संगीत के संदर्भ में जाति शब्द का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन काल में राग गायन के समान ही जाति गायन शास्त्रीय संगीत का वह स्वरूप था जो अनेक शास्त्रोक्त लक्षणों पर आधारित था।
‘जाति’ शब्द का अर्थ श्रेणी, समूह, वर्ग अथवा सांगीतिक प्रकार से है। जातियों का सर्वप्रथम निर्देश रामायण में मिलता है, जहाँ गायन सप्त जातियों में निबद्ध था। इसके पश्चात भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र और मतंग मुनि कृत बृहद्देशी में इसका विस्तृत विवरण मिलता है।
“श्रुति ग्रह स्वरादि समूहाद्जायन्ते इति जातयः’’
भावार्थ: श्रुति, ग्रह आदि स्वरों के समूह को जाति कहते हैं। श्रुति से तात्पर्य सुनने योग्य सूक्ष्म ध्वनि से है और ग्रह आदि स्वरों से तात्पर्य जाति में प्रयुक्त होने वाले मुख्य स्वरों से है।
पंडित शार्ंगदेव के अनुसार जाति की उत्पत्ति सामवेद या साम-गान से हुई है। साम-गान की स्वरावलियों से ही जातियों का विकास हुआ।
भरत मुनि ने कुल 18 जातियाँ मानी हैं, जिन्हें दो ग्रामों (षड्ज ग्राम और मध्यम ग्राम) के अंतर्गत शुद्ध और विकृत भागों में विभाजित किया गया है:
| ग्राम | शुद्ध जातियाँ (7) | विकृत जातियाँ (11) |
|---|---|---|
| षड्ज ग्राम (Shadaj Gram) | षाड्जी, आर्षभी, धैवती, नैषादी | षड्जकैशिकी, षड्जोदीच्यवा, षड्जमध्यमा |
| मध्यम ग्राम (Madhyam Gram) | गान्धारी, मध्यमा, पंचमी | गान्धारोदीच्यवा, गान्धारपंचमी, नंदयंती, आन्ध्री, रक्तगान्धारी, मध्यमोदीच्यवा, कर्मारवी, कैशिकी |
“यत्किंचिदेतद् गीते लोके तत्ससर्वं जातिषु स्थितम्”
भावार्थ: लोक में जो कुछ भी गायन उपलब्ध है, वह सब जाति में ही स्थित है।
अभिनवगुप्त और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जाति गायन के दस लक्षण अनिवार्य माने गए हैं:
संस्कृत ग्रंथ संगीत रत्नाकर में गीत की परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
‘रंजकः स्वर संदर्भों गीतमित्यभिधीयते’
भावार्थ: मन का रंजन करने वाला स्वर संदर्भ ही ‘गीत’ कहलाता है।
प्रबंध शब्द 'प्र' उपसर्ग और 'बंध' धातु से बना है, जिसका अर्थ है नियमबद्ध रचना। आज इसे बंदिश कहा जाता है।
ध्रुपद प्राचीन प्रबंध गायन का ही परिवर्तित रूप है। यह एक गंभीर और दमदार गायकी है जिसमें स्वर और ताल का गहरा ज्ञान आवश्यक है।
‘ध्रुवपद’ शब्द ‘ध्रुव’ (स्थिर) और ‘पद’ (काव्य रचना) के योग से बना है। मध्यकाल में राजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर) के संरक्षण में ध्रुपद गायकी का चरम विकास हुआ। अकबर के दरबार में तानसेन जैसे संगीतज्ञों ने इसे परिष्कृत किया।
“गीर्वाण मध्य देशीय भाषा साहित्य राजितम्, द्वि चतुर्वाक्य सम्पन्नम्... उद्ग्राहधृवकाभोगांतरम् ध्रुवपदं स्मृतम्’’
भावार्थ: संस्कृत या मध्यदेशीय भाषा में रचित, शृंगार रस प्रधान, उद्ग्राह, ध्रुव, आभोग और अंतरा से युक्त चार चरणों वाली रचना ध्रुवपद कहलाती है।
वाणी के आधार पर ध्रुपद को चार शैलियों में विभाजित किया गया है:
धमार भी ध्रुपद के समान ही मध्यकाल की एक प्रतिष्ठित गायन शैली है, जिसका उद्भव ब्रजभूमि के लोक संगीत और होली उत्सव से हुआ है।
ख्याल भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे लोकप्रिय गायन विधा है। यह फ़ारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'कल्पना', 'विचार' या 'स्मृति'।
ख्याल का विकास ध्रुपद के नियमों की कठोरता के विरुद्ध एक स्वतंत्र और कल्पनाशील शैली के रूप में हुआ। अमीर खुसरो और जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्की ने इसे प्रारंभिक प्रोत्साहन दिया। 18वीं शताब्दी में मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के दरबार में सदारंग-अदारंग (नेमत खान और फिरोज खान) ने हजारों ख्यालों की रचना कर इसे घर-घर लोकप्रिय बनाया।
प्रमुख घराने: ग्वालियर, आगरा, दिल्ली, जयपुर, पटियाला, किराना, रामपुर-सहसवान।
ठुमरी को उपशास्त्रीय (Semi-classical) संगीत की श्रेणी में रखा गया है। यह अत्यंत भावप्रधान और शृंगारिक शैली है।
दादरा ठुमरी शैली से ही मिलती-जुलती एक शृंगार प्रधान सुगम शास्त्रीय गायन शैली है, जो ठुमरी की तुलना में अधिक चपल और द्रुत होती है।