Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 1: भारतीय संगीत का इतिहास

1. वैदिक काल से तेरहवीं शताब्दी (प्राचीन युग)

भारतीय संगीत के इतिहास को तीन मुख्य कालखंडों में विभाजित किया गया है:

  • प्राचीन युग: वैदिक काल से प्रारंभ होकर 1200 ई. तक।
  • मध्य युग: 1201 ई. से 1800 ई. तक।
  • आधुनिक युग: 1801 ई. से वर्तमान समय तक।

वैदिक कालीन संगीत एवं वेदों का महत्व

वैदिक काल में संगीत को अत्यधिक पवित्र और उच्च स्थान प्राप्त था। चारों वेदों में संगीत का विस्तृत वर्णन मिलता है:

  • ऋग्वेद: यह देवों की स्तुति एवं प्रशंसात्मक ऋचाओं का संग्रह है। इसमें संगीत के लिए गीति, गाथा, साम, गीर, गात तथा गायत्र शब्दों का प्रयोग हुआ है। इस काल के प्रमुख वाद्यों में वाण (शत-तंत्री वीणा), कर्करि, क्षौणी, गर्गर (अवनद्ध वाद्य), भूमि दुन्दुभि तथा सुषिर वाद्यों में नाड़ी प्रमुख थे।
  • यजुर्वेद: इसमें यज्ञ-याग के अवसरों पर प्रयुक्त होने वाले मंत्रों का संकलन है। यजुर्वेद के मंत्र गद्यात्मक थे और इन्हें अत्यंत धीमी आवाज में उच्चारित किया जाता था। इसमें सर्वप्रथम वीणा शब्द का उल्लेख मिलता है। ऋतुओं के अनुसार साम गान का विधान था (जैसे वसंत में रथन्तर साम, ग्रीष्म में वृहत्साम, वर्षा में वैरूप साम)।
  • अथर्ववेद: इसमें कल्याणकारी एवं तांत्रिक मंत्रों के साथ-साथ लोक-लौकिक गीतों (जैसे गाथा, रैभी, नाराशंसी) का वर्णन है। इसमें कर्करी और आघाट वाद्यों की ध्वनि का उल्लेख है।
  • सामवेद: इसे भारतीय संगीत का मूल आधार और प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है। ऋग्वेद की ऋचाओं को ही सामवेद में संगीतमय रूप में संकलित किया गया है। सामवेद के दो मुख्य भाग हैं: आर्चिक (ऋचाओं का संग्रह) और गान (ऋचाओं को गाए जाने का निर्देश)।

साम्नों गतिरिति। स्वर इति होवाच।


भावार्थ / विश्लेषण: स्वर से ही साम की गति निर्दिष्ट होती है। सामवेद में स्वरों के विकास क्रम को दर्शाया गया है। प्रारंभ में एक स्वर से गान को आर्चिक, दो स्वरों के गान को गाथिक तथा तीन स्वरों के गान को सामिक कहा जाता था।

सामगान के तीन मुख्य स्वर थे: उदात्त (उच्च), अनुदात्त (नीच) और स्वरित (मध्यम)। नारदीय शिक्षा के अनुसार साम के सात स्वरों को यम कहा जाता था, जो अवरोही क्रम में थे:

  1. क्रुष्ट (सबसे ऊँचा स्वर)
  2. प्रथम
  3. द्वितीय
  4. तृतीय
  5. चतुर्थ
  6. मन्द्र
  7. अतिस्वार्य

रामायण एवं महाभारत काल में संगीत

  • रामायण काल: रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में की गई। इसमें संगीत को गांधर्व कहा गया है। लव और कुश ने मार्गी संगीत के नियमों के अनुसार रामचरित का गान किया था। इस काल में वाद्यों को सामान्य रूप से आतोद्य कहा जाता था। सुंदरकांड में विपंची वीणा का उल्लेख मिलता है। युद्ध के समय दुन्दुभि, भेरी, पटह, पणव और शंख का प्रयोग होता था।
  • महाभारत काल: महाभारत की रचना कृष्ण द्वैपायन व्यास द्वारा की गई। इस काल में संगीत को गांधर्व शास्त्रम् कहा गया। गांधर्व गान के प्रसिद्ध गायक अतिवाहु, हूहू, हाहा और तुम्बुरु थे। अर्जुन ने विराट नगर में वृहन्नला के रूप में राजकुमारी उत्तरा को संगीत और नृत्य की शिक्षा दी थी। युद्ध के समय सैनिकों के उत्साहवर्धन हेतु आनक और गोमुख जैसे वाद्यों का प्रयोग किया जाता था।

