भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्वरों के प्रयोग की विभिन्न क्रियाओं को वर्ण कहते हैं।
"गानक्रियोच्यते वर्ण: स चतुर्धानिरूपित:। स्थाय्यारोह्यवरोही च संचारीत्यथ लक्षणम्॥"
भावार्थ: गाने की क्रिया को वर्ण कहते हैं। वर्ण चार प्रकार के होते हैं— स्थायी, आरोही, अवरोही और संचारी।
विशेष वर्ण समुदायों को अलंकार कहते हैं। अलंकार का शाब्दिक अर्थ 'आभूषण' है। इन्हें 'पलटा' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें स्वरों को उलट-पलट कर गाया जाता है।
'विशिष्ट वर्ण संदर्भमअलंकार प्रचक्षते'
शुद्ध स्वरों के अलंकार:
राग भैरव के अलंकार:
किसी भी राग की प्रस्तुति से पूर्व उस राग के स्वरूप का परिचय देने के लिए जो स्वर विस्तार किया जाता है, उसे आलाप कहते हैं। इसमें ताल और शब्दों की आवश्यकता नहीं होती।
"ग्रहशांतारमन्द्राणां न्यासापन्यासयोस्तथा। अल्पत्वस्य बहुत्वस्य षाडवौडुवयोरपि।। अभिव्यक्तिर्यत्र दृष्टा स रागालाप उच्यते।।"
भावार्थ: राग के आलाप में ग्रह, अंश, न्यास, अपन्यास, तारस्थान, मन्द्रस्थान, राग का अल्पत्व, बहुत्व, औडुवत्व तथा षाड्वत्व आदि सभी दृष्टिगोचर होने चाहिए।
राग के स्वरों का जब द्रुत गति से विशेष क्रमानुसार विस्तार किया जाता है तो उसे तान कहते हैं। तान शब्द संस्कृत के 'तन' धातु से बना है जिसका अर्थ है तानना या विस्तार करना।
स्वरों का ऐसा कंपन जो सुनने वालों के चित्त को सुखदायी हो, उसे गमक कहते हैं।
'स्वरस्य कंपो गमक: श्रोतृचित्त सुखावह:'
किसी स्वर को गाते समय जब किसी अन्य स्वर का केवल स्पर्श किया जाता है, तो उसे कण या स्पर्श स्वर कहते हैं। यह मूल स्वर की बाईं ओर ऊपर लिखा जाता है (जैसे— $^धप$)।
चार या अधिक स्वरों के समूह को द्रुत गति में एक गोलाई बनाकर गाने को खटका कहते हैं। इसे कोष्ठक में दर्शाया जाता है, जैसे— (प) का अर्थ पधमप है।
तीन स्वरों के द्रुत प्रयोग द्वारा अर्धवृत्त बनाने की क्रिया को मुर्की कहते हैं। यह अत्यंत कोमलता से गाई जाती है, जैसे— $^{रेग}रे$।
एक स्वर से दूसरे स्वर तक बिना ध्वनि तोड़े, बीच के स्वरों को स्पर्श करते हुए जाने को मींड कहते हैं। इसे दर्शाने के लिए स्वरों के ऊपर उल्टा चाँद (चाप) लगाया जाता है (जैसे— $\overparen{\text{नि प}}$)।
सात स्वरों की मूल व्यवस्था को ग्राम कहते हैं। इसे पाश्चात्य संगीत में 'स्केल' कहा जाता है।
"अथ ग्रामास्त्रय: प्रोक्तका: स्वरसंदोहरूपिणा:। षड्जमध्यमगांधारसंज्ञामिते समन्विता:।।"
भावार्थ: ग्राम कुल तीन हैं— षड्ज ग्राम, मध्यम ग्राम और गांधार ग्राम।
श्रुति-स्वर विभाजन नियम: स, म, प को 4-4 श्रुतियाँ; रे, ध को 3-3 श्रुतियाँ; ग, नि को 2-2 श्रुतियाँ प्राप्त हैं।
| श्रुति | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वर | - | - | - | ग | - | - | म | - | - | प | - | - | ध | - | - | नि | - | - | - | स | - | रे |
| श्रुति | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वर | - | - | - | - | म | - | - | प | - | - | ध | - | नि | - | - | - | स | - | - | रे | - | ग |
सात स्वरों के क्रमानुसार आरोह और अवरोह करने को मूर्च्छना कहते हैं।
"क्रमात् स्वराणां सप्तानामारोच्चावरोहणम्। मूर्च्छनेत्युच्यते ग्रामद्वेय ता: सप्त सप्त च।।"
| क्र. सं. | मूर्च्छना का नाम | आरंभिक स्वर | आरोह-अवरोह क्रम |
|---|---|---|---|
| 1 | उत्तरमन्द्रा | स | स रे ग म प ध नि / नि ध प म ग रे स |
| 2 | रंजनी | नि | नि स रे ग म प ध / ध प म ग रे स नि़ |
| 3 | उत्तरायता | ध | ध नि स रे ग म प / प म ग रे स नि ध |
| 4 | शुद्ध षड्जा | प | प ध नि स रे ग म / म ग रे स नि ध प |
| 5 | मत्सरीकृता | म | म प ध नि स रे ग / ग रे स नि ध प म |
| 6 | अश्वक्रांता | ग | ग म प ध नि स रे / रे स नि ध प म ग |
| 7 | अभिरूद्गता | रे | रे ग म प ध नि स / स नि ध प म ग रे |
| क्र. सं. | मूर्च्छना का नाम | आरंभिक स्वर | आरोह-अवरोह क्रम |
|---|---|---|---|
| 1 | सौवीरी | म | म प ध नि सं रें गं / गं रें सं नि ध प म |
| 2 | हरिणाश्वा | ग | ग म प ध नि सं रें / रें सं नि ध प म ग |
| 3 | कलोपनता | रे | रे ग म प ध नि सं / सं नि ध प म ग रे |
| 4 | शुद्धमध्या | स | स रे ग म प ध नि / नि ध प म ग रे स |
| 5 | मार्गी | नि | नि स रे ग म प ध / ध प म ग रे स नि |
| 6 | पौरवी | ध | ध नि स रे ग म प / प म ग रे स नि ध |
| 7 | हृष्यका | प | प ध नि स रे ग म / म ग रे स नि ध प |