Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 5: राग वर्गीकरण

रागों के समय सिद्धांत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय संगीत में प्राचीन काल से ही रागों को उनके निर्धारित समय पर ही गाने-बजाने की परंपरा रही है। ऐतिहासिक दृष्टि से वैदिक काल में सामवेद में निहित गीतों को दिन के विभिन्न प्रहरों में यज्ञ कर्म या अन्य अवसरों पर यथासमय गाए जाने का नियम होता था, जैसे— प्रातः सवन, साँय सवन आदि।

ऐतिहासिक ग्रंथों में समय सिद्धांत के उल्लेख

  • रामायण तथा महाभारत: ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु या वर्षा ऋतु में गीतों को गाए जाने के उल्लेख मिलते हैं।
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् (महाकवि कालिदास, ईसा से 400 वर्ष पूर्व): सूत्रधार द्वारा नटी को ग्रीष्मकालीन गीत गाने का निर्देश दिया गया है।
  • संगीत मकरन्द (नारद, 7वीं से 9वीं शताब्दी): रागों के असमय गायन के दोषों का उल्लेख मिलता है।

‘लयबेलाप्रगानेन रागाणां हिंसको भवेत्या शृणोति स दारिद्री आयुनश्यति सर्वदा।।’


भावार्थ / विश्लेषण: असमय में रागों को गाने-बजाने से रागों की हानि (हिंसा) होती है। इसे सुनने वाला दरिद्रता को प्राप्त होता है और उसकी आयु का सदैव नाश होता है। (संगीत मकरन्द, श्लोक 24-26, पृ. 16)

‘गान्धारों, देवगान्धारों धन्नासी सैन्धवी तथा नारायणी, गुर्जरी या बंगाल पटमंजरी एते रागास्तु गातव्या: प्रातकाले विशेषतः’


भावार्थ / विश्लेषण: गांधार, देवगांधार, धन्नासी, सैंधवी, नारायणी, गुर्जरी और बंगाल पटमंजरी रागों को विशेष रूप से प्रातःकाल में गाना चाहिए। (संगीत मकरन्द, श्लोक 10-12, पृ. 15)

विभिन्न शताब्दियों में समय निर्धारण का विकास

  • चौथी शताब्दी: मिथिला नरेश नान्यदेव द्वारा रचित भरत भाष्य में रागों को समय व ऋतु के आधार पर गाने के निर्देश हैं।
  • प्राचीन काल के अंतिम ग्रंथकार: शार्ङ्गदेव ने संगीत रत्नाकर में ग्राम रागों को दिन के विभिन्न प्रहरों में गाने का निर्देश दिया।
  • 12वीं या 14वीं शताब्दी: लोचन रचित राग तरंगिणी में दिन के विभिन्न प्रहरों में गाए जाने वाले रागों का उल्लेख है।
राग का नामगायन समय (राग तरंगिणी के अनुसार)
भैरवी व रामकलीप्रातः कालीन
बिलावलदिन का प्रथम प्रहर
आसावरीदिन का तृतीय प्रहर
केदारअर्धरात्रि
अड़ानारात्रि का तृतीय प्रहर
  • 16वीं शताब्दी: अहोबल कृत संगीत पारिजात।
  • 17वीं शताब्दी: फकीरुल्लाह कृत रागदर्पण और पंडित दामोदर कृत संगीत दर्पण।
  • 18वीं शताब्दी का प्रारंभ: श्रीकंठ कृत रस कौमुदी में रागों को शुद्ध, छायालग व संकीर्ण रागों के रूप में वर्गीकृत किया गया।

पंडित दामोदर ने संगीत दर्पण में स्पष्ट किया कि राजा की आज्ञा होने पर या गायक/साधक की स्वेच्छा होने पर किसी भी राग को किसी भी समय गाए जाने में कोई दोष नहीं है।

वर्तमान में प्रचलित समय सिद्धांत

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रागों को समय के आधार पर दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है:

वर्ग का नामसमय सीमावादी स्वर की स्थिति
पूर्व राग / पूर्वांगवादी रागदोपहर के 12:00 बजे से रात्रि के 12:00 बजे तकसप्तक के पूर्वांग (स रे ग म प) में से कोई स्वर
उत्तर राग / उत्तरांगवादी रागरात्रि के 12:00 बजे से दोपहर के 12:00 बजे तकसप्तक के उत्तरांग (म प ध नि सं) में से कोई स्वर

पूर्व राग / पूर्वांगवादी राग के उदाहरण

क्र. सं.राग का नामवादी स्वरगायन समय
1यमनगरात्रि का प्रथम प्रहर
2खमाजगरात्रि का प्रथम प्रहर
3देसरेरात्रि का द्वितीय प्रहर
4भूपालगरात्रि का द्वितीय प्रहर

उत्तर राग / उत्तरांगवादी राग के उदाहरण

क्र. सं.राग का नामवादी स्वरगायन समय
1आसावरीधदिन का दूसरा प्रहर
2अल्हैया बिलावलधदिन का दूसरा प्रहर
3जौनपुरीधदिन का दूसरा प्रहर
स्वर और समय की दृष्टि से रागों के तीन वर्ग

