Sangeet: Class 12 (Book 2) — Chapter 8: प्रमुख तालों के ठेके एवं लयकारी

तालों का सामान्य परिचय एवं परिभाषा

संगीत में समय नापने के साधन को ताल कहते हैं। यह संगीत में व्यतीत हो रहे समय को मापने का एक महत्वपूर्ण साधन है जो विभिन्न मात्राओं, विभागों, ताली और खाली के योग से बनता है। ताल संगीत को अनुशासित करता है और उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है।

ठेका (Theka) की परिभाषा

  • किसी भी ताल का वह मूल बोल जिसके द्वारा उस ताल की पहचान होती है, उस ताल का ठेका कहलाती है।
  • ठेके की रचना ताल की प्रकृति, यति-गति, ताली, खाली, विभाग आदि को ध्यान में रखकर की जाती है।
  • उत्तर भारतीय संगीत में प्रयुक्त तालों के ठेके इसकी निजी विशेषता हैं। कुछ प्रचलित तालों को छोड़कर कई तालों के अलग-अलग ठेके भी प्रचार में देखने को मिलते हैं।
प्रमुख तालों का विस्तृत विवरण एवं लयकारी

1. त्रिताल (तीनताल)

त्रिताल अथवा तीनताल तबले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, लोकप्रिय एवं प्रचलित ताल है। इसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत, उपशास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत और फिल्म संगीत तक में होता है। यह विलंबित से द्रुत लय तक में बजाया जाता है।

  • मात्राएँ: 16 मात्राएँ
  • विभाग: 4 विभाग (प्रत्येक विभाग में 4-4 मात्राएँ)
  • ताली: पहली (1), पाँचवीं (5) और तेरहवीं (13) मात्रा पर
  • खाली: नौवीं (9) मात्रा पर
  • जाति: चतुस्र जाति की ताल (सम पदीताल)
  • समान ताल: दक्षिण भारत का आदिताल इसके समान है। तिलवाड़ा, पंजाबी अद्धा एवं जत (16 मात्रा) इसके ही प्रकार हैं।
मात्रा12345678910111213141516
बोलधाधिंधिंधाधाधिंधिंधाधातिंतिंताताधिंधिंधा
चिह्न×203

2. झपताल

झपताल एक अत्यंत लोकप्रिय और प्रचलित ताल है। इसका प्रयोग विलंबित और मध्य लय के ख्याल एवं गतों की संगत के लिए किया जाता है। सादरा गायन शैली की संगति भी झपताल द्वारा ही होती है। तबले का एकल वादन भी इसमें होता है।

  • मात्राएँ: 10 मात्राएँ
  • विभाग: 4 विभाग (2/3/2/3 मात्राओं के विभाजन के कारण यह विषमपदी ताल है)
  • ताली: पहली (1), तीसरी (3) और आठवीं (8) मात्रा पर
  • खाली: छठी (6) मात्रा पर
  • जाति: खंड जाति की ताल
मात्रा12345678910
बोलधीनाधीधीनातीनाधीधीना
चिह्न×203

3. रूपक ताल

रूपक ताल तबले का लोकप्रिय और प्रचलित ताल है। इसका प्रयोग शास्त्रीय, उपशास्त्रीय तथा सुगम संगीत में किया जाता है। मध्य लय और विलंबित लय का ख्याल गायन भी इसमें प्रचलित है। गीत, भजन, गज़ल एवं तंत्री तथा सुषिर वाद्यों की संगत के लिए भी इसका प्रयोग होता है।

  • मात्राएँ: 7 मात्राएँ
  • विभाग: 3 विभाग (3/2/2 मात्राओं के विभाजन के कारण यह मिश्र जाति का विषम पदीताल है)
  • विशेषता: यह एकमात्र ऐसा ताल है जिसके सम पर खाली है।
  • ताली: चौथी (4) और छठी (6) मात्रा पर
  • खाली: पहली (1) मात्रा पर
  • समान ताल: पखावज का तीव्रा ताल और कर्नाटक संगीत का तिस्र जाति त्रिपुट ताल इसके सदृश हैं।
मात्रा1234567
बोलतींतींनाधीनाधीना
चिह्न⊗12

4. सूलताल

सूलताल पखावज का लोकप्रिय और प्रचलित ताल है। इसका वादन मध्य और द्रुत लय में होता है। ध्रुपद अंग के गायन और वादन के साथ इसका वादन होता है। पखावज पर स्वतंत्र वादन के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके बोल खुले और ज़ोरदार होते हैं।

  • मात्राएँ: 10 मात्राएँ
  • विभाग: 5 विभाग (प्रत्येक विभाग में 2-2 मात्राएँ, सम पदीताल)
  • ताली: पहली (1), पाँचवीं (5) और सातवीं (7) मात्रा पर
  • खाली: तीसरी (3) और नौवीं (9) मात्रा पर
  • जाति: चतुस्र जाति की ताल
मात्रा12345678910
बोलधाधादिंताकिटधातिटकतगदिगन
चिह्न×0234

5. तीव्रा या तेवरा

तीव्रा पखावज का प्राचीन, महत्वपूर्ण और प्रचलित ताल है जो तबला वादकों में भी लोकप्रिय है। तेज़ गति में बजने के कारण ही इसका नाम तीव्रा पड़ा। ध्रुपद अंग के गायन और वादन की संगति के साथ-साथ एकल वादन के लिए भी इसका चयन किया जाता है। इसके बोल खुले और ज़ोरदार वर्णों से निर्मित हैं।

