Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 7: हिन्दुस्तानी संगीत में वाद्य यंत्र

परिचय एवं वर्गीकरण

भारतीय संगीत में वाद्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन काल से ही वाद्यों के विकास और उनके वर्गीकरण पर निरंतर शोध होता रहा है।

वाद्यों का चतुर्विध वर्गीकरण

भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में वाद्यों को चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है:

वर्गलक्षणप्रमुख उदाहरण
तत् (तंत्री)तारों के कंपन से स्वर उत्पन्न करने वाले वाद्यतानपूरा, सितार, वीणा, सरोद, वॉयलिन, सारंगी
अवनद्धचमड़े से मढ़े हुए आघात वाद्यतबला, पखावज, मृदंग, चेण्डा, नगाड़ा, पुंग
सुषिरफूँक या हवा के दबाव से बजने वाले वाद्यबाँसुरी, शहनाई, नागस्वरम्, क्लेरिनेट, हारमोनियम
घनठोस धातु या लकड़ी से बने आघात वाद्यजलतरंग, घटम्, मंजीरा, चिपलाकट्टा

तत तंत्री वाद्य, पुष्कर अवनद्ध वाद्य, ताल घन वाद्य एवं वंशी सुषिर वाद्य हैं।


भावार्थ / विश्लेषण: भरत मुनि के अनुसार तंत्री (तार) वाले वाद्य 'तत', पुष्कर (चमड़े से मढ़े) वाद्य 'अवनद्ध', ताल देने वाले ठोस वाद्य 'घन' और वंशी (बाँसुरी) जैसे वाद्य 'सुषिर' कहलाते हैं।

तत् (तंत्री) वाद्य

तानपूरा (Tanpura)

तानपूरा को देश के विभिन्न क्षेत्रों में तम्बुरा या तमूरा भी कहा जाता है। यह शास्त्रीय गायन और वादन में आधार स्वर (ड्रोन) प्रदान करने वाला मुख्य वाद्य है।

  • बनावट: इसका मुख्य भाग गोल कद्दू (काशीफल/सीताफल) से बनता है जिसे आधा काटकर लकड़ी से ढका जाता है, जिसे तबली कहते हैं।
  • लकड़ी: उत्तर भारत में यह तुन या टीक की लकड़ी से और दक्षिण भारत में कठहल की लकड़ी से बनाया जाता है।
  • वैज्ञानिक पक्ष: तारों की लंबाई और मोटाई के आधार पर इसकी ध्वनि निर्धारित होती है। महिला और पुरुष गायकों के तानपूरे का स्केल अलग होने के कारण उनके तारों की लंबाई में अंतर होता है। ऊंचे स्केल (जैसे c# से D#) के लिए तार की लंबाई कम होती है।
  • वादन विधि: बीच की उँगली से पहला तार (जो मध्यम या पंचम स्वर में मिला होता है) छेड़ा जाता है। बीच के दो तार तार सप्तक के षड्ज में मिले होते हैं और आखिरी ताँबे का तार आधार स्वर (मंद्र षड्ज) में मिला होता है, जिसे तर्जनी उँगली से बजाया जाता है।

सितार (Sitar)

सितार भारत का अत्यंत लोकप्रिय तंत्री वाद्य है। इसके प्रमुख प्रचारकों में भारत रत्न पंडित रवि शंकर, उस्ताद विलायत खाँ, पंडित निखिल बैनर्जी और पंडित देव चौधरी शामिल हैं।

  • बनावट एवं अंग: इसका निचला भाग गोल कद्दू का बना होता है जिसे तुम्बा कहते हैं। इसके ऊपर लकड़ी की पट्टी तबली होती है। तुम्बे से जुड़ी लंबी लकड़ी को डाँड़ कहते हैं। डाँड़ पर पीतल या लोहे के 17 से 24 परदे (जिन्हें सुंदरी भी कहते हैं) बाँधे जाते हैं।
  • तार एवं खूँटियाँ: सितार में मुख्य रूप से 7 तार होते हैं जिन्हें खूँटियों से कसा जाता है। इसके अतिरिक्त परदों के नीचे तरब के तार होते हैं जो मुख्य स्वरों के साथ झंकृत होते हैं।
  • महत्वपूर्ण अंग: अटी (तार रखने की पहली पट्टी), तारगहन (छिद्रों वाली पट्टी), धड़च या बृज (चौकी), और मनका (बारीक ट्यूनिंग के लिए मोती)। इसे मिज़राब पहनकर बजाया जाता है।

वीणा (Veena)

वीणा भारत का प्राचीनतम वाद्य है, जिसे विद्या की देवी माँ सरस्वती का वाद्य माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे वान भी कहा गया है।

