Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 3: हिन्दुस्तानी संगीत के पारिभाषिक शब्द

वर्ण (Varna)

भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्वरों के प्रयोग की विभिन्न क्रियाओं को वर्ण कहते हैं।

"गानक्रियोच्यते वर्ण: स चतुर्धानिरूपित:। स्थाय्यारोह्यवरोही च संचारीत्यथ लक्षणम्॥"


भावार्थ: गाने की क्रिया को वर्ण कहते हैं। वर्ण चार प्रकार के होते हैं— स्थायी, आरोही, अवरोही और संचारी।

वर्ण के प्रकार

  • स्थायी वर्ण: एक ही स्वर को बार-बार गाने या उच्चारण करने को स्थायी वर्ण कहते हैं (जैसे— स स सस, रे रे, म म म)।
  • आरोही वर्ण: स्वरों के चढ़ते हुए क्रम को आरोही वर्ण कहते हैं (जैसे— स रे ग म प ध नि)।
  • अवरोही वर्ण: स्वरों के उतरते हुए क्रम को अवरोही वर्ण कहते हैं (जैसे— सं नि ध प म ग रे स)।
  • संचारी वर्ण: स्थायी, आरोही और अवरोही इन तीनों वर्णों के संयोग से जब स्वरों को उलट-पलट कर गाया जाता है तो उसे संचारी वर्ण कहते हैं (जैसे— स स रे ग म प ध प प ग रे स)।
अलंकार (Alankar)

विशेष वर्ण समुदायों को अलंकार कहते हैं। अलंकार का शाब्दिक अर्थ 'आभूषण' है। इन्हें 'पलटा' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें स्वरों को उलट-पलट कर गाया जाता है।

'विशिष्ट वर्ण संदर्भमअलंकार प्रचक्षते'

अलंकार के उदाहरण

शुद्ध स्वरों के अलंकार:

  • आरोह: स रे ग, रे ग म, ग म प, म प ध, प ध नि, ध नि सं
  • अवरोह: सं नि ध, नि ध प, ध प म, प म ग, म ग रे, ग रे स

राग भैरव के अलंकार:

  • आरोह: स रे ग ग, रे ग म म, ग म प प, म प ध ध, प ध नि नि, ध नि सं सं
  • अवरोह: सं नि ध ध, नि ध प प, ध प म म, प म ग ग, म ग रे रे, ग रे स स
आलाप (Aalap)

किसी भी राग की प्रस्तुति से पूर्व उस राग के स्वरूप का परिचय देने के लिए जो स्वर विस्तार किया जाता है, उसे आलाप कहते हैं। इसमें ताल और शब्दों की आवश्यकता नहीं होती।

"ग्रहशांतारमन्द्राणां न्यासापन्यासयोस्तथा। अल्पत्वस्य बहुत्वस्य षाडवौडुवयोरपि।। अभिव्यक्तिर्यत्र दृष्टा स रागालाप उच्यते।।"


भावार्थ: राग के आलाप में ग्रह, अंश, न्यास, अपन्यास, तारस्थान, मन्द्रस्थान, राग का अल्पत्व, बहुत्व, औडुवत्व तथा षाड्वत्व आदि सभी दृष्टिगोचर होने चाहिए।

आलाप के प्रकार एवं भाग

  • नोम-तोम का आलाप: ध्रुपद-धमार गायन तथा सितार वादन में बंदिश से पूर्व किया जाने वाला आलाप जिसमें त न न, नोम दे रे ना, दीं, तोम आदि निरर्थक शब्दों का प्रयोग होता है।
  • आलाप के चार भाग: आलाप गायन को चार भागों में बाँटा जाता है— स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग।
तान (Taan)

राग के स्वरों का जब द्रुत गति से विशेष क्रमानुसार विस्तार किया जाता है तो उसे तान कहते हैं। तान शब्द संस्कृत के 'तन' धातु से बना है जिसका अर्थ है तानना या विस्तार करना।

तान के प्रमुख प्रकार

  1. शुद्ध तान अथवा सपाट तान: जब राग के स्वरों को सीधे आरोह-अवरोह के क्रमानुसार द्रुत गति में प्रस्तुत किया जाता है।
  2. कूट तान: जिसमें स्वरों का क्रम टेढ़ा-मेढ़ा या वक्र होता है।
  3. मिश्र तान: शुद्ध तान और कूट तान के मिश्रण को मिश्र तान कहते हैं।
  4. वक्र तान: जिसमें स्वरों का प्रयोग वक्र (टेढ़े) रूप में किया जाता है।
  5. बोल तान: जब गीत के शब्दों (बोलों) को तान के स्वरों में पिरोकर द्रुत गति में गाया जाता है।
  6. गमक की तान: जिन तानों में स्वरों को गमक के साथ हिलाकर गाया जाता है।
गमक (Gamak)

स्वरों का ऐसा कंपन जो सुनने वालों के चित्त को सुखदायी हो, उसे गमक कहते हैं।

'स्वरस्य कंपो गमक: श्रोतृचित्त सुखावह:'

