Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 2: हमारे प्राचीन ग्रंथ

संगीत रत्नाकर (Sangeet Ratnakar)

पंडित शार्ङ्गदेव द्वारा रचित ग्रंथ संगीत रत्नाकर को हिंदुस्तानी और कर्नाटक दोनों संगीत पद्धतियों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। तेरहवीं शताब्दी में रचित इस ग्रंथ में संगीत के क्रियात्मक और सैद्धांतिक दोनों पक्षों का विस्तृत विवेचन किया गया है।

लेखक परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • वंश परंपरा: पंडित शार्ङ्गदेव के दादा भास्कर तथा पिता सोढल कश्मीर के निवासी थे, जो बाद में देवगिरी (आधुनिक दौलताबाद) आकर बस गए।
  • राजकीय सेवा: शार्ङ्गदेव देवगिरी के राजा के यहाँ कोषाधिकारी के पद पर कार्यरत थे।
  • बहुमुखी प्रतिभा: वे संस्कृत और तमिल भाषा के प्रकांड विद्वान होने के साथ-साथ आयुर्वेद के भी ज्ञाता थे।

ग्रंथ की संरचना (सप्ताध्यायी)

संगीत रत्नाकर को सप्ताध्यायी भी कहा जाता है क्योंकि इसमें कुल सात अध्याय हैं:

  1. स्वरगताध्याय: नाद, श्रुति, स्वर, ग्राम, मूर्च्छना, तान, वर्ण, अलंकार और जाति का विवेचन। इसमें मानव शरीर की संरचना और आध्यात्मिक दस चक्रों का वर्णन पिण्डोत्पत्ति प्रकरण के अंतर्गत किया गया है।
  2. रागविवेकाध्याय: रागों का वर्गीकरण (मार्ग और देशी राग)। इसमें दशविधरागवर्गीकरण के अंतर्गत 264 रागों का वर्णन है।
  3. प्रकीर्णकाध्याय: मनोधर्म संगीत, रागालाप्ति, रूपकालाप्ति, गायक के गुण-दोष तथा वाग्गेयकार (उत्कृष्ट रचनाकार) के लक्षणों का वर्णन।
  4. प्रबन्धाध्याय: गान के दो रूपों— निबद्ध गान (प्रबंध, वस्तु, रूपक) और अनिबद्ध गान (आलाप) का विवेचन।
  5. तालाध्याय: ताल की परिभाषा, 5 मार्ग ताल, 120 देशी ताल तथा ताल के दस प्राणों (तालदशप्राण) का वर्णन।
  6. वाद्याध्याय: वाद्यों का चतुर्विध वर्गीकरण (तत, सुषिर, अवनद्ध, घन)।
  7. नर्तनाध्याय: नृत्य विधाओं, शैलियों, अंग-भंगिमाओं, भाव प्रदर्शन और रस सिद्धांत का विस्तृत विवेचन।

महत्वपूर्ण संगीत सिद्धांत

  • तौर्यत्रिक: गीत, वाद्य और नृत्य के सम्मिलित रूप को तौर्यत्रिक कहा गया है।
  • नाद की उत्पत्ति: नाभि से प्राण और अग्नि (ऊर्जा) के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है, जो कंठध्वनि के माध्यम से प्रकट होकर 22 श्रुतियों और स्वरों में परिवर्तित होती है।
  • मार्ग और देशी संगीत: ब्रह्मा आदि देवों द्वारा खोजा गया संगीत मार्ग संगीत है, तथा लोक रुचि के अनुसार विकसित संगीत देशी संगीत कहलाता है।
संगीत पारिजात (Sangeet Parijat)

सत्रहवीं शताब्दी (1650 ई.) में पंडित अहोबल द्वारा संस्कृत भाषा में रचित संगीत पारिजात उत्तर और दक्षिण दोनों संगीत पद्धतियों के लिए एक मील का पत्थर है। इसका फारसी अनुवाद 1724 ई. में किया गया जो रामपुर के रज़ा पुस्तकालय में सुरक्षित है।

ग्रंथ का विभाजन

इस ग्रंथ में कुल 708 श्लोक हैं और इसे दो खंडों में विभाजित किया गया है:

  1. रागगीत विचार खण्ड: स्वर, ग्राम, लक्षण, मूर्च्छना, स्वर प्रस्तार, वर्ण, जाति, राग, प्रबंध और वाग्गेयकार के लक्षण।
  2. वाद्यताल खण्ड: वाद्यों के चार प्रकार और ताल के दस प्राणों का वर्णन।

स्वर एवं श्रुति विधान

  • पंडित अहोबल ने 22 श्रुतियों पर 7 शुद्ध और 22 विकृत (कुल 29) स्वरों की स्थापना की है।
  • श्रुति-स्वर विभाजन:
    • सा, म, प — 4-4 श्रुतियाँ
    • रे, ध — 3-3 श्रुतियाँ
    • ग, नी — 2-2 श्रुतियाँ
  • स्वरों को उनकी अंतिम श्रुति पर स्थापित किया गया है, जिससे उनका शुद्ध सप्तक आधुनिक काफी थाट के समान प्रतीत होता है।
  • खण्डमेरू पद्धति: स्वरों के गणितीय प्रस्तार (परम्युटेशन) के लिए इस पद्धति का उल्लेख किया गया है, जिसे आज मेरूखण्ड भी कहा जाता है।

