान: अमेरिका की पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में अध्यापन किया। सौरव एकेडमी ऑफ़ म्यूज़िक की स्थापना की और ड्रम्स ऑफ़ इंडिया के नाम से प्रसिद्ध कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
  • प्रमुख शिष्य: गायन में पं. प्रसून बनर्जी, पं. अजय चक्रवर्ती; तबला वादन में पं. निखिल घोष, पं. शंकर घोष, पं. अनिन्दो चटर्जी, पं. विक्रम घोष, अभिजीत बनर्जी।
  • सम्मान: डी.लिट्. (रवींद्र भारती व वर्धमान विश्वविद्यालय), देशिकोत्तम (विश्वभारती का सर्वोच्च सम्मान), संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता, तानसेन सम्मान, पद्म भूषण।
  • निधन: 18 फरवरी 1997।

3. उस्ताद लतीफ़ अहमद खाँ (दिल्ली घराना)

  • जन्म व घराना: 1942 में दिल्ली घराने के प्रतिष्ठित संगीतकार परिवार में हुआ। इनके पिता उस्ताद मोहम्मद बरूश खाँ प्रसिद्ध सारंगी वादक थे।
  • गुरु: दिल्ली घराने के खलीफ़ा उस्ताद गामा खाँ, उस्ताद मन्नू खाँ (चाचा) और उस्ताद इनाम अली खाँ।
  • प्रसिद्धि: 1958 में मात्र 16 वर्ष की आयु में मुंबई के संगीत समारोह में अपने प्रभावशाली वादन से रातों-रात प्रसिद्ध हुए। इन्हें अल्लाहवाला के नाम से भी जाना जाता था।
  • वादन विशेषता: गायन, वादन और नर्तन तीनों की संगत में महारत। दिल्ली के शुद्ध बाज के साथ-साथ अन्य घरानों की बंदिशों का भी साधिकार वादन करते थे।
  • ताल रचना: इन्होंने 5¼ (सवा पाँच) मात्रा की लतीफ़ ताल और 5½ (साढ़े पाँच) मात्रा की ताल की रचना की।
  • वादन तकनीक: दो उँगलियों के 'तिट' और 'तिरकिट' वादन में बेजोड़ थे। वे अपने बायें (डग्गे) को भी दाहिने तबले के स्वर में मिलाते थे। दायाँ तबला ऊपर के 'सा' में और बायाँ नीचे के 'सा' में बोलता था।
  • निधन: 29 अगस्त 1989 को मात्र 48 वर्ष की आयु में।

4. राजा छत्रपति सिंह जू देव (पखावज वादक)

  • जन्म व पृष्ठभूमि: 1919 में मध्य प्रदेश के विजना राजपरिवार में हुआ। इनके पिता राजा हिम्मत सिंह और पितामह राजा मुकुंद सिंह संगीत प्रेमी थे।
  • गुरु: वरिष्ठ पखावजी स्वामी रामदास से पखावज की शिक्षा प्राप्त की।
  • योगदान: नीरस कहे जाने वाले पखावज वाद्य को अपनी लंबी लमछड़ परणों, कठिन तिहाइयों और चमत्कृत करने वाली लयकारियों से जनप्रिय बनाया।
  • रचित नवीन तालें:
    ताल का नाममात्रा संख्या
    ताल चंद्र चूड़ामणि19 मात्रा
    सूर्य मणि13 मात्रा
    धमार सादरा ताल24 मात्रा
    सादरा ताल22 मात्रा
    पंचानन ताल19 मात्रा
    सादरांक ताल (शक्ति धर)19 मात्रा
    चतुरानन ताल15 मात्रा
    कुमुद प्रभा ताल (स्व. राजीव गाँधी की स्मृति में)20 मात्रा
  • प्रमुख शिष्य: अखिलेश गुंडेचा, चित्रांगना आग्ले (रेशवाल), प्रवीण आर्य, सुंदर लाल, अनीस कुमार।
  • सम्मान: 'प्रोफ़ेसर ऑफ़ पखावज' (पं. ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा, 1951), ताल विलास, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी का रत्न सदस्यता सम्मान, केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी सम्मान (1991)।
  • निधन: 1998 में अपने गृह नगर विजना में।

5. गुरु पुरुषोत्तम दास (नाथद्वारा परंपरा)

  • जन्म व पृष्ठभूमि: 7 जुलाई 1907 को राजस्थान की तीर्थस्थली श्री नाथद्वारा में हुआ।
  • गुरु: इनके पिता पं. घनश्याम दास पखावजी थे, जो पुष्टिमार्गीय संगीत के प्रमुख गुरु थे।
  • ग्रंथ रचना: इन्होंने पखावज वादन पर आधारित अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक मृदंग सागर की रचना की।
  • शिक्षण कार्य: 1956 में दिल्ली के श्रीराम भारतीय कला केंद्र और 1964 में कथक केंद्र में पखावज के गुरु पद पर रहे।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रचार: नेपाल, पाकिस्तान, जापान, सोवियत संघ और श्रीलंका की यात्राएँ कर पखावज वादन की नाथद्वारा परंपरा को विश्व स्तर पर स्थापित किया।
  • सम्मान: साहित्य कला परिषद सम्मान, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नाना पानसे सम्मान, स्वाति तिरुनल ध्रुपद पुरस्कार, पद्म श्री।
  • निधन: 21 जनवरी 1991 को नाथद्वारा में।

6. स्वामी पागल दास (पखावज एवं तबला)