  • ऐतिहासिक संदर्भ: संहिता, उपनिषद और नाट्यशास्त्र में गोद वीणा, करकरीकस वाण, काण्ड वीणा, चित्र वीणा (7 तार) और विपञ्ची वीणा (9 तार) का उल्लेख मिलता है। तमिल ग्रंथ सिलापदीकरम में भी विभिन्न तारों वाली वीणाओं का वर्णन है।
  • सरस्वती वीणा: यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है। यह कठहल की लकड़ी से बनती है। इसके मुख्य अंग कुडम (लकड़ी की प्लेट), चली (शेर की आकृति), कुदीरई (बृज), और चार मुख्य तार जिन्हें सरणी कहते हैं, होते हैं। तारों को नीचे नाग पाशा से बाँधा जाता है।
  • रुद्र वीणा: इसका उल्लेख संगीत मकरंद ग्रंथ में मिलता है। इसे बीन भी कहा जाता है और ध्रुपद घराने के कलाकार (बीनकार) इसे बजाते हैं। इसमें दो बड़े तुम्बे होते हैं और 19 से 23 परदे होते हैं।
अवनद्ध वाद्य

चेण्डा (Chenda)

चेण्डा दक्षिण भारत (विशेषकर केरल) का एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक अवनद्ध वाद्य है।

  • बनावट: यह कठहल की लकड़ी से बना एक बेलनाकार वाद्य है, जिसकी लंबाई लगभग 60 सेमी और व्यास 22 सेमी होता है। इसके दोनों मुखों पर चमड़ा मढ़ा होता है जिसे बाँस के छल्लों से कसा जाता है।
  • वादन शैली: इसे गले में रस्सी से लटकाकर दो छोटी डंडियों से बजाया जाता है। इसका उपयोग कथकली और कुडियट्टम नृत्य-नाटकों में प्रमुखता से होता है।
  • प्रकार: इसके प्रमुख प्रकारों में अच्छन चेण्डा, विक्कन चेण्डा और उरुत् चेण्डा शामिल हैं।

नगाड़ा (Nagada)

नगाड़ा भारत का एक प्राचीन और ऐतिहासिक वाद्य है जिसे प्राचीन काल में दुन्दुभि कहा जाता था।

  • बनावट: यह अर्धगोलाकार आकृति का होता है जिसे मिट्टी, लकड़ी, पीतल या अष्टधातु से बनाया जाता है और इसके ऊपर चमड़ा मढ़ा जाता है।
  • क्षेत्रीय नाम: उत्तर प्रदेश में इसे नगेरी या नक्काड़ा, और गुजरात, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में टुडबुडी कहा जाता है। इसे बजाने वाली छोटी डंडियों को द्धोब कहते हैं।
  • दुक्कड़: नगाड़े का छोटा रूप दुक्कड़ कहलाता है, जो शहनाई के साथ बजाया जाता है। इसका उल्लेख अबुल फ़ज़ल की पुस्तक आइने अकबरी में भी मिलता है।

पुंग (Pung)

पुंग मणिपुर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पारंपरिक अवनद्ध वाद्य है जो मृदंग या खोल के समान दिखाई देता है।

  • विशेषताएँ: यह लकड़ी से बना होता है और इसे गले में लटकाकर दोनों हाथों की थाप से बजाया जाता है। इसका दाहिना सिरा बाएँ सिरे से बड़ा होता है।
  • सांस्कृतिक महत्व: मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य में इसका विशेष स्थान है, और इसे बजाते हुए किए जाने वाले नृत्य को पुंगचोलोम कहा जाता है।
सुषिर वाद्य

नागस्वरम् (Nagaswaram)

नागस्वरम् (या नादस्वरम्) दक्षिण भारत का एक अत्यंत पवित्र और मांगलिक वाद्य है, जो शहनाई के समान फूँक कर बजाया जाता है।

  • बनावट: इसकी लंबाई लगभग 2 फीट होती है और यह अचमेरन वृक्ष की लकड़ी से बनता है। इसके दो मुख्य भाग होते हैं: रीड (फूँकने वाला हिस्सा) और ट्यूब (त्रिकोणाकार नली)।
  • छिद्र: इसमें कुल 12 छिद्र होते हैं, जिनमें से 7 खुले होते हैं (जिनसे स्वर निकाले जाते हैं) और शेष 5 छिद्रों को मोम (बी-वैक्स) से बंद रखा जाता है।
  • प्रसिद्ध कलाकार: टी. एन. राजारतमपिल्लै और कारूकरीची अरूणाचलम इसके विश्वप्रसिद्ध वादक रहे हैं।
घन वाद्य

जलतरंग (Jaltarang)

जलतरंग पानी और धातु/काँच के संयोजन से बजने वाला एक अनूठा वाद्य है, जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों संगीत पारिजात और संगीत सार में मिलता है।

