भारतीय संगीत में वाद्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन काल से ही वाद्यों के विकास और उनके वर्गीकरण पर निरंतर शोध होता रहा है।
भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में वाद्यों को चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है:
| वर्ग | लक्षण | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|
| तत् (तंत्री) | तारों के कंपन से स्वर उत्पन्न करने वाले वाद्य | तानपूरा, सितार, वीणा, सरोद, वॉयलिन, सारंगी |
| अवनद्ध | चमड़े से मढ़े हुए आघात वाद्य | तबला, पखावज, मृदंग, चेण्डा, नगाड़ा, पुंग |
| सुषिर | फूँक या हवा के दबाव से बजने वाले वाद्य | बाँसुरी, शहनाई, नागस्वरम्, क्लेरिनेट, हारमोनियम |
| घन | ठोस धातु या लकड़ी से बने आघात वाद्य | जलतरंग, घटम्, मंजीरा, चिपलाकट्टा |
तत तंत्री वाद्य, पुष्कर अवनद्ध वाद्य, ताल घन वाद्य एवं वंशी सुषिर वाद्य हैं।
भावार्थ / विश्लेषण: भरत मुनि के अनुसार तंत्री (तार) वाले वाद्य 'तत', पुष्कर (चमड़े से मढ़े) वाद्य 'अवनद्ध', ताल देने वाले ठोस वाद्य 'घन' और वंशी (बाँसुरी) जैसे वाद्य 'सुषिर' कहलाते हैं।
तानपूरा को देश के विभिन्न क्षेत्रों में तम्बुरा या तमूरा भी कहा जाता है। यह शास्त्रीय गायन और वादन में आधार स्वर (ड्रोन) प्रदान करने वाला मुख्य वाद्य है।
सितार भारत का अत्यंत लोकप्रिय तंत्री वाद्य है। इसके प्रमुख प्रचारकों में भारत रत्न पंडित रवि शंकर, उस्ताद विलायत खाँ, पंडित निखिल बैनर्जी और पंडित देव चौधरी शामिल हैं।
वीणा भारत का प्राचीनतम वाद्य है, जिसे विद्या की देवी माँ सरस्वती का वाद्य माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे वान भी कहा गया है।
चेण्डा दक्षिण भारत (विशेषकर केरल) का एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक अवनद्ध वाद्य है।
नगाड़ा भारत का एक प्राचीन और ऐतिहासिक वाद्य है जिसे प्राचीन काल में दुन्दुभि कहा जाता था।
पुंग मणिपुर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पारंपरिक अवनद्ध वाद्य है जो मृदंग या खोल के समान दिखाई देता है।
नागस्वरम् (या नादस्वरम्) दक्षिण भारत का एक अत्यंत पवित्र और मांगलिक वाद्य है, जो शहनाई के समान फूँक कर बजाया जाता है।
जलतरंग पानी और धातु/काँच के संयोजन से बजने वाला एक अनूठा वाद्य है, जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों संगीत पारिजात और संगीत सार में मिलता है।
घटम् मिट्टी से बना एक घड़े के आकार का अत्यंत प्राचीन लय वाद्य है।
भारत के विभिन्न लोक नृत्यों में लयबद्धता और सौंदर्य उत्पन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के लकड़ी के डाँड़ों का उपयोग किया जाता है:
| वाद्य / डाँड़ | संबंधित राज्य / क्षेत्र | विशेषता एवं उपयोग |
|---|---|---|
| डांडिया | गुजरात | रास नृत्य में प्रयुक्त होने वाली दो रंगीन लकड़ियाँ जो नृत्य को व्यवस्थित और लयात्मक बनाती हैं। |
| छड़ | राजस्थान एवं मैसूर | डांडिया से लंबी लकड़ी, जो त्योहारों और लोक गीतों में प्रयुक्त होती है। |
| कोलट्टमकरा | आंध्र प्रदेश | रंगीन कपड़ों से लिपटी या रंगी हुई छोटी लकड़ियाँ, जिससे एक विशिष्ट नृत्य शैली का विकास हुआ है। |
| टिप्पनी | गुजरात (कोली जनजाति) | बाँस की छड़ के नीचे वर्गाकार लकड़ी के ब्लॉक लगाकर जमीन पर थाप देने के लिए प्रयुक्त। |
| चिपलाकट्टा | केरल | शीशम की लकड़ी से बना 6 इंच का वाद्य, जिसमें मंजीरे की तरह रस्सी पिरोकर और मोती डालकर मधुर ध्वनि उत्पन्न की जाती है। मन्दिरों में विशेष रूप से प्रयुक्त। |