Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 6: राग परिचय एवं बंदिशें

राग परिचय एवं तुलनात्मक तालिका

इस अध्याय में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के छह महत्वपूर्ण रागों का विस्तृत परिचय, उनके लक्षण, स्वर विस्तार तथा विभिन्न बंदिशों की स्वरलिपि दी गई है।

राग का नामथाटजातिवादी / संवादीवर्जित स्वरमुख्य स्वर लक्षणगायन समय
बागेश्रीकाफीषाड्व-संपूर्ण / औडव-संपूर्णम / सआरोह में रे, पग, नि कोमलमध्य रात्रि
आसावरीआसावरीऔड्व-संपूर्णध / गआरोह में ग, निग, ध, नि कोमलदिन का दूसरा प्रहर
देसखमाजऔड्व-संपूर्णरे / पआरोह में ग, धदोनों निषाद (आरोह शुद्ध, अवरोह कोमल)रात्रि का दूसरा प्रहर
मालकौंसभैरवीऔड्व-औड्वम / सरे, प (आरोह-अवरोह दोनों में)ग, ध, नि कोमल, गंभीर प्रकृतिरात्रि का तीसरा प्रहर
काफीकाफीसंपूर्ण-संपूर्णप / सकोई नहींग, ni कोमल, ठुमरी/होरी हेतु उपयुक्तमध्य रात्रि
शुद्ध सारंगकल्याणऔड्व-षाड्वरे / पआरोह में ग, ध; अवरोह में गदोनों मध्यम (तीव्र व शुद्ध) का प्रयोगमध्याह्न काल
1. राग बागेश्री (Raga Bageshri)

राग लक्षण एवं परिचय

  • थाट: काफी थाट से उत्पन्न।
  • स्वर: गंधार (ग) और निषाद (नि) कोमल, शेष सभी स्वर शुद्ध।
  • वादी-संवादी: वादी स्वर मध्यम (म) तथा संवादी स्वर षड्ज (स) है।
  • गायन समय: मध्य रात्रि।
  • जाति: षाड्व-संपूर्ण (आरोह में ऋषभ 'रे' वर्जित है, अवरोह में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं। कुछ स्थानों पर इसे औडव-संपूर्ण भी माना जाता है क्योंकि आरोह में पंचम 'प' भी वर्जित रहता है)।
  • विशेषता: अवरोह में पंचम (प) का प्रयोग वक्र रूप से (म प ध म ग रे स) किया जाता है, जो राग की रंजकता बढ़ाता है।

शास्त्रीय श्लोक

तीवर रिध कोमल गमनि मध्यम बादि बखानि।
खरज जहाँ संवादि है बागेसरी लखानि।।


भावार्थ / विश्लेषण: राग बागेश्री में गंधार (ग) और निषाद (नि) कोमल होते हैं, मध्यम (म) वादी और षड्ज (स) संवादी स्वर होता है।

आरोह, अवरोह एवं पकड़

  • आरोह: नि़ स ग म ध नि सं
  • अवरोह: सं नि ध म प ध म ग रे स
  • पकड़: ध़ नि़ स म, ध नि ध, म प ध म ग, म ग रे स

प्रमुख बंदिशें

  • विलंबित ख्याल (एकताल): "मोहे मनावन आए हो, सगरी रतियाँ किन सौतन घर जागे" (स्थायी), "तें तो रंगीले छबि दिखलाए लालन के मन ललचावे" (अंतरा)।
  • छोटा ख्याल (त्रिताल - मध्य लय): "कौन गत भई ली मोरी रे पिया न पूछे एक हूँ बात" (स्थायी), "एक बन ढूँडी, सकल बन ढूँडी डार डार कर पात" (अंतरा)।
  • छोटा ख्याल (त्रिताल - मध्य लय): "कौन करत तोरी बिनति पियरवा मानो न मानो हमरी बात" (स्थायी)।
  • मसीतखानी गत (तीनताल) और रज़ाखानी गत (तीनताल) सितार वादन हेतु।
2. राग आसावरी (Raga Asavari)

