इस अध्याय में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के छह महत्वपूर्ण रागों का विस्तृत परिचय, उनके लक्षण, स्वर विस्तार तथा विभिन्न बंदिशों की स्वरलिपि दी गई है।
| राग का नाम | थाट | जाति | वादी / संवादी | वर्जित स्वर | मुख्य स्वर लक्षण | गायन समय |
|---|---|---|---|---|---|---|
| बागेश्री | काफी | षाड्व-संपूर्ण / औडव-संपूर्ण | म / स | आरोह में रे, प | ग, नि कोमल | मध्य रात्रि |
| आसावरी | आसावरी | औड्व-संपूर्ण | ध / ग | आरोह में ग, नि | ग, ध, नि कोमल | दिन का दूसरा प्रहर |
| देस | खमाज | औड्व-संपूर्ण | रे / प | आरोह में ग, ध | दोनों निषाद (आरोह शुद्ध, अवरोह कोमल) | रात्रि का दूसरा प्रहर |
| मालकौंस | भैरवी | औड्व-औड्व | म / स | रे, प (आरोह-अवरोह दोनों में) | ग, ध, नि कोमल, गंभीर प्रकृति | रात्रि का तीसरा प्रहर |
| काफी | काफी | संपूर्ण-संपूर्ण | प / स | कोई नहीं | ग, ni कोमल, ठुमरी/होरी हेतु उपयुक्त | मध्य रात्रि |
| शुद्ध सारंग | कल्याण | औड्व-षाड्व | रे / प | आरोह में ग, ध; अवरोह में ग | दोनों मध्यम (तीव्र व शुद्ध) का प्रयोग | मध्याह्न काल |
तीवर रिध कोमल गमनि मध्यम बादि बखानि।
खरज जहाँ संवादि है बागेसरी लखानि।।भावार्थ / विश्लेषण: राग बागेश्री में गंधार (ग) और निषाद (नि) कोमल होते हैं, मध्यम (म) वादी और षड्ज (स) संवादी स्वर होता है।
ग ध नि स्वर कोमल रहे, आरोहन ग नि हानि।
ध ग वादी-संवादी से, आसावरी पहचान।।भावार्थ / विश्लेषण: राग आसावरी में ग, ध, नि स्वर कोमल होते हैं। इसके आरोह में ग और नि वर्जित होते हैं तथा ध वादी और ग संवादी स्वर होता है।
पंचम वादी अरू रिखब संवादी संजोग।
सोरट केहि सुरनतें देस कहत है लोग।।भावार्थ / विश्लेषण: पंचम वादी और ऋषभ संवादी के संयोग से युक्त इस राग को लोग देस कहते हैं।
मृदू गमौ धनी चैव समौ संवादिवादिनौ।
परिहीनो मालकौशिर्निशीथात्परमौडुव:।।भावार्थ / विश्लेषण: कोमल ग, म, ध, नि स्वरों से युक्त, रे और प से वर्जित, रात्रि के उत्तर भाग (तीसरे प्रहर) में गाया जाने वाला औडुव जाति का राग मालकौंस है।
मृदु मध्यम गांधार है, मृदु तीवर हूँ निखाद।
काफी सुन्दर राग है, ड्रवप-स वादी-संवादी।।भावार्थ / विश्लेषण: कोमल गंधार और कोमल निषाद से युक्त, पंचम वादी और षड्ज संवादी वाला राग काफी अत्यंत सुंदर और रंजक है।
दो मध्यम अरू शुद्ध स्वर, गावत शुद्ध सारंग।
रिप संवाद औड्व-षाड्व, मध्याह्न काल आनंद।।भावार्थ / विश्लेषण: दोनों मध्यम और शेष शुद्ध स्वरों से युक्त, ऋषभ-पंचम (रे-प) संवाद वाले औड्व-षाड्व जाति के राग शुद्ध सारंग को मध्याह्न काल में गाने से आनंद की प्राप्ति होती है।