Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 4: प्राचीन एवं आधुनिक गायन शैलियाँ

जाति गान (Jati Gaan)

संगीत के संदर्भ में जाति शब्द का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन काल में राग गायन के समान ही जाति गायन शास्त्रीय संगीत का वह स्वरूप था जो अनेक शास्त्रोक्त लक्षणों पर आधारित था।

जाति की परिभाषा एवं उत्पत्ति

‘जाति’ शब्द का अर्थ श्रेणी, समूह, वर्ग अथवा सांगीतिक प्रकार से है। जातियों का सर्वप्रथम निर्देश रामायण में मिलता है, जहाँ गायन सप्त जातियों में निबद्ध था। इसके पश्चात भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र और मतंग मुनि कृत बृहद्देशी में इसका विस्तृत विवरण मिलता है।

“श्रुति ग्रह स्वरादि समूहाद्जायन्ते इति जातयः’’


भावार्थ: श्रुति, ग्रह आदि स्वरों के समूह को जाति कहते हैं। श्रुति से तात्पर्य सुनने योग्य सूक्ष्म ध्वनि से है और ग्रह आदि स्वरों से तात्पर्य जाति में प्रयुक्त होने वाले मुख्य स्वरों से है।

पंडित शार्ंगदेव के अनुसार जाति की उत्पत्ति सामवेद या साम-गान से हुई है। साम-गान की स्वरावलियों से ही जातियों का विकास हुआ।

जातियों का वर्गीकरण (18 जातियाँ)

भरत मुनि ने कुल 18 जातियाँ मानी हैं, जिन्हें दो ग्रामों (षड्ज ग्राम और मध्यम ग्राम) के अंतर्गत शुद्ध और विकृत भागों में विभाजित किया गया है:

ग्रामशुद्ध जातियाँ (7)विकृत जातियाँ (11)
षड्ज ग्राम (Shadaj Gram)षाड्जी, आर्षभी, धैवती, नैषादीषड्जकैशिकी, षड्जोदीच्यवा, षड्जमध्यमा
मध्यम ग्राम (Madhyam Gram)गान्धारी, मध्यमा, पंचमीगान्धारोदीच्यवा, गान्धारपंचमी, नंदयंती, आन्ध्री, रक्तगान्धारी, मध्यमोदीच्यवा, कर्मारवी, कैशिकी

जाति के भेद एवं गायन नियम

  • स्वर संख्या के अनुसार भेद: संपूर्ण (7 स्वर), षाड्व (6 स्वर) तथा औड्व (5 स्वर)।
  • मार्ग ताल: जातियाँ मार्ग तालों में निबद्ध होती थीं, जैसे— चंचत्पुट, चाचपुट, पंचपाणी, षट्पितापुत्रक तथा उद्घट।
  • लय विधान: गायन का आरंभ द्रुत लय में, फिर मध्य लय में और अंत में विलंबित लय में किया जाता था।

“यत्किंचिदेतद् गीते लोके तत्ससर्वं जातिषु स्थितम्”


भावार्थ: लोक में जो कुछ भी गायन उपलब्ध है, वह सब जाति में ही स्थित है।

जाति लक्षण (Jati Lakshana)

अभिनवगुप्त और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जाति गायन के दस लक्षण अनिवार्य माने गए हैं:

  1. ग्रह स्वर: जिससे जाति गायन का आरंभ होता था।
  2. अंश स्वर: जातियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्वर, जिसकी तुलना आधुनिक राग के वादी स्वर से की जा सकती है। इसमें राग का निवास होता था।
  3. तार स्वर: सप्तक के उच्च स्वरों का विशिष्ट विधि से प्रयोग।
  4. मन्द्र स्वर: सप्तक के निम्न स्वरों का प्रयोग।
  5. न्यास स्वर: वह स्वर जिस पर गीत की समाप्ति होती थी।
  6. अपन्यास स्वर: गीत के मध्य खंड (अंतरा आदि) के अंत में प्रयुक्त होने वाला स्वर।
  7. अल्पत्व: राग में जिन स्वरों का प्रयोग कम किया जाता है (इसके दो प्रकार हैं: लंघन और अनभ्यास)।
  8. बहुत्व: राग में जिन स्वरों का प्रयोग अधिक किया जाता है (इसके दो प्रकार हैं: अलंघन और अभ्यास)।
  9. षाड्व: छह स्वरों के प्रयोग की स्थिति।
  10. औड्व: पाँच स्वरों के प्रयोग की स्थिति।
प्रबंध गायन (Prabandha Gayan)

