संगीत में समय नापने के साधन को ताल कहते हैं। यह संगीत में व्यतीत हो रहे समय को मापने का एक महत्वपूर्ण साधन है जो विभिन्न मात्राओं, विभागों, ताली और खाली के योग से बनता है। ताल संगीत को अनुशासित करता है और उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है।
त्रिताल अथवा तीनताल तबले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, लोकप्रिय एवं प्रचलित ताल है। इसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत, उपशास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत और फिल्म संगीत तक में होता है। यह विलंबित से द्रुत लय तक में बजाया जाता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा | धा | तिं | तिं | ता | ता | धिं | धिं | धा |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
झपताल एक अत्यंत लोकप्रिय और प्रचलित ताल है। इसका प्रयोग विलंबित और मध्य लय के ख्याल एवं गतों की संगत के लिए किया जाता है। सादरा गायन शैली की संगति भी झपताल द्वारा ही होती है। तबले का एकल वादन भी इसमें होता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धी | ना | धी | धी | ना | ती | ना | धी | धी | ना |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
रूपक ताल तबले का लोकप्रिय और प्रचलित ताल है। इसका प्रयोग शास्त्रीय, उपशास्त्रीय तथा सुगम संगीत में किया जाता है। मध्य लय और विलंबित लय का ख्याल गायन भी इसमें प्रचलित है। गीत, भजन, गज़ल एवं तंत्री तथा सुषिर वाद्यों की संगत के लिए भी इसका प्रयोग होता है।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | तीं | तीं | ना | धी | ना | धी | ना |
| चिह्न | ⊗ | 1 | 2 |
सूलताल पखावज का लोकप्रिय और प्रचलित ताल है। इसका वादन मध्य और द्रुत लय में होता है। ध्रुपद अंग के गायन और वादन के साथ इसका वादन होता है। पखावज पर स्वतंत्र वादन के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके बोल खुले और ज़ोरदार होते हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | धा | दिं | ता | किट | धा | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 0 | 2 | 3 | 4 |
तीव्रा पखावज का प्राचीन, महत्वपूर्ण और प्रचलित ताल है जो तबला वादकों में भी लोकप्रिय है। तेज़ गति में बजने के कारण ही इसका नाम तीव्रा पड़ा। ध्रुपद अंग के गायन और वादन की संगति के साथ-साथ एकल वादन के लिए भी इसका चयन किया जाता है। इसके बोल खुले और ज़ोरदार वर्णों से निर्मित हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | धा | दिं | ता | तिट | कत | गदि | गन |
| चिह्न | × | 2 | 3 |
धमार ताल पखावज का अत्यंत लोकप्रिय और प्रचलित ताल है जो तबला वादकों और कथक नर्तकों में बहुत लोकप्रिय है। 14 मात्राओं में निबद्ध होरी गायन की संगति धमार ताल द्वारा ही की जाती है। इस पर स्वतंत्र वादन भी खूब होता है। वीणा, सुरबहार, सरोद, सितार और संतूर आदि पर भी धमार अंग की गतें बजती हैं।
| मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बोल | क | धि | ट | धि | ट | धा | ऽ | ग | ति | ट | ति | ट | ता | ऽ |
| चिह्न | × | 2 | 0 | 3 |
जब भिन्न-भिन्न तालों के ठेके एवं उन तालों में निबद्ध रचनाओं को मात्रा, विभाग, ताली एवं खाली आदि के माध्यम से स्पष्ट रूप में लिखा जाता है तो उसे ताल लिपि कहते हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में मुख्य रूप से तीन ताल लिपियाँ प्रचलित हैं, जिनमें दो उत्तर भारत की हैं (भातखंडे और पलुस्कर पद्धति) और एक दक्षिण भारत की (कर्नाटक पद्धति)।
पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी द्वारा रचित ताल लिपि सुगम होने के कारण सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है।
| क्रम संख्या | नाम | चिह्न |
|---|---|---|
| 1 | सम | × |
| 2 | ताली | ताली की संख्या – 2, 3, 4, 5........... |
| 3 | खाली | O |
| 4 | विभाग | | (खड़ी पाई) |
| 5 | मात्रा समूह | अर्धचंद्र चिह्न (इसके अंतर्गत आने वाले बोल एक मात्रा में बोले जाते हैं) |
| 6 | अवग्रह | ऽ (विश्राम हेतु) |
इस पद्धति की रचना पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने की थी। अधिक सूक्ष्म एवं जटिल होने के कारण यह पद्धति कम प्रचलित है। इसमें मात्रा और विभागों के लिए भिन्न चिह्नों का प्रयोग होता है।
| क्रम संख्या | नाम | चिह्न |
|---|---|---|
| 1 | सम | 1 |
| 2 | ताली | ताली की संख्या – 2, 3, 4........... |
| 3 | खाली | + |
| 4 | विभाग | कोई चिह्न नहीं |
| 5 | मात्रा के चिह्न | ¼ मात्रा (अर्धचंद्र नीचे), अर्द्धमात्रा (O), एक मात्रा (—), दो मात्रा (S-like curve), चार मात्रा (+) |
| 6 | आवर्तन की पूर्णता | | |