राग लक्षण एवं परिचय

  • थाट: आसावरी थाट से उत्पन्न।
  • स्वर: गंधार (ग), धैवत (ध) और निषाद (नि) कोमल, शेष स्वर शुद्ध।
  • वादी-संवादी: वादी स्वर धैवत (ध) तथा संवादी स्वर गंधार (ग) है।
  • गायन समय: दिन का दूसरा प्रहर।
  • जाति: औड्व-संपूर्ण (आरोह में गंधार 'ग' और निषाद 'नि' वर्जित हैं, अवरोह में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं)।
  • समान राग: राग जौनपुरी इससे मिलता-जुलता राग है।

शास्त्रीय श्लोक

ग ध नि स्वर कोमल रहे, आरोहन ग नि हानि।
ध ग वादी-संवादी से, आसावरी पहचान।।


भावार्थ / विश्लेषण: राग आसावरी में ग, ध, नि स्वर कोमल होते हैं। इसके आरोह में ग और नि वर्जित होते हैं तथा ध वादी और ग संवादी स्वर होता है।

आरोह, अवरोह एवं पकड़

  • आरोह: सा रे म प ध, सां
  • अवरोह: सां नि ध प म ग रे सा
  • पकड़: रे म प नि ध प, म प ध म प ग, रे स

प्रमुख बंदिशें

  • छोटा ख्याल (त्रिताल - मध्य लय): "अँखिया लागी रहत निसदिन प्यारे तिहारे देखन काहि" (स्थायी), "घरिपल छिन मोहे जुग सी बीतत निसदिन चटपटि लाग रहत महि" (अंतरा)।
  • छोटा ख्याल (त्रिताल - मध्य लय): "अरे मन समझ-समझ पग धरिए..." (स्थायी)।
  • मसीतखानी एवं रज़ाखानी गत (तीनताल) वादन हेतु।
3. राग देस (Raga Des)

राग लक्षण एवं परिचय

  • थाट: खमाज थाट से उत्पन्न।
  • स्वर: दोनों निषाद (नि) का प्रयोग होता है—आरोह में शुद्ध 'नि' तथा अवरोह में कोमल 'नि'। अन्य सभी स्वर शुद्ध हैं।
  • वादी-संवादी: वादी स्वर ऋषभ (रे) तथा संवादी स्वर पंचम (प) है।
  • गायन समय: रात्रि का दूसरा प्रहर।
  • जाति: औड्व-संपूर्ण (आरोह में गंधार 'ग' और धैवत 'ध' वर्जित हैं, अवरोह में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं)।

शास्त्रीय श्लोक

पंचम वादी अरू रिखब संवादी संजोग।
सोरट केहि सुरनतें देस कहत है लोग।।


भावार्थ / विश्लेषण: पंचम वादी और ऋषभ संवादी के संयोग से युक्त इस राग को लोग देस कहते हैं।

आरोह, अवरोह एवं पकड़

  • आरोह: सा रे म प नि सां
  • अवरोह: सं नि ध प म ग रे स
  • पकड़: रे मप नि धप, म प धऽ म ग रे गऽ नि़ स

प्रमुख बंदिशें

  • धमार: "साँवरे रंग डार गयो, मै तो बौराई जाने कहाँ कछु कीनों" (स्थायी), "सुध बुध छीन लई, छीन माई ऐसो महादुख दीनों, सावरे रंग" (अंतरा)।
  • छोटा ख्याल (त्रिताल - मध्य लय): "मेहा रे बन-बन डार-डार मुरला बोले मेहा बौछारन बरसे मे" (स्थायी)।
  • छोटा ख्याल (तीनताल): "झूम-झूम आए कारे-कारे बदरा..." (स्थायी)।
  • तराना (तीनताल): "तदिया रे त दीम्तनन..." (रचनाकार: श्रीगुरू लालाबोबा देशपांडे)।
  • मसीतखानी एवं रज़ाखानी गत (तीनताल)।
4. राग मालकौंस (Raga Malkauns)