संस्कृत ग्रंथ संगीत रत्नाकर में गीत की परिभाषा इस प्रकार दी गई है:

‘रंजकः स्वर संदर्भों गीतमित्यभिधीयते’


भावार्थ: मन का रंजन करने वाला स्वर संदर्भ ही ‘गीत’ कहलाता है।

गीत के भेद

  • गांधर्व: देव-स्तुति के लिए रचित, कठोर नियमों से बद्ध गान जो मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया।
  • गान: लोक रंजन के लिए नियमों में लचीलेपन के साथ गाया जाने वाला संगीत। इसके दो प्रकार हैं:
    • निबद्ध गान: जो स्वर और ताल में बंधा हो (जैसे: प्रबंध, वस्तु, रूपक)।
    • अनिबद्ध गान: जो नियमों से स्वतंत्र हो (जैसे: आलाप)।

प्रबंध के धातु और अंग

प्रबंध शब्द 'प्र' उपसर्ग और 'बंध' धातु से बना है, जिसका अर्थ है नियमबद्ध रचना। आज इसे बंदिश कहा जाता है।

प्रबंध के चार धातु (Four Dhatus):

  1. उद्ग्राह: प्रबंध का पहला भाग जहाँ से गायन आरंभ होता है।
  2. मेलापक: दूसरा भाग जो पहले और तीसरे भाग को जोड़ता है।
  3. ध्रुव: तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण भाग जिसका कभी लोप नहीं होता।
  4. आभोग: चौथा और अंतिम भाग।

प्रबंध के छह अंग (Six Angas):

  • स्वर: सा, रे, ग, म आदि गाने योग्य ध्वनियाँ।
  • बिरुद: गुणसूचक नाम या प्रशस्ति पद।
  • पद: गीत के शब्द या साहित्य।
  • तेनक: मंगलार्थक शब्द जैसे 'हरिओम', 'अनंत' आदि।
  • पाट: ताल वाद्यों के बोल (जैसे तबला या पखावज के वर्ण)।
  • ताल: लय और समय मापन का आधार।
ध्रुपद अथवा ध्रुवपद (Dhrupad)

ध्रुपद प्राचीन प्रबंध गायन का ही परिवर्तित रूप है। यह एक गंभीर और दमदार गायकी है जिसमें स्वर और ताल का गहरा ज्ञान आवश्यक है।

इतिहास एवं विकास

‘ध्रुवपद’ शब्द ‘ध्रुव’ (स्थिर) और ‘पद’ (काव्य रचना) के योग से बना है। मध्यकाल में राजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर) के संरक्षण में ध्रुपद गायकी का चरम विकास हुआ। अकबर के दरबार में तानसेन जैसे संगीतज्ञों ने इसे परिष्कृत किया।

“गीर्वाण मध्य देशीय भाषा साहित्य राजितम्, द्वि चतुर्वाक्य सम्पन्नम्... उद्ग्राहधृवकाभोगांतरम् ध्रुवपदं स्मृतम्’’


भावार्थ: संस्कृत या मध्यदेशीय भाषा में रचित, शृंगार रस प्रधान, उद्ग्राह, ध्रुव, आभोग और अंतरा से युक्त चार चरणों वाली रचना ध्रुवपद कहलाती है।

ध्रुपद की चार वाणियाँ (Four Banis)

वाणी के आधार पर ध्रुपद को चार शैलियों में विभाजित किया गया है:

  1. खंडार वाणी
  2. नौहार वाणी
  3. डागर वाणी
  4. गोबरहार वाणी

गायन शैली एवं प्रमुख कलाकार

  • गायन विधि: सर्वप्रथम नोम-तोम के निरर्थक शब्दों से आलाप किया जाता है, फिर पखावज की संगति के साथ बंदिश गाई जाती है।
  • प्रयुक्त ताल: चारताल, सूलताल, तीव्रा, ब्रह्म, रुद्र आदि।
  • प्रमुख कलाकार: स्वामी हरिदास, तानसेन, नायक बैजू, गोपाल नायक, बहराम खां, डागर बंधु, गुंडेचा बंधु, अभय नारायण मलिक आदि।
धमार (Dhamar)

