भारतीय संगीत में प्राचीन काल से ही रागों को उनके निर्धारित समय पर ही गाने-बजाने की परंपरा रही है। ऐतिहासिक दृष्टि से वैदिक काल में सामवेद में निहित गीतों को दिन के विभिन्न प्रहरों में यज्ञ कर्म या अन्य अवसरों पर यथासमय गाए जाने का नियम होता था, जैसे— प्रातः सवन, साँय सवन आदि।
‘लयबेलाप्रगानेन रागाणां हिंसको भवेत्या शृणोति स दारिद्री आयुनश्यति सर्वदा।।’
भावार्थ / विश्लेषण: असमय में रागों को गाने-बजाने से रागों की हानि (हिंसा) होती है। इसे सुनने वाला दरिद्रता को प्राप्त होता है और उसकी आयु का सदैव नाश होता है। (संगीत मकरन्द, श्लोक 24-26, पृ. 16)
‘गान्धारों, देवगान्धारों धन्नासी सैन्धवी तथा नारायणी, गुर्जरी या बंगाल पटमंजरी एते रागास्तु गातव्या: प्रातकाले विशेषतः’
भावार्थ / विश्लेषण: गांधार, देवगांधार, धन्नासी, सैंधवी, नारायणी, गुर्जरी और बंगाल पटमंजरी रागों को विशेष रूप से प्रातःकाल में गाना चाहिए। (संगीत मकरन्द, श्लोक 10-12, पृ. 15)
| राग का नाम | गायन समय (राग तरंगिणी के अनुसार) |
|---|---|
| भैरवी व रामकली | प्रातः कालीन |
| बिलावल | दिन का प्रथम प्रहर |
| आसावरी | दिन का तृतीय प्रहर |
| केदार | अर्धरात्रि |
| अड़ाना | रात्रि का तृतीय प्रहर |
पंडित दामोदर ने संगीत दर्पण में स्पष्ट किया कि राजा की आज्ञा होने पर या गायक/साधक की स्वेच्छा होने पर किसी भी राग को किसी भी समय गाए जाने में कोई दोष नहीं है।
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रागों को समय के आधार पर दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है:
| वर्ग का नाम | समय सीमा | वादी स्वर की स्थिति |
|---|---|---|
| पूर्व राग / पूर्वांगवादी राग | दोपहर के 12:00 बजे से रात्रि के 12:00 बजे तक | सप्तक के पूर्वांग (स रे ग म प) में से कोई स्वर |
| उत्तर राग / उत्तरांगवादी राग | रात्रि के 12:00 बजे से दोपहर के 12:00 बजे तक | सप्तक के उत्तरांग (म प ध नि सं) में से कोई स्वर |
| क्र. सं. | राग का नाम | वादी स्वर | गायन समय |
|---|---|---|---|
| 1 | यमन | ग | रात्रि का प्रथम प्रहर |
| 2 | खमाज | ग | रात्रि का प्रथम प्रहर |
| 3 | देस | रे | रात्रि का द्वितीय प्रहर |
| 4 | भूपाल | ग | रात्रि का द्वितीय प्रहर |
| क्र. सं. | राग का नाम | वादी स्वर | गायन समय |
|---|---|---|---|
| 1 | आसावरी | ध | दिन का दूसरा प्रहर |
| 2 | अल्हैया बिलावल | ध | दिन का दूसरा प्रहर |
| 3 | जौनपुरी | ध | दिन का दूसरा प्रहर |
रागों में प्रयुक्त होने वाले स्वरों के आधार पर समय सिद्धांत को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है:
दिन और रात की संधि (मिलन) के समय को संधिकाल कहते हैं। इस समय गाए जाने वाले राग संधिप्रकाश राग कहलाते हैं।
इन रागों का गायन समय संधिप्रकाश रागों के ठीक बाद आता है।
परमेल प्रवेशक राग वे राग होते हैं जो किसी एक मेल (थाट) से दूसरे मेल (थाट) में प्रवेश कराते हैं। इनमें पहले गाए जाने वाले राग और बाद में गाए जाने वाले राग दोनों के लक्षण विद्यमान होते हैं।
प्राचीन काल से रागों को इन तीन वर्गों में विभाजित करने की प्रथा चली आ रही है:
जिन रागों में शास्त्र के नियमों का पालन शुद्ध रूप में होता है और जिनमें किसी दूसरे राग की छाया नहीं आती। ये स्वतंत्र राग होते हैं।
“शास्त्रोक्त नियम नियमात रंजकत्वम् भवति।”
भावार्थ: वे राग शुद्ध हैं जो शास्त्रीय नियमानुसार गाए जाने पर रंजक (आनंददायी) होते हैं।
जिन रागों में किसी दूसरे राग की छाया दिखाई देती है। इन्हें सालक या सालग भी कहा जाता है।
‘छायालगत्वम नामान्यच्छाया लगत्वेन रक्ति हेतुत्य भवति’
भावार्थ: छायालग राग में किसी दूसरे राग की छाया आने से वे रंजक होते हैं।
जिन रागों में शुद्ध और छायालग रागों का मिश्रण होता है। इनका प्रयोग मुख्य रूप से मधुरता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
“शुद्ध छायालग मुख्त्वन रस्त्रिहेतुस्व भवति”