संगीत रत्नाकर के अनुसार गमक के 15 प्रकार

  1. तिरिप: 1/8 मात्रा काल का अत्यंत तीव्र कंपन।
  2. स्फुरित: 1/6 मात्रा काल का कंपन (वर्तमान में गिटकरी)।
  3. कंपित: 1/4 मात्रा काल का कंपन (वर्तमान में खटका)।
  4. लीन: 1/2 मात्रा काल का कंपन जिसमें स्वर अगले या पिछले स्वर में विलीन हो जाता है।
  5. आंदोलित: 1 मात्रा काल का गंभीर कंपन।
  6. प्लावित: 3/4 मात्रा काल का कंपन।
  7. वली: वेग और वक्रत्व के साथ कंपन (वर्तमान में मींड)।
  8. कुरूला: वली में ही स्वरों को सघनता के साथ उच्चारित करना (वर्तमान में घसीट)।
  9. मुद्रित: मुँह बंद करके लिया जाने वाला कंपन।
  10. गुम्फित: हृदय से हुंकार की ध्वनि के साथ उत्पन्न कंपन।
  11. त्रिभिन्न: तीन स्थानों को जल्दी से छूकर चौथे पर पहुँचना।
  12. आहत: किसी स्वर से अगले स्वर को छूकर मूल स्वर पर लौटना।
  13. उल्लासित: शीघ्रता से स्वरों को आरोह क्रम में गाना-बजाना।
  14. नामित: स्वर को मींड की भाँति नीचे की ओर झुकाना।
  15. मिश्रित: दो या दो से अधिक गमकों का मिला-जुला प्रयोग।
कण, खटका, मुर्की एवं मींड

कण (Kan)

किसी स्वर को गाते समय जब किसी अन्य स्वर का केवल स्पर्श किया जाता है, तो उसे कण या स्पर्श स्वर कहते हैं। यह मूल स्वर की बाईं ओर ऊपर लिखा जाता है (जैसे— $^धप$)।

खटका (Khatka)

चार या अधिक स्वरों के समूह को द्रुत गति में एक गोलाई बनाकर गाने को खटका कहते हैं। इसे कोष्ठक में दर्शाया जाता है, जैसे— (प) का अर्थ पधमप है।

मुर्की (Murki)

तीन स्वरों के द्रुत प्रयोग द्वारा अर्धवृत्त बनाने की क्रिया को मुर्की कहते हैं। यह अत्यंत कोमलता से गाई जाती है, जैसे— $^{रेग}रे$।

मींड (Meend)

एक स्वर से दूसरे स्वर तक बिना ध्वनि तोड़े, बीच के स्वरों को स्पर्श करते हुए जाने को मींड कहते हैं। इसे दर्शाने के लिए स्वरों के ऊपर उल्टा चाँद (चाप) लगाया जाता है (जैसे— $\overparen{\text{नि प}}$)।

तंत्रवाद्य तकनीकें (Krintan, Zamzama, Ghasit, Soot)
ग्राम एवं मूर्च्छना (Gram and Moorchhana)

ग्राम (Gram)

सात स्वरों की मूल व्यवस्था को ग्राम कहते हैं। इसे पाश्चात्य संगीत में 'स्केल' कहा जाता है।

"अथ ग्रामास्त्रय: प्रोक्तका: स्वरसंदोहरूपिणा:। षड्जमध्यमगांधारसंज्ञामिते समन्विता:।।"


भावार्थ: ग्राम कुल तीन हैं— षड्ज ग्राम, मध्यम ग्राम और गांधार ग्राम।

श्रुति-स्वर विभाजन नियम: स, म, प को 4-4 श्रुतियाँ; रे, ध को 3-3 श्रुतियाँ; ग, नि को 2-2 श्रुतियाँ प्राप्त हैं।

षड्ज ग्राम की श्रुति स्थिति

श्रुति12345678910111213141516171819202122
स्वर---ग--म--प--ध--नि---स-रे

मध्यम ग्राम की श्रुति स्थिति

श्रुति12345678910111213141516171819202122
स्वर----म--प--ध-नि---स--रे-ग

मूर्च्छना (Moorchhana)

सात स्वरों के क्रमानुसार आरोह और अवरोह करने को मूर्च्छना कहते हैं।

"क्रमात् स्वराणां सप्तानामारोच्चावरोहणम्। मूर्च्छनेत्युच्यते ग्रामद्वेय ता: सप्त सप्त च।।"

षड्ज ग्राम की 7 मूर्च्छनाएँ

क्र. सं.मूर्च्छना का नामआरंभिक स्वरआरोह-अवरोह क्रम
1उत्तरमन्द्रासस रे ग म प ध नि / नि ध प म ग रे स
2रंजनीनिनि स रे ग म प ध / ध प म ग रे स नि़
3उत्तरायताधध नि स रे ग म प / प म ग रे स नि ध
4शुद्ध षड्जापप ध नि स रे ग म / म ग रे स नि ध प
5मत्सरीकृतामम प ध नि स रे ग / ग रे स नि ध प म
6अश्वक्रांतागग म प ध नि स रे / रे स नि ध प म ग
7अभिरूद्गतारेरे ग म प ध नि स / स नि ध प म ग रे

मध्यम ग्राम की 7 मूर्च्छनाएँ

क्र. सं.मूर्च्छना का नामआरंभिक स्वरआरोह-अवरोह क्रम
1सौवीरीमम प ध नि सं रें गं / गं रें सं नि ध प म
2हरिणाश्वागग म प ध नि सं रें / रें सं नि ध प म ग
3कलोपनतारेरे ग म प ध नि सं / सं नि ध प म ग रे
4शुद्धमध्यासस रे ग म प ध नि / नि ध प म ग रे स
5मार्गीनिनि स रे ग म प ध / ध प म ग रे स नि
6पौरवीधध नि स रे ग म प / प म ग रे स नि ध
7हृष्यकापप ध नि स रे ग म / म ग रे स नि ध प