  • मात्राएँ: 7 मात्राएँ
  • विभाग: 3 विभाग (3/2/2 मात्राओं के विभाजन के कारण यह मिश्र जाति का विषम पदीताल है)
  • ताली: पहली (1), चौथी (4) और छठी (6) मात्रा पर
  • खाली: इस ताल में खाली नहीं होती है।
मात्रा1234567
बोलधादिंतातिटकतगदिगन
चिह्न×23

6. धमार ताल

धमार ताल पखावज का अत्यंत लोकप्रिय और प्रचलित ताल है जो तबला वादकों और कथक नर्तकों में बहुत लोकप्रिय है। 14 मात्राओं में निबद्ध होरी गायन की संगति धमार ताल द्वारा ही की जाती है। इस पर स्वतंत्र वादन भी खूब होता है। वीणा, सुरबहार, सरोद, सितार और संतूर आदि पर भी धमार अंग की गतें बजती हैं।

  • मात्राएँ: 14 मात्राएँ
  • विभाग: 4 विभाग (5/2/3/4 मात्राओं के विभाजन के कारण यह विषम पदीताल है)
  • विशेषता: यह एकमात्र ताल है जिसका सम बाएँ पर बजता है।
  • ताली: पहली (1), छठी (6) और ग्यारहवीं (11) मात्रा पर
  • खाली: आठवीं (8) मात्रा पर
  • जाति: बोलों की दृष्टि से मिश्र जाति का है, जबकि विभाग की दृष्टि से संकीर्ण जाति का है।
मात्रा1234567891011121314
बोलकधिटधिटधाऽगतिटतिटताऽ
चिह्न×203
भातखंडे और पलुस्कर ताल पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन

जब भिन्न-भिन्न तालों के ठेके एवं उन तालों में निबद्ध रचनाओं को मात्रा, विभाग, ताली एवं खाली आदि के माध्यम से स्पष्ट रूप में लिखा जाता है तो उसे ताल लिपि कहते हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में मुख्य रूप से तीन ताल लिपियाँ प्रचलित हैं, जिनमें दो उत्तर भारत की हैं (भातखंडे और पलुस्कर पद्धति) और एक दक्षिण भारत की (कर्नाटक पद्धति)।

1. पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ताल लिपि पद्धति

पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी द्वारा रचित ताल लिपि सुगम होने के कारण सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है।

  • एक मात्रा में अनेक बोल: एक मात्रा काल के अंदर जितने बोलों का प्रयोग होता है, उन्हें अर्धचंद्र (Group) के अंदर घेर दिया जाता है (जैसे— दींदीं-धगिन)।
  • एक मात्रा में एक वर्ण: जब 1 मात्रा में 1 वर्ण होता है तो उसके नीचे कोई चिह्न नहीं होता, सिर्फ थोड़ी दूरी पर लिखा जाता है।
क्रम संख्यानामचिह्न
1सम×
2तालीताली की संख्या – 2, 3, 4, 5...........
3खालीO
4विभाग| (खड़ी पाई)
5मात्रा समूहअर्धचंद्र चिह्न (इसके अंतर्गत आने वाले बोल एक मात्रा में बोले जाते हैं)
6अवग्रहऽ (विश्राम हेतु)

2. पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ताल लिपि पद्धति

इस पद्धति की रचना पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने की थी। अधिक सूक्ष्म एवं जटिल होने के कारण यह पद्धति कम प्रचलित है। इसमें मात्रा और विभागों के लिए भिन्न चिह्नों का प्रयोग होता है।

  • मात्रा काल का संकेत: प्रत्येक बोल के नीचे उसका मात्रा काल (1, ½, 1/4) आदि का संकेत चिह्न लिखा जाता है।
  • सम और खाली: सम के लिए (1) और खाली के लिए (+) लिखा जाता है।
  • विभाग: इसमें विभाग का कोई निश्चित चिह्न नहीं होता है।
क्रम संख्यानामचिह्न
1सम1
2तालीताली की संख्या – 2, 3, 4...........
3खाली+
4विभागकोई चिह्न नहीं
5मात्रा के चिह्न¼ मात्रा (अर्धचंद्र नीचे), अर्द्धमात्रा (O), एक मात्रा (—), दो मात्रा (S-like curve), चार मात्रा (+)
6आवर्तन की पूर्णता|

3. दोनों पद्धतियों का तुलनात्मक विश्लेषण

  • सरलता: भातखंडे ताल पद्धति अधिक सरल एवं सुविधाजनक होने के कारण अधिक लोकप्रिय है।
  • वैज्ञानिकता: पलुस्कर ताल पद्धति अधिक सूक्ष्म और वैज्ञानिक है। इसमें प्रत्येक अक्षर या वर्ण का वज़न स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
  • उदाहरण: 'धगिन' और 'धातेटे' जैसे बोलों को भातखंडे लिपि में सीधे लिख दिया जाता है जिससे वर्ण का वास्तविक वज़न स्पष्ट नहीं होता, जबकि पलुस्कर पद्धति में प्रत्येक वर्ण का मात्रा काल (जैसे 1/3 या 1/2 मात्रा) स्पष्ट रूप से अंकित किया जाता है।