नाट्यशास्त्र (भरत मुनि)

ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से चौथी शताब्दी के मध्य रचित नाट्यशास्त्र भारतीय कलाओं का महाकोश है। इसके 36 अध्यायों में से 28वें से 33वें अध्याय तक संगीत विषयक सामग्री है।

  • वाद्यों का वर्गीकरण: भरत मुनि ने वाद्यों को सर्वप्रथम चार वर्गों में विभाजित किया:
    1. तत (तार वाले वाद्य, जैसे वीणा)
    2. अवनद्ध (चमड़े से मढ़े वाद्य, जैसे मृदंग)
    3. घन (धातु के वाद्य, जैसे मंजीरा)
    4. सुषिर (हवा से बजने वाले वाद्य, जैसे बाँसरी)
  • कुतप (वाद्यवृन्द): वाद्यों के सामूहिक प्रयोग को कुतप कहा जाता था।
  • ग्राम एवं जाति वर्गीकरण: भरत काल में दो मुख्य ग्राम प्रचलित थे - षड्ज ग्राम और मध्यम ग्राम। इनसे कुल 18 जातियों की उत्पत्ति हुई (षड्ज ग्राम से 7 और मध्यम ग्राम से 11)।
  • जाति के दशविध लक्षण: ग्रह, अंश, तार, मन्द्र, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, षाडवत्व और औडवत्व।

ग्रहाशौ तारमन्द्रौ च न्यासोपन्यास एवं च। अल्पत्वं च बहुत्वं च षाडवौडविते तथा।।


भावार्थ / विश्लेषण: यह श्लोक जाति गायन के दस लक्षणों को निरूपित करता है, जो आधुनिक रागों के लक्षणों (जैसे वादी, संवादी, न्यास आदि) के पूर्वज हैं।

बृहद्देशी (मतंग मुनि)

सातवीं-आठवीं शताब्दी में मतंग मुनि द्वारा रचित बृहद्देशी ग्रंथ में सर्वप्रथम राग शब्द की स्पष्ट परिभाषा मिलती है:

राग की परिभाषा: वह विशेष ध्वनि जो स्वरों एवं वर्णों से विभूषित हो तथा श्रोताओं के चित्त का रंजन करे, 'राग' कहलाती है।

  • मतंग ने संगीत को दो श्रेणियों में विभाजित किया: मार्गी संगीत (कड़े नियमों से बंधा) और देशी संगीत (लोक-रुचि के अनुसार जन-मन रंजन हेतु)।
  • इन्होंने सात स्वर-आश्रित गीतियों का उल्लेख किया: शुद्धा, भिन्ना, गौड़ी, रागगीति, साधारणी, भाषा गीति और विभाषा गीति।
  • इन्होंने द्वादश स्वर मूर्च्छना का प्रतिपादन किया, जिसमें सात स्वरों के साथ पाँच अन्य स्वरों को मिलाकर 12 स्वरों का सप्तक बनाया गया।
2. चौदहवीं शताब्दी से वर्तमान काल (मध्य युग एवं आधुनिक युग)

मध्यकालीन महत्वपूर्ण ग्रंथ

  • संगीत रत्नाकर (शार्ङ्गदेव): रचना काल 1210 ई. से 1247 ई. के मध्य। इसे 'सप्ताध्यायी' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सात अध्याय हैं (स्वरगत, रागविवेक, प्रकीर्णक, प्रबन्ध, ताल, वाद्य, नर्तन)। शार्ङ्गदेव ने संगीत की परिभाषा दी: "गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते।"
  • स्वरमेलकलानिधि (रामामात्य): 1550 ई. में रचित यह ग्रंथ कर्नाटक संगीत पद्धति का आधार है। इसमें नाद के तीन प्रकार (मन्द्र, मध्य, तार) और पाँच उप-प्रकार माने गए हैं।
  • राग तरंगिणी (पंडित लोचन): इस ग्रंथ में सर्वप्रथम थाट-राग वर्गीकरण पद्धति का उदय हुआ। लोचन ने 12 थाटों के अंतर्गत 75 रागों का वर्गीकरण किया। इनका शुद्ध थाट आधुनिक काफी थाट के समान था।
  • चतुर्दण्डिप्रकाशिका (व्यंकटमखी): रचना काल लगभग 1640-1650 ई.। यह दक्षिणी संगीत पद्धति का आधार ग्रंथ है, जिसमें 72 मेलकर्ताओं (थाटों) का आविष्कार किया गया।
  • संगीत पारिजात (अहोबल): रचना काल लगभग 1650 ई.। इसमें वीणा के तार की लंबाई पर 12 स्वरों की स्थापना की वैज्ञानिक विधि दी गई है। इनका शुद्ध स्वर-सप्तक आधुनिक काफी मेल के समान था।
  • राधा गोविंद संगीत सार: जयपुर नरेश सवाई प्रताप सिंह के काल (1779-1804 ई.) में चार विद्वानों द्वारा रचित। इसमें 7 अध्यायों में स्वर, वाद्य, नृत्य, प्रकीर्ण, प्रबन्ध, ताल और राग का विस्तृत विवेचन है।