रागों में प्रयुक्त होने वाले स्वरों के आधार पर समय सिद्धांत को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है:

1. कोमल रे और कोमल ध वाले राग (संधिप्रकाश राग)

दिन और रात की संधि (मिलन) के समय को संधिकाल कहते हैं। इस समय गाए जाने वाले राग संधिप्रकाश राग कहलाते हैं।

  • प्रातःकालीन संधिप्रकाश राग: सुबह/भोर की बेला में गाए जाने वाले राग। इनमें शुद्ध मध्यम (म) का प्रयोग होता है। जैसे— भैरव, कालिंगड़ा, जोगिया।
  • साँयकालीन संधिप्रकाश राग: शाम/साँय की बेला में गाए जाने वाले राग। इनमें तीव्र मध्यम (मँ) का प्रयोग होता है। जैसे— पूर्वी, मारवा।
  • इन रागों में कोमल रे और कोमल ध के साथ शुद्ध ग, नि का प्रयोग होता है।

2. शुद्ध रे और ध वाले राग

इन रागों का गायन समय संधिप्रकाश रागों के ठीक बाद आता है।

  • गायन समय: सुबह 7:00 बजे से 10:00 बजे तक और शाम 7:00 बजे से रात 10:00 बजे तक।
  • स्वर विशेषता: ग स्वर का शुद्ध होना आवश्यक है।
  • प्रातःकालीन राग: शुद्ध मध्यम (म) की प्रधानता होती है। जैसे— बिलावल।
  • साँयकालीन राग: तीव्र मध्यम (मँ) का प्रयोग होता है। जैसे— यमन, भूपाल, शुद्ध कल्याण।

3. कोमल ग और नि वाले राग

  • गायन समय: दिन में 10:00 बजे से 4:00 बजे तक और रात में 10:00 बजे से 4:00 बजे तक।
  • स्वर विशेषता: ग स्वर सदैव कोमल होता है। रे और ध स्वर शुद्ध या कोमल हो सकते हैं।
  • उदाहरण: तोड़ी (प्रातःकाल), बागेश्री, जयजयवंती, मालकौंस (रात्रि)।
परमेल प्रवेशक राग

परमेल प्रवेशक राग वे राग होते हैं जो किसी एक मेल (थाट) से दूसरे मेल (थाट) में प्रवेश कराते हैं। इनमें पहले गाए जाने वाले राग और बाद में गाए जाने वाले राग दोनों के लक्षण विद्यमान होते हैं।

शुद्ध, छायालग और संकीर्ण राग

प्राचीन काल से रागों को इन तीन वर्गों में विभाजित करने की प्रथा चली आ रही है:

1. शुद्ध राग

जिन रागों में शास्त्र के नियमों का पालन शुद्ध रूप में होता है और जिनमें किसी दूसरे राग की छाया नहीं आती। ये स्वतंत्र राग होते हैं।

  • उदाहरण: पूर्वी, कल्याण आदि। वर्तमान के दस आश्रय राग शुद्ध राग हैं।

“शास्त्रोक्त नियम नियमात रंजकत्वम् भवति।”


भावार्थ: वे राग शुद्ध हैं जो शास्त्रीय नियमानुसार गाए जाने पर रंजक (आनंददायी) होते हैं।

2. छायालग राग

जिन रागों में किसी दूसरे राग की छाया दिखाई देती है। इन्हें सालक या सालग भी कहा जाता है।

  • उदाहरण: तिलक कामोध, परज आदि।

‘छायालगत्वम नामान्यच्छाया लगत्वेन रक्ति हेतुत्य भवति’


भावार्थ: छायालग राग में किसी दूसरे राग की छाया आने से वे रंजक होते हैं।

3. संकीर्ण राग

जिन रागों में शुद्ध और छायालग रागों का मिश्रण होता है। इनका प्रयोग मुख्य रूप से मधुरता बढ़ाने के लिए किया जाता है।

  • उदाहरण: पीलू, भैरवी आदि। ठुमरी गायन में संकीर्ण रागों का प्रयोग बहुतायत से होता है।

“शुद्ध छायालग मुख्त्वन रस्त्रिहेतुस्व भवति”

अभ्यास प्रश्न
  1. राग गायन को प्रकृति के साथ क्यों जोड़ा गया है?
  2. प्रातः सवन व साँय सवन से आप क्या समझते हैं?
  3. कालिदास के किस ग्रंथ में राग को समयानुसार गाए जाने का उल्लेख है?
  4. अभिज्ञानशाकुन्तलम् के रचयिता कौन हैं?
  5. राग तरंगिणी के अनुसार निम्नलिखित रागों का गायन समय बताएँ: (क) रामकली (ख) आसावरी (ग) बिलावल (घ) केदार (ङ) भैरवी (च) अड़ाना।
  6. राग के 'समय सिद्धांत' के संदर्भ में पंडित दामोदर ने संगीत दर्पण में क्या कहा है?
  7. पूर्वांगवादी या पूर्व राग से आप क्या समझते हैं? इसके अंतर्गत आने वाले रागों के उदाहरण दीजिए।
  8. उत्तरांगवादी से क्या अभिप्राय है? दो उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए।
  9. शुद्ध, छायालग और संकीर्ण रागों का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।