  • संरचना: इसमें पीतल या चीनी मिट्टी के 22 प्याले होते हैं। प्रत्येक प्याले में पानी की मात्रा को मापकर अलग-अलग स्वर (श्रुति) निर्धारित किए जाते हैं।
  • वादन: इसे बाँस की दो पतली डंडियों से प्यालों के किनारों पर आघात करके बजाया जाता है।

घटम् (Ghatam)

घटम् मिट्टी से बना एक घड़े के आकार का अत्यंत प्राचीन लय वाद्य है।

  • क्षेत्रीय विविधता: कश्मीर में इसे नूट कहा जाता है। गोवा में इसका एक छोटा रूप प्रचलित है जिसे घूमट कहते हैं, जिसके ऊपर चमड़ा मढ़ा होता है।
  • वादन तकनीक: इसे दोनों हाथों की हथेलियों, उँगलियों, नाखूनों और पेट/बाहों की थाप से बजाया जाता है। इसके प्रसिद्ध वादकों में विक्कू विनायकराम का नाम सर्वोपरि है।

लकड़ी के डाँड़ (Wooden Sticks in Folk Dances)

भारत के विभिन्न लोक नृत्यों में लयबद्धता और सौंदर्य उत्पन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के लकड़ी के डाँड़ों का उपयोग किया जाता है:

वाद्य / डाँड़संबंधित राज्य / क्षेत्रविशेषता एवं उपयोग
डांडियागुजरातरास नृत्य में प्रयुक्त होने वाली दो रंगीन लकड़ियाँ जो नृत्य को व्यवस्थित और लयात्मक बनाती हैं।
छड़राजस्थान एवं मैसूरडांडिया से लंबी लकड़ी, जो त्योहारों और लोक गीतों में प्रयुक्त होती है।
कोलट्‍टमकराआंध्र प्रदेशरंगीन कपड़ों से लिपटी या रंगी हुई छोटी लकड़ियाँ, जिससे एक विशिष्ट नृत्य शैली का विकास हुआ है।
टिप्पनीगुजरात (कोली जनजाति)बाँस की छड़ के नीचे वर्गाकार लकड़ी के ब्लॉक लगाकर जमीन पर थाप देने के लिए प्रयुक्त।
चिपलाकट्टाकेरलशीशम की लकड़ी से बना 6 इंच का वाद्य, जिसमें मंजीरे की तरह रस्सी पिरोकर और मोती डालकर मधुर ध्वनि उत्पन्न की जाती है। मन्दिरों में विशेष रूप से प्रयुक्त।
अभ्यास प्रश्न एवं मूल्यांकन

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. सुषिर वाद्य नागस्वरम् में कितने खुले छिद्र होते हैं? (उत्तर: सात)
  2. कोलट्‍टमकरा किस वाद्य की श्रेणी में आता है? (उत्तर: घन)
  3. 'पुंग' वाद्य किस प्रदेश का विशेष वाद्य है? (उत्तर: मणिपुर)
  4. चेण्डा किस तरह का वाद्य है? (उत्तर: ऊर्ध्वक / अवनद्ध)
  5. रुद्र वीणा में तारों की संख्या कितनी होती है? (उत्तर: सात)
  6. तुम्बा किस तरह के वाद्यों का भाग होता है? (उत्तर: तंत्री)
  7. कुछ शताब्दियों पूर्व सभी तंत्री वाद्यों को क्या कहा जाता था? (उत्तर: वीणा)
  8. तानपूरा और सितार किस वाद्य वर्गीकरण के अंतर्गत आते हैं? (उत्तर: तंत्री / तत्)
  9. इनमें से किस वाद्य को मिज़राब से बजाते हैं? (उत्तर: सितार)
  10. काँच के प्याले में पानी भरकर किस वाद्य को बनाया गया? (उत्तर: जलतरंग)

दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न

  • प्रश्न 1: तानपूरे का चित्र बनाकर उसके विभिन्न अंगों (तबली, तुम्बा, डाँड़, खूँटी, मनका, ब्रिज) को अंकित कीजिए।
  • प्रश्न 2: तंत्री वाद्य सितार, तानपूरा और वीणा की बनावट और कार्यप्रणाली में क्या समानताएँ और अंतर हैं? स्पष्ट कीजिए।
  • प्रश्न 3: अवनद्ध वाद्यों पर मढ़ी जाने वाली खाल की विशेषताओं और उसे बाँधने की वैज्ञानिक विधियों पर प्रकाश डालिए।
  • प्रश्न 4: सरस्वती वीणा की बनावट, इतिहास और उसके विभिन्न अंगों का सविस्तार वर्णन कीजिए।