  • जन्म व वास्तविक नाम: 15 अगस्त 1920 को हुआ। इनका वास्तविक नाम पं. राम शंकर 'पागल दास' था।
  • गुरु: बाबू नेपाल सिंह (तबला), बाबा भगवान दास (पखावज) और संत शरण 'मस्त' (काव्य रचना)।
  • नामकरण: संत शरण 'मस्त' के सुझाव पर इन्होंने अपना नाम 'पागल दास' रख लिया। उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के कहने पर इन्होंने अपना पूरा ध्यान पखावज पर केंद्रित किया।
  • रचित तालें: भगवान ताल, मोहिनी ताल, पुराण ताल, नक्षत्र ताल, शिवलीला ताल, त्रिलोचन ताल, पंचानन ताल, जानकी ताल, ठाकुर ताल।
  • ग्रंथ व संपादन: तबला कौमुदी (तीन भाग) और मृदंग तबला प्रभाकर (दो भाग) नामक पुस्तकें लिखीं। संगीत पत्रिका के 'मृदंग अंक' का संपादन किया।
  • प्रमुख शिष्य: रामकिशोर दास, डॉ. राज खुशीराम, राजकुमार झा, संजय आग्ले, जगदंबा प्रसाद, चम्पू महाराज।
  • सम्मान: मृदंग केसरी, मृदंग मार्तंड, ताल विलास, कला आचार्य, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार।
  • निधन: 21 जनवरी 1997।

7. उस्ताद करामतुल्लाह खाँ (फर्रूखाबाद घराना)

  • जन्म व घराना: 1918 में उत्तर प्रदेश के रामपुर शहर में हुआ। ये फर्रूखाबाद घराने के थे।
  • वंश: पिता उस्ताद मसीतउल्लाह खाँ (मसीत खाँ) और पितामह उस्ताद नन्हें खाँ थे।
  • वादन विशेषता: इनकी मुख्य विशेषता साफ़-सुथरी संगत थी। ये गायन और तंत्र-सुषिर वाद्यों की संगत के लिए विशेष रूप से लोकप्रिय थे।
  • प्रमुख शिष्य: पं. नरेंद्र घोष, शंख चटर्जी, अमर डे, कमलेश चक्रवर्ती, कन्हाई दत्त। इनके सुयोग्य पुत्र उस्ताद साबिर हुसैन भी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वादक हैं।
  • निधन: 3 दिसंबर 1977।

8. उस्ताद आफ़ाक हुसैन (लखनऊ घराना)

  • जन्म व घराना: 1930 में लखनऊ घराने के प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। इनके पिता उस्ताद वाजिद हुसैन थे।
  • वादन विशेषता: ये चतुर्मुखी ताबलिक थे, अर्थात गायन, वादन, नृत्य की संगत और स्वतंत्र वादन चारों में निपुण थे। ये लखनऊ घराने के अंतिम खलीफ़ा थे।
  • विदेश यात्राएँ: 1962 में अफ़गानिस्तान, 1985 में पेरिस भारत महोत्सव और फ्रांस की स्टार यूनिवर्सिटी में तबला वादन की शिक्षा देने गए।
  • निधन: 14 फरवरी 1990 को लखनऊ में।

9. उमयालपुरम् के. शिवरामन (मृदंगम वादक)

  • जन्म व पृष्ठभूमि: 17 दिसंबर 1935 को कर्नाटक में हुआ। इनके पिता पी. काशी विश्वनाथ अय्यर और माता कमलाम्बल थीं।
  • गुरु: अरूपति नटेस अय्यर, तंजावुर वैद्यनाथ अय्यर, पालघाट मणि अय्यर और कुंभकोणम रंग आयंगर के सानिध्य में 15 वर्षों तक गुरुकुल प्रणाली के तहत शिक्षा प्राप्त की।
  • शिक्षा: संगीत के साथ-साथ इन्होंने बी.ए. और एलएल.बी. की उपाधि भी प्राप्त की।
  • योगदान: कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों संगीत पद्धतियों के शीर्ष कलाकारों (जैसे पं. रवि शंकर, हरिप्रसाद चौरसिया, जाकिर हुसैन) के साथ संगत की। इन्होंने 'म्यूज़िकल एक्सीलेंस ऑफ़ मृदंगम' पुस्तक लिखी।
  • सम्मान: पद्म श्री (1988), पद्म भूषण (2003), पद्म विभूषण (2010), संगीत कलानिधि (2001)।

10. पालघाट मणि अय्यर (मृदंगम वादक)

  • जन्म व पृष्ठभूमि: 12 जून 1912 को केरल के पालघाट जनपद के पझायनूर में हुआ।
  • गुरु: पिता शेषम भगवतार और तंजावुर वैद्यनाथ अय्यर।
  • क्रांतिकारी परिवर्तन: मणि अय्यर के आने से पहले मृदंगम केवल ताल रखने का साधन माना जाता था। इन्होंने मृदंगम को मुख्य कलाकार के संगीत के साथ संवाद करने वाले एक स्वतंत्र वाद्य के रूप में स्थापित किया।
  • निधन: 30 मई 1981 को।

अभ्यास एवं सुमेलन (Exercises)

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के आधार पर महत्वपूर्ण सुमेलन तालिका नीचे दी गई है:

वाद्य यंत्रप्रसिद्ध कलाकार
घटम्विक्कू विनायकम्
मृदंगम्पालघाट मणि अय्यर
तबलाकरामतुल्ला खाँ
पखावजपागल दास / पुरुषोत्तम दास