राग लक्षण एवं परिचय

  • थाट: भैरवी थाट से उत्पन्न।
  • स्वर: ऋषभ (रे) और पंचम (प) स्वर आरोह एवं अवरोह दोनों में वर्जित हैं। गंधार (ग), धैवत (ध) और निषाद (नि) कोमल प्रयुक्त होते हैं।
  • वादी-संवादी: वादी स्वर मध्यम (म) तथा संवादी स्वर षड्ज (स) है।
  • गायन समय: रात्रि का तीसरा प्रहर।
  • जाति: औड्व-औड्व (पाँच स्वर आरोह में, पाँच अवरोह में)।
  • प्रकृति: यह गंभीर प्रकृति का अत्यंत लोकप्रिय और प्राचीन राग है।

शास्त्रीय श्लोक

मृदू गमौ धनी चैव समौ संवादिवादिनौ।
परिहीनो मालकौशिर्निशीथात्परमौडुव:।।


भावार्थ / विश्लेषण: कोमल ग, म, ध, नि स्वरों से युक्त, रे और प से वर्जित, रात्रि के उत्तर भाग (तीसरे प्रहर) में गाया जाने वाला औडुव जाति का राग मालकौंस है।

आरोह, अवरोह एवं पकड़

  • आरोह: नि़ सा ग म ध नि सां
  • अवरोह: सां नि ध म ग म ग सा
  • पकड़: ध़ नि़ स म, ग म ग स

प्रमुख बंदिशें

  • विलंबित ख्याल (एकताल): "पगला गन दे महाराज कुँवर" (स्थायी), "सदा रंगीली पीतमुने पावन दे" (अंतरा)।
  • छोटा ख्याल (तीनताल): "कोयलिया बोले अमुवा डार पर, ॠतु बसंत को देत संदेसवा" (स्थायी)।
  • ध्रुपद (चौताल): "पूजन चली महादेव चंद्रवदनी मृगनयनी हंस गमनी पारवती" (रचनाकार: उस्ताद वासिफुद्दीन डागर)।
  • मसीतखानी एवं रज़ाखानी गत (तीनताल)।
5. राग काफी (Raga Kafi)

राग लक्षण एवं परिचय

  • थाट: काफी थाट का आश्रय राग।
  • स्वर: गंधार (ग) और निषाद (नि) कोमल, शेष सभी स्वर शुद्ध। कभी-कभी सौंदर्यवर्धन हेतु शुद्ध गंधार और शुद्ध निषाद का अल्प प्रयोग भी किया जाता है।
  • वादी-संवादी: वादी स्वर पंचम (प) तथा संवादी स्वर षड्ज (स) है।
  • गायन समय: मध्य रात्रि (कुछ विद्वान इसे सायंकाल भी मानते हैं)।
  • जाति: संपूर्ण-संपूर्ण (आरोह और अवरोह दोनों में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं)।
  • विशेषता: इस राग में ठुमरी, दादरा, होरी और टप्पा गाने का विशेष प्रचलन है।

शास्त्रीय श्लोक

मृदु मध्यम गांधार है, मृदु तीवर हूँ निखाद।
काफी सुन्दर राग है, ड्रवप-स वादी-संवादी।।


भावार्थ / विश्लेषण: कोमल गंधार और कोमल निषाद से युक्त, पंचम वादी और षड्ज संवादी वाला राग काफी अत्यंत सुंदर और रंजक है।

आरोह, अवरोह एवं पकड़

  • आरोह: सा रे, ग, म, प, ध नि सां
  • अवरोह: सां नि ध, प, म ग, रे, सा
  • पकड़: सा सा, रे रे, ग ग, म म, प