वर्ण, अलंकार एवं वाद्य वर्गीकरण

  • वर्ण: चार प्रकार के वर्ण माने गए हैं— स्थायी, आरोही, अवरोही और संचारी।
  • अलंकार: कुल 69 अलंकारों का वर्णन है (स्थायी वर्ण के 7, आरोही के 12, अवरोही के 12, संचारी के 38)।
  • वाद्य वर्गीकरण: द्वितीय खंड में 8 प्रकार की वीणा, 8 प्रकार के अवनद्ध वाद्य, 10 प्रकार के सुषिर वाद्य और 12 प्रकार के घन वाद्यों का वर्णन है।
संगीत मकरंद (Sangeet Makarand)

इस ग्रंथ के रचयिता नारद (देवर्षि नारद से भिन्न) माने जाते हैं। इसके रचना काल को लेकर विद्वानों में मतभेद है (कुछ इसे 7वीं-8वीं शताब्दी का तो कुछ इसे 13वीं शताब्दी के बाद का मानते हैं)।

रागों का लिंग-आधारित वर्गीकरण

संगीत मकरंद पहला ऐसा ग्रंथ है जिसमें रागों को पुरुष, स्त्री और नपुंसक रागों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस ग्रंथ में 'रागिनी' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।

राग का वर्गसंबद्ध रससंख्या
पुरुष रागरौद्र, अद्भुत और वीर रस20
स्त्री रागशृंगार और करुण रस24
नपुंसक रागभयानक, हास्य और शांत रस13

नाद के पाँच भेद

ग्रंथ में नाद के निम्नलिखित भेदों का उल्लेख मिलता है:

  • नखज: नाखूनों से उत्पन्न ध्वनि (जैसे वीणा के तार को बजाना)।
  • चर्मज: चर्म पर आघात से उत्पन्न ध्वनि (जैसे तबला, मृदंग)।
  • लौहज: धातु के माध्यम से उत्पन्न ध्वनि (जैसे मंजीरा, झांझ)।
  • शरीरज: मानव कंठ और तंत्रियों से उत्पन्न ध्वनि।
  • वायुज: वायु के घर्षण या फूंक से उत्पन्न ध्वनि (जैसे बांसुरी)।

संस्कृत श्लोक एवं महत्व

“आयुधर्मयशोवृद्धि: धनधान्य फलम् लभेत।
रागाभिवृद्धि: सन्तानं पूर्णरागा प्रगीयते”


भावार्थ / विश्लेषण: पूर्ण रागों के गायन से आयु, धर्म, यश, संतान, धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह श्लोक दर्शाता है कि रागों के स्वर और उनकी प्रकृति मानव जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है।

पाठ्यपुस्तक अभ्यास एवं प्रश्नोत्तर

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. संगीत मकरंद में औडव, षाड्व तथा संपूर्ण जातियों का उल्लेख प्राप्त है।
  2. संगीत मकरंद ग्रंथ के रचनाकार नारद हैं।
  3. आयुधर्मयशोवृद्धि: धन्धान्य फलम लभेत रागाभिवृद्धि सन्तानं पूर्णरागा प्रगीयते।
  4. पंचमसारसंहिता नारद द्वारा रचित है।
  5. संगीत रत्नाकर ग्रंथ में सात अध्याय हैं।
  6. 'प्रबंध' का शाब्दिक अर्थ बँधा हुआ या व्यवस्थित है।
  7. तालदशप्राण ताल प्रक्रिया का व्यवस्थित स्वरूप है।
  8. तेरहवीं शताब्दी में संगीत रत्नाकर ग्रंथ की रचना हुई।

सुमेलित कीजिए (Match the Following)

स्तंभ 'अ'स्तंभ 'आ'
1. रागविवेकाध्याय(ग) संगीत रत्नाकर
2. देशी ताल(घ) 120
3. रज़ा पुस्तकालय(च) रामपुर
4. वर्ण(ङ) आरोही
5. दशप्राण(ख) काल-मार्ग
6. अहोबल(क) संगीत पारिजात

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. संगीत पारिजात में दिए गए अलंकारों की कुल संख्या क्या है?
(क) 22   (ख) 12   (ग) 69   (घ) 67

2. पंडित अहोबल द्वारा सामान्य रूप से स्वीकृत किए गए ग्रामों की संख्या कितनी है?
(क) 10   (ख) 3   (ग) 2   (घ) 8

3. संगीत पारिजात में कितने श्लोक हैं?
(क) 708   (ख) 125   (ग) 700   (घ) 245

4. संगीत पारिजात में कितने रागों का वर्णन किया गया है?
(क) 123   (ख) 125   (ग) 127   (घ) 129

5. पंडित अहोबल ने किस ग्रंथ की रचना की थी?
(क) संगीत सार   (ख) गीत गोविंद   (ग) संगीत मकरंद   (घ) संगीत पारिजात