भारतीय संगीत के इतिहास को तीन मुख्य कालखंडों में विभाजित किया गया है:
वैदिक काल में संगीत को अत्यधिक पवित्र और उच्च स्थान प्राप्त था। चारों वेदों में संगीत का विस्तृत वर्णन मिलता है:
साम्नों गतिरिति। स्वर इति होवाच।
भावार्थ / विश्लेषण: स्वर से ही साम की गति निर्दिष्ट होती है। सामवेद में स्वरों के विकास क्रम को दर्शाया गया है। प्रारंभ में एक स्वर से गान को आर्चिक, दो स्वरों के गान को गाथिक तथा तीन स्वरों के गान को सामिक कहा जाता था।
सामगान के तीन मुख्य स्वर थे: उदात्त (उच्च), अनुदात्त (नीच) और स्वरित (मध्यम)। नारदीय शिक्षा के अनुसार साम के सात स्वरों को यम कहा जाता था, जो अवरोही क्रम में थे:
ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से चौथी शताब्दी के मध्य रचित नाट्यशास्त्र भारतीय कलाओं का महाकोश है। इसके 36 अध्यायों में से 28वें से 33वें अध्याय तक संगीत विषयक सामग्री है।
ग्रहाशौ तारमन्द्रौ च न्यासोपन्यास एवं च। अल्पत्वं च बहुत्वं च षाडवौडविते तथा।।
भावार्थ / विश्लेषण: यह श्लोक जाति गायन के दस लक्षणों को निरूपित करता है, जो आधुनिक रागों के लक्षणों (जैसे वादी, संवादी, न्यास आदि) के पूर्वज हैं।
सातवीं-आठवीं शताब्दी में मतंग मुनि द्वारा रचित बृहद्देशी ग्रंथ में सर्वप्रथम राग शब्द की स्पष्ट परिभाषा मिलती है:
राग की परिभाषा: वह विशेष ध्वनि जो स्वरों एवं वर्णों से विभूषित हो तथा श्रोताओं के चित्त का रंजन करे, 'राग' कहलाती है।
शास्त्रीय संगीत में 'घराना' गायकी या वादन की एक विशिष्ट शैली को दर्शाता है, जो कम से कम तीन पीढ़ियों तक गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से प्रवाहित होती है। मध्यकाल में ध्रुपद की चार बानियाँ थीं: गौड़हार, खंडार, नौहार और डागुर। आधुनिक काल में ख्याल गायकी के प्रमुख घराने निम्नलिखित हैं:
प्राचीन काल में संगीत की शिक्षा गुरु-शिष्य परंपरा के तहत गुरुकुलों में दी जाती थी। मध्यकाल में यह राज-दरबारों तक सीमित हो गई। आधुनिक काल में संगीत को जन-साधारण तक पहुँचाने के लिए संस्थागत शिक्षण की शुरुआत हुई:
| वर्ष | संस्था का नाम | संस्थापक / स्थान |
|---|---|---|
| 1871 | संगीत विद्यालय | क्षेत्र मोहन गोस्वामी (कोलकाता) |
| 1874 | भारत गायन समाज | भास्कर बुआ बाखले (पुणे) |
| 1875 | सितार संस्था | पन्नालाल गोसाई |
| 1886 | बालक गायन समाज | बड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ |
| 1887 | गायन उत्तेजक मंडली | मुंबई |
| 1901 | गांधर्व महाविद्यालय | पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर (लाहौर) |
| 1908 | गांधर्व महाविद्यालय (शाखा) | मुंबई |
| 1913 | आर्य संगीत विद्यालय | अब्दुल करीम खाँ (पुणे) |
| 1914 | गांधर्व संगीत महाविद्यालय | कृष्णराव शंकर पंडित (ग्वालियर) |