प्रमुख बंदिशें

  • छोटा ख्याल (त्रिताल): "कदर पिया नैया मोरि कैसे लागे पार, तू खेवट अनाड़ी हूँ ठाड़‍ि मझधार" (स्थायी)।
  • छोटा ख्याल (त्रिताल): "जिन डारो रंग मानो गिरीधारी मोरी बात..." (स्थायी)।
  • छोटा ख्याल (त्रिताल - मध्य लय): "छाँड़ो-छाँड़ो छैला मोरि बैंयाँ दुखत मोरि नरम कलाई..." (स्थायी)।
  • मसीतखानी एवं रज़ाखानी गत (तीनताल)।
6. राग शुद्ध सारंग (Raga Shuddha Sarang)

राग लक्षण एवं परिचय

  • थाट: कल्याण थाट से उत्पन्न माना जाता है।
  • स्वर: दोनों मध्यम (म) का प्रयोग होता है—आरोह में तीव्र मध्यम (म ।) तथा अवरोह में शुद्ध मध्यम (म)। शेष सभी स्वर शुद्ध हैं।
  • वादी-संवादी: वादी स्वर ऋषभ (रे) तथा संवादी स्वर पंचम (प) है।
  • गायन समय: मध्याह्न काल (दोपहर)।
  • जाति: औड्व-षाड्व (आरोह में गंधार 'ग' और धैवत 'ध' वर्जित हैं; अवरोह में केवल गंधार 'ग' वर्जित है)।
  • विशेषता: यह गंभीर प्रकृति का राग है। इसका चलन विशेष रूप से मन्द्र और मध्य सप्तकों में अधिक होता है।

शास्त्रीय श्लोक

दो मध्यम अरू शुद्ध स्वर, गावत शुद्ध सारंग।
रिप संवाद औड्व-षाड्व, मध्याह्न काल आनंद।।


भावार्थ / विश्लेषण: दोनों मध्यम और शेष शुद्ध स्वरों से युक्त, ऋषभ-पंचम (रे-प) संवाद वाले औड्व-षाड्व जाति के राग शुद्ध सारंग को मध्याह्न काल में गाने से आनंद की प्राप्ति होती है।

आरोह, अवरोह एवं पकड़

  • आरोह: नि़ सा, म रे, म । प, नि सां
  • अवरोह: सां नि, ध प, म । प, म रे, नि़ सा
  • पकड़: मरे, म । प, म रे, सा, नि़ ध़ सा नि़ रे सा

प्रमुख बंदिशें

  • ध्रुपद (चौताल): "आज तो बधाई भई, भवन-भवन बाज रही, महाराजा दशरथ घर प्रगटे सुखधाम धाम" (रचनाकार: उस्ताद वासिफुद्दीन डागर)।
  • बड़ा ख्याल (विलंबित एकताल): "तुम तो बड़े बिरागी हम तो निपट अनाड़ी ग्वालिन श्याम रूप अनुरागी" (स्थायी)।
  • छोटा ख्याल (तीनताल): "अब मोरी बात मान ले पिहरवा जाऊँ मैं तोपे वारी-वारी-वारी" (स्थायी)।
  • मसीतखानी एवं रज़ाखानी गत (तीनताल)।
7. अभ्यास प्रश्न एवं स्व-मूल्यांकन

महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. राग बागेश्री और राग काफी के थाट, वादी-संवादी और गायन समय में क्या अंतर है?
  2. राग शुद्ध सारंग में दोनों मध्यमों का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है? स्पष्ट कीजिए।
  3. राग मालकौंस की जाति औड्व-औड्व क्यों है? इसमें कौन-से स्वर वर्जित हैं?
  4. राग देस में प्रयुक्त होने वाले दोनों निषादों का नियम क्या है?
  5. राग आसावरी का परिचय देते हुए इसके आरोह, अवरोह और पकड़ को लिखिए।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

  • राग बागेश्री का वादी स्वर मध्यम (म) तथा संवादी स्वर षड्ज (स) है।
  • राग आसावरी का गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है।
  • राग देस की उत्पत्ति खमाज थाट से मानी जाती है।
  • राग मालकौंस में ऋषभ (रे) और पंचम (प) स्वर वर्जित हैं।
  • राग काफी की जाति संपूर्ण-संपूर्ण है।