आधुनिक युग के ग्रंथ एवं विकास (1801 से वर्तमान)

  • नग़माते आसफ़ी (मोहम्मद रज़ा, 1813 ई.): इन्होंने प्राचीन राग-रागिनी पद्धति को अनुपयोगी ठहराकर 6 राग और 36 रागिनियों की नई पद्धति दी। सर्वप्रथम मोहम्मद रज़ा ने ही काफी के स्थान पर बिलावल को शुद्ध सप्तक के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  • संगीत राग कल्पद्रुम (कृष्णानंद व्यास, 1842 ई.): इसमें हजारों ध्रुपद, ख्याल और अन्य गीतों का संकलन है, परंतु स्वरलिपि नहीं दी गई है।
  • मआदुनुल मूसीकी (हकीम मोहम्मद करम इमाम, 1854 ई.): इस ग्रंथ में तत्कालीन संगीत, घरानों, कलाकारों और उनके आश्रयदाता राजाओं का सविस्तार वर्णन है।
  • पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का योगदान: बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में इन्होंने अभिनव राग मंजरी और श्रीमल्लक्ष्यसंगीतम जैसे संस्कृत ग्रंथों की रचना की। इन्होंने 22 श्रुतियों पर स्वरों की स्थापना करते हुए प्रथम श्रुति पर स्वर स्थापित किया, जिससे बिलावल शुद्ध थाट बना। इन्होंने 200 रागों को 10 थाटों (बिलावल, कल्याण, भैरव, काफी, आसावरी, मारवा, खमाज, पूर्वी, तोड़ी, भैरवी) में वर्गीकृत किया।
  • पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर का योगदान: इन्होंने नई स्वरलिपि पद्धति का निर्माण किया और संगीत बाल प्रकाश, बाल बोध, महिला संगीत, टप्पा गायन आदि पुस्तकें लिखीं।
3. घरानों का उद्भव एवं विकास

शास्त्रीय संगीत में 'घराना' गायकी या वादन की एक विशिष्ट शैली को दर्शाता है, जो कम से कम तीन पीढ़ियों तक गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से प्रवाहित होती है। मध्यकाल में ध्रुपद की चार बानियाँ थीं: गौड़हार, खंडार, नौहार और डागुर। आधुनिक काल में ख्याल गायकी के प्रमुख घराने निम्नलिखित हैं:

प्रमुख ख्याल घराने एवं उनकी विशेषताएँ

  • ग्वालियर घराना: इसे सभी घरानों का मूल माना जाता है। इसके जन्मदाता नत्थन पीर बख्श, हद्दू खाँ और हस्सू खाँ थे।
    • विशेषताएँ: ध्रुपद अंग का ख्याल, खुली और जोरदार आवाज, बलपेच की तानें, टप्पा अंग की तानें, और बोल-तानों में लयकारी।
    • प्रमुख कलाकार: बालकृष्ण बुआ इचलकरंजीकर, ओंकारनाथ ठाकुर, विनायक राव पटवर्धन, कुमार गंधर्व।
  • आगरा घराना: इसकी शुरुआत अकबर के दरबारी गायक हाजी सुजान खाँ से मानी जाती है। इसे श्यामरंग और सरसरंग ने सुदृढ़ किया।
    • विशेषताएँ: नोम-तोम का आलाप, खुली आवाज में गाना, ध्रुपद-धमार का प्रभाव, दमदार गमक और खड़ी तानों का प्रयोग।
    • प्रमुख कलाकार: फैयाज खाँ (प्रेमपिया), विलायत हुसैन खाँ (प्राणपिया), भास्कर बुआ बाखले।
  • किराना घराना: इसके संस्थापक प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बंदे अली खाँ माने जाते हैं।
    • विशेषताएँ: स्वर उच्चारण में अत्यधिक भावुकता, एक-एक स्वर को लेकर बढ़त करना (खरज भरना), मींड और कण का अधिक प्रयोग, रस प्रधान गायकी।
    • प्रमुख कलाकार: अब्दुल करीम खान, सवाई गंधर्व, भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, हीराबाई बड़ोदेकर।
  • पटियाला घराना: इसके प्रवर्तक अली बख्श (अलिया) और फत्तेह अली (फत्तू) थे, जिन्हें 'जनरैल' और 'कर्नैल' की उपाधि मिली थी।
    • विशेषताएँ: गले की अद्भुत तैयारी, अलंकारिक व वक्र तानें, पंजाब अंग की ठुमरी गाने में विशेष प्रवीणता।
    • प्रमुख कलाकार: बड़े गुलाम अली खाँ, मुनव्वर अली खाँ, अजय चक्रवर्ती, कौशिकी चक्रवर्ती।
  • जयपुर-अत्रौली घराना: इसके संस्थापक उस्ताद अल्लादिया खाँ थे।
    • विशेषताएँ: मध्यम-विलंबित लय (अति-विलंबित नहीं), वक्र तानें, ध्रुपद और ख्याल का सुंदर सम्मिश्रण, ठुमरी गायन का निषेध।
    • प्रमुख कलाकार: केसरबाई केरकर, मोंगूबाई कुर्डीकर, मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर।
  • रामपुर-सहसवान घराना: इसकी स्थापना नेमत खाँ 'सदारंग' के शिष्यों या तानसेन के वंशज वजीर खाँ द्वारा मानी जाती है।
    • विशेषताएँ: ख्याल गायकी के आठ अंगों का प्रदर्शन, तराना गायन की अनूठी शैली, टप्पा शैली का प्रभाव।
    • प्रमुख कलाकार: मुश्ताक हुसैन खाँ, निसार हुसैन खाँ, राशिद खाँ।
  • भिंडी बाज़ार घराना: इसके प्रवर्तक बिजनौर के उस्ताद दिलावर खाँ के पुत्र थे। इसे अमान अली खाँ ने प्रसिद्धि दिलाई।
    • विशेषताएँ: मींड के साथ स्वरों को जोड़ना, जटिल सरगम तानें, बोल-बनाव और मधुर गमक।
    • प्रमुख कलाकार: अंजनी बाई मालपेकर, लता मंगेशकर (पार्श्व गायिका)।
  • दिल्ली घराना: इसके आधुनिक संस्थापक कुतूब बख्श (तानरस खाँ) थे।
    • विशेषताएँ: राग की शुद्धता, स्पष्ट उच्चारण, 'सवाल-जवाब' की तानें, विविध लयकारियाँ।
    • प्रमुख कलाकार: चाँद खाँ, मम्मन खाँ।
  • इन्दौर घराना: इसके प्रवर्तक उस्ताद अमीर खाँ थे।
    • विशेषताएँ: झूमरा ताल में अति-विलंबित ख्याल, मेरूखंड पद्धति से जटिल तानों का निर्माण, तबले की कम लयकारी।
    • प्रमुख कलाकार: पंडित अमरनाथ, सिंह बंधु।
  • बनारस घराना: यह घराना ख्याल के साथ-साथ ठुमरी, टप्पा, कजरी, चैती और भजनों के लिए विश्वविख्यात है।
    • प्रमुख कलाकार: सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी, पंडित राजन-साजन मिश्र।
4. संगीत में शिक्षण संस्थाओं का विकास

प्राचीन काल में संगीत की शिक्षा गुरु-शिष्य परंपरा के तहत गुरुकुलों में दी जाती थी। मध्यकाल में यह राज-दरबारों तक सीमित हो गई। आधुनिक काल में संगीत को जन-साधारण तक पहुँचाने के लिए संस्थागत शिक्षण की शुरुआत हुई:

वर्षसंस्था का नामसंस्थापक / स्थान
1871संगीत विद्यालयक्षेत्र मोहन गोस्वामी (कोलकाता)
1874भारत गायन समाजभास्कर बुआ बाखले (पुणे)
1875सितार संस्थापन्नालाल गोसाई
1886बालक गायन समाजबड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़
1887गायन उत्तेजक मंडलीमुंबई
1901गांधर्व महाविद्यालयपंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर (लाहौर)
1908गांधर्व महाविद्यालय (शाखा)मुंबई
1913आर्य संगीत विद्यालयअब्दुल करीम खाँ (पुणे)
1914गांधर्व संगीत महाविद्यालयकृष्णराव शंकर पंडित (ग्वालियर)