धमार भी ध्रुपद के समान ही मध्यकाल की एक प्रतिष्ठित गायन शैली है, जिसका उद्भव ब्रजभूमि के लोक संगीत और होली उत्सव से हुआ है।

विशेषताएँ एवं गायन शैली

  • विषय-वस्तु: इसमें मुख्य रूप से राधा-कृष्ण के होली खेलने और फाग उत्सव का वर्णन होता है।
  • रस: शृंगार रस की प्रधानता होती है।
  • ताल: यह केवल धमार ताल (14 मात्रा) में गाया जाता है।
  • गायन विधि: ध्रुपद की तरह इसमें भी आलाप से शुरुआत होती है, परंतु इसमें तानों का प्रयोग नहीं होता। इसके स्थान पर मींड, गमक और विभिन्न प्रकार की लयकारी (दुगुन, तिगुन, चौगुन) का प्रदर्शन किया जाता है।
  • प्रमुख कलाकार: नारायण शास्त्री, बहराम खां, लक्ष्मणदास, सुमति मुटाटकर आदि।
ख्याल (Khayal)

ख्याल भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे लोकप्रिय गायन विधा है। यह फ़ारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'कल्पना', 'विचार' या 'स्मृति'।

इतिहास एवं घराने

ख्याल का विकास ध्रुपद के नियमों की कठोरता के विरुद्ध एक स्वतंत्र और कल्पनाशील शैली के रूप में हुआ। अमीर खुसरो और जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्की ने इसे प्रारंभिक प्रोत्साहन दिया। 18वीं शताब्दी में मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के दरबार में सदारंग-अदारंग (नेमत खान और फिरोज खान) ने हजारों ख्यालों की रचना कर इसे घर-घर लोकप्रिय बनाया।

प्रमुख घराने: ग्वालियर, आगरा, दिल्ली, जयपुर, पटियाला, किराना, रामपुर-सहसवान।

ख्याल के प्रकार

  1. विलंबित (बड़ा) ख्याल: धीमी लय में गाया जाता है। इसमें एकताल, झूमरा, तिलवाड़ा, झपताल आदि तालों का प्रयोग होता है। कलाकार आलाप, बोलतान और तानों से राग का विस्तार करता है।
  2. द्रुत (छोटा) ख्याल: तेज लय में गाया जाता है। इसमें तीनताल, एकताल, झपताल आदि का प्रयोग होता है। इसमें तानों और सरगम की प्रधानता होती है।
ठुमरी (Thumri)

ठुमरी को उपशास्त्रीय (Semi-classical) संगीत की श्रेणी में रखा गया है। यह अत्यंत भावप्रधान और शृंगारिक शैली है।

उत्पत्ति एवं विशेषताएँ

  • नामकरण: ‘ठुम’ (ठुमकना - सुंदर पादक्षेप) और ‘री’ (रिझाना) के योग से बना है, जो इसके नृत्य से संबंध को दर्शाता है।
  • संरक्षक: अवध के नवाब वाजिद अली शाह (उपनाम: 'अख्तर पिया') ने इसके प्रचार-प्रसार में ऐतिहासिक योगदान दिया।
  • शैलियाँ: इसके दो मुख्य अंग हैं— पूरब अंग (बनारस/लखनऊ) और पंजाब अंग।
  • प्रयुक्त ताल: दीपचंदी, जत, अद्धा, कहरवा आदि।
  • प्रमुख कलाकार: गिरिजा देवी, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, बड़ी मोती बाई, शोभा गुर्टू आदि।
दादरा (Dadra)

दादरा ठुमरी शैली से ही मिलती-जुलती एक शृंगार प्रधान सुगम शास्त्रीय गायन शैली है, जो ठुमरी की तुलना में अधिक चपल और द्रुत होती है।

विशेषताएँ

  • ताल: यह मुख्य रूप से दादरा ताल (6 मात्रा) या कहरवा ताल में गाया जाता है।
  • प्रकृति: लोक शैली के प्रभाव के कारण इसकी गति अत्यंत चपल होती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसे 'ददरिया' भी कहा जाता है।
  • प्रमुख कलाकार: बेगम अख्तर, गिरिजा देवी, रसूलन बाई, शोभा